छमियां (chhamiya)


 

छमिया


रुप,रंग की,

खूब ढंग की।

जमती रहती,

रमती रहती।

कहती रहती,

घूमती रहती।

छमिया अपनी धुन में रहती।।


कौन उसका ?

कौन पराया?

सब उसके,

उसने सबको अपना बनाया।

वक्त ने उसको है आजमाया।

कभी कुछ उसको भाया,

ले लिया सब जो उसको भाया।

जो मन ललचाया, 

मन घबराया,

छमिया का मन झट पलट आया। 

कौन सगा ?

 कौन साथी ?

सब उसके,

वो सबकी साथी।

कभी मन की बेबसी,

कभी बेबस वो थी।

फिर खुद को था आजमाया,

और जो मिला उसे अपना बनाया।

छमिया ने रास्ता नया बनाया।

छमिया ने मुह पलटाया।

वाह वाह रे छमिया। 

वाह छमिया।।


- कविता रानी।

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