एक पल को यादों में / Ek pal ko yadon mein
एक पल को यादों में एक पल को खो गया था। रोका बहुत मन को, पर जानें क्यों रो ही गया था। कमी रही बीस साल से ज्यादा, एक बुँद ना मिली प्यास मिटाने को, पर तब भी तो जी रहा था। फिर जाने क्यों एक पल ना लगा, आँखो के नम होने में, एक क्षण ना लगा, गालों पर सलवटें पङने में। सुन रहा था एक अभागे को, समझाइश उसकी थी रो में दिया। क्यों बात को बीच में छोङ दिया, सह ना सका कमी बतानें को, एक पल को खो ही गया था मैं, रोका बहुत पर रो ही गया था मैं। कुछ और समय दे दिया भावों को, बैठ गया फिर खुद को समझनें को, कमी एक थी आँचल की, जो ढक ना सकी मेरी कोमल काया की, कमी थी तेज धूप जलाती रही, आंधियाँ, लू सब बर्बर छेङती रही, जल गयी कोमल छांव मेरी, सर्दी ने भी खुब कहर बरपाया, जो अपने ऊपर आँचल ना पाया। फिर चाह हुई कोमल प्रेम गोद की, सिर रख सो जाता कभी मैं, कोमल तकीया मुझे मिला ही नहीं, ना ही उसमें रहा प्यार पाया कभी, होता क्या प्रेम, लाङ रुप, सोया नहीं गोद तो जाना नहीं। कोमल बाहों से गले लगना, ह्रदय के लगाव को सुनना, अधुरा रहा वो मोह रुप भी, मिला नहीं बस गीला यही, एक पल को ये ठेस लगा, खो ही गया था मैं याद करत...