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मेरा विरह | mera virah

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मेरी विरह शांत हवा तुफान बन गयी, लहरें अब विकराल बन गयी, जो दीप जलाये थे ज्योति को, वो ज्वालायें बन गयी । में विक्रान्त रूप लिये बैठा , बिन मिले ही विरह जी बैठा, मेरा एकान्त परेशान है, मेरा दिल हैरान है । किसे कहूँ- कहाँ जाऊँ,  विरह गीत लिखूँ और गाऊँ, अपने मन को समझाऊँ,  मैं कैसे अपना हाल बताऊँ । वो मन मोहकता जलाती है,  मधुर बातें तड़पाती है,  मेरा अकेला मन रूसता है, सब देख मन खिजता है । मैं कैसे एकान्तवासी बन जाऊँ,  भरा इच्छाओं से कैसे अधुरा गाऊँ,  मैं कैसे स्व विरह जी पाऊँ,  मैं कैसे सब बताऊँ  ।। Kavitarani1  271