सुनी भाग-15 विध्यालय व्याख्याता / Suni part-15 school lecturer
सुनी भाग-15 विध्यालय व्याख्याता संघर्षों के समाज से, कोशिशों के आयाम तक, अब तक जो अडिग थी, अब मुश्किलें कम थी। घर समाज पिछे छुटा सा, आत्म मन्थन में जीवन रुठा सा, छब्बीस से सत्ताइस साल की हुई, सुनी अब आत्मनिर्भर हुई। दबाव पहले सा नहीं रहा, मन पर कुछ भार अपना रहा, याद केवल कल का साथी रहा, सोंच बस कल की रही। कल के बेहतर की आस कर, लगी रहती अपने बाप पर, कैसे भुले मधुर रस को, कैसे रोके कङवे कल को। सबसे अधिक पङी लिखी समाज में, लोग देखते मान अभिमान से, कुछ बुरे भी पास आने लगे, दुश्मनों को भी भाने लगे। लक्ष्य सामने पाकर वो, लग जाती सब छोङ वो, हार होती बार-बार, मन्नतें करती हर बार। मन को संभालती आगे बढ़ती, रुठती, मनाती सबसे कहती, एक दिन नौकरी पाकर रहूँगी, आप सब को चुप कर दुँगी। कई बार असफलता आई, बार-बार सुनने लगी हाई, मन को तोङ लगी रही, व्याख्याता बनने की कहती रही। काम छोङ कोटा गई, पढ़ाई के लिये लङ गई, घर से डेड लाईन मिली, नहीं नौकरी तो तू गई। साफ लब्ज और कुछ खर्चा, पर पास नहीं हुई तो जाना होगा, कोई मैं-पर नहीं चलेगी, अब तुझे हमारी सुननी पङेगी। मान बात गई कोटा, सहेलियों साथ रहती कोटा, अब भ...