मैं अकेला आज / main aaj bhi akela
मैं अकेला आज मन में दबाये कई राज। आज भी अकेला हूँ। आज भी अकेला हूँ। खोज वही रोज है। आँखों में रोश है। मजबूर अपने सपनों से। मैं अकेला हूँ। आज भी अकेला हूँ।। आते जाते मिलते हैं। रोज नये रिश्ते खिलते हैं। रोज मिलते लोग बिछुङते है। कहते सुनते लङते हैं। अपने आप को छिपाये। अपने राज सबको बताये। मैं आशाओं का थैला हूँ। मैं अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ।। किसे अपना कहूँ। किसे मानु खास मैं। रोज नये झंझंट है। लुटते लोग बाग। यही सारी परेशानी है। तभी मैंने ठानी है। मेरी मनमानी है। तभी मैं अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ।। -कवितारानी।