सुनी भाग-18 उपसंहार / suni part-18 The Conclusion
सुनी भाग-18 उपसंहार ये कहानी थी बाल विवाह की, नहीं ये कहानी थी एक लङकी की, नहीं ये कहानी थी सफलता की, नहीं ये कहानी थी समाज के आईने की। नाम चाहे दो कुछ, इसका विस्तार चाहे दो कुछ, पर है ये मर्म एक जान का, ये भाव था एक छुपी हुई जान का। जब काल का काम आता है, सब रिश्तों नातो को से खा जाता है, जब बुरा समय भाग्य में होता है, तो कोई कुछ नहीं कर पाता है। पर जो किया दृढ़ संकल्प तो, काल को भी मानना पङता है, जब जपा नाम भगवान का तो, बुरे समय को भी जाना पङता है। जो सुनी जकङी थी समाज में, उसने समाज को झुका दिया, जो सुनी थी अनजान दुनिया से, उसने दुनिया को दिखा दिया। वो नारी बन के आई, उसने अपने मन की कर दिखाई है, लक्ष्य साधा अपना खुद ने, जिद से ही व्याख्याता बन दिखाई है। पर मन की पीङा तो मन ही जाने, जो घाव पङे मन पर वो कौन जाने, तन को सवाँर वो लेती है, पर यादों में बंधी वो रहती है। है जोर जग का और बंधंन है तन का, उसपर विजय पानी है, यह तो आधी ही कहानी है, अंतिम मुकाम तक हिम्मत उसे दिखानी है। हम कामना करे भावी भाग्य की, जो हार रहे हिम्मत उन सबकी, सिख जो दे रही सुनी या नहीं आपने, सुनी की कहानी सुनो...