संदेश

शिक्षा खोई हुई / shiksha khoi hui

  शिक्षा खोई हुई अहमी, दंभी, पांखडी ज्ञान भरे जो गुरु दिखते हैं। अपनी होङ में, तेज गति से दौङते हैं। इन आज के मास्टरों मे लगता है शिक्षा सोई हुई है। हर दिन अपने आलाप में दिखते हैं, शिक्षा खोई हुई है।। जो ज्ञान सागर पढ़े-सुने-देखे कहीं। जो महानता का आवरण ओढ़ बैठे रहते कहीं। आज के विध्यालयों में खोजता मे ज्ञानवान ही। और लगता है सब नौकरी वाले, इनमें शिक्षा खोई हुई।। शिक्षा का सार पता ना होता इनको। ज्ञान का आधार पता ना होता है। दुसरे प्रतिभावान को गिराना लक्ष्य इनका होता है। लङने का ही इनके मन होता लगता है।। मन के मारे, मन के हारे सारे ये। अपनी छवि सुधारने को अभिनयी लगते ये। इनको नहीं शिष्यों की पङी कहीं। इनमें लगता है वास्तविक शिक्षा खोई हूई।। भावी भाग्य के निर्माता सारे ये। अपने आलाप गाते रहते है ये। किसी की जो ना सुनने वाले है। इनमें नैतिकता कहाँ हो सकती है।। -कवितारानी।

प्रतिभाओं की किसे पङी / pratibhao ki kise padi

  प्रतिभाओं की किसे पङी जहाँ चापलुसी ही ज्ञान हो, चमचागीरी अभिमान हो। वहाँ काम और संस्था की किसे पङी, वहाँ प्रतिभाओं की किसे पङी।। जहाँ स्वार्थ सिध्द कार्य किये जाते हो, नमक से ज्यादा हरामियों की गाई जाती हो। हर वक्त अहम् और स्वयं का मान हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या ज्ञान हो।। जेब जहाँ भरनी हो, कथनी करनी में भारी अंतर हो। तानाशाही ही जब करनी हो, फिर प्रतिभाओं की क्या करनी हो।। अकङ में ज्ञान ज्ञात ना हो पाता हो, अच्छे काम को नकारा जाता हो। मिलने वालों को भरा जाता हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या करना हो।। काम का अर्थ फिर बस काम रहे, व्यर्थ ही अच्छाई को काम मिले। बेवक्त फिर सुनना जब पङे, वहाँ प्रतिभाएँ क्या करें।। जंगल का राज भारी है, जो चिखे वही सबसे भारी है। आलसी का जहाँ बस मौज हो, प्रतिभा रहकर भी वहाँ क्या करें।। जहाँ अज्ञानता आनन्द बन गई हो, समझदार होना जहाँ मुर्खता हो। मुर्खों को पुरस्कार हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या ही हो।। हर वक्त प्रतिभा को जब टीस मिल, प्रशंसाओ को बस रीस मिले। हर्ष पर विषाद जिससे फैल जाये, प्रतिभाएँ ऐसी जगह कहाँ रहे।। -कवितारानी।

माॅडर्न शिष्य/ modern students

माॅडर्न शिष्य ध्यान हीन, ज्ञान हीन, दिशा हीन, वाचाल, कुचाल भरे। अमर्यादित, स्व बाधित, दंभित मति लिए, पापी है। अवज्ञा करते, अवहलना करते, स्वार्थ की बात करते हैं। हर बात पर कुतर्क, कहते ये हम माॅडर्न हैं।। शिष्य कहूँ, आधुनिकता वाले या कहूँ अहमी पीढ़ी है। ज्ञान पीपासा दिखती नहीं, ये अज्ञानी अभिमानी है। मैं गौरव चाहूँ बांटना, सिखाना चाहूँ ब्रम्हाण्ड इन्हें। पर माॅडर्न शिष्य को पाकर लगता नहीं इन्हें मेरी कमी है।। भाषा हीन, आशा हीन, निशाचर प्रेमी, मोबाइल के आदी है। आभा हीन, प्रसादन लीन, कृत्रिमता लिए, वास्तविकता के वैरागी है। दिखावा करते, प्रतिस्पदा में मरते, छल के पारखी है। अस्थिर चरित्र, मौलिकता खोये कहते हम माॅडर्न है।। क्षमा नहीं, क्रोध में ही, आवेश में विचरते हैं। अपने आप को विद्वान बखानते. ये ज्ञान हीन मरते हैं। समाज को भ्रमित कर, माता पिता का वैभव हरते हैं। इन माॅडर्न शिष्यों को देख, लगता है हम पिछङ रहे हैं।। -कवितारानी। 

अब / Ab

  अब  महिने बीत गये हैं, परायी सी लगती अब। देखने को जी होता भी, पर मन को चिढ़ती अब। चेहरे पर वो नूर नहीं, खोयी सी अपने में तू। आँखों में सूरमां भी, पर भाती नहीं अब। माथे पर बिंदिया है, गले में मंगलसुत्र अब। मेरी कहूँ कैसे तुझसे, अहसास ही नहीं होता अब। स्पर्श अब औझल है, प्रेम रस खोया सब। मधुर बातें दबे पन्ने सी, भूले बिसरे लम्हें अब। याद तू आती नहीं, पलकों से जाती नहीं। देखना अब भाता नहीं, देखे बिना रह पाता नहीं। तुझसे जुङे लोग टकराते हैं, मिलने को उन्हें पैर डगमगाते हैं। किसी पर अब यकिन नहीं, तेरी कोई उम्मीद नहीं। पल-पल एक साये सा, रहता है यादों का पहरा। रख खुद को व्यस्त मैं, जी रहा हूँ अब मैं।। कल के कुछ किस्से हैं, दर्द के मेरे हिस्से हैं। रोती मनाती तू आयी भी, सिसकी भर इतराई भी। वही तरिका था लङने का, वही सलिका था लङने का। फिर मैंने बात ना की, अब तेरी यादों की बात ना थी। परायों सा तेरा जिक्र है, अकेले दूर तेरी फिक्र है। पागलों सी तू होना ना, गैरों सा मैं होना ना। आशाओं के द्वीप पर, मैं बैठा अपनी रित पर। मुझमें कमियाँ कई पनपी सी, तुझमें कमियाँ कई दिखती सी। अब कोई बात नहीं, ते...

Saffocation

 Saffocation It's all about life, Suffocation on temptation,  Temptation of desired things. And suffocation of your love, It's all about my pain, Rain fills in eyes. I do believe on my God, He will be mine, The suffocation of Heart, Hurt me all things of love, Your hugs and kisses, All about the future of us, And don't trust on me, And you left me forever in past. The time had past. And suffocated on the things of love. Your calls and massages, Still binds me like that. It's all about my soul. All about my love, You didn't stay with me. You're not in my fevour. Now you do cry for me. blame on me. And I say, It's all about your fault. And I suffocated feel by you. It's all about love things. -kavitarani1

Dreaming

 Dreaming Shining in the darkest sky, Hiding in the sunny day. Running in the worst way, Dreaming to be alive. One day will come, One ray will shine,  One way will fine,  Dreaming in my crying. Eyes, filling with salty water. Cheeks, wetting by malty weather, Lips, trembling with cracky gather, Dreaming for all these change. One day lips corner will run, One day Eyes will shine, One day cheeks will be mine. Dreaming all about happiness. Coying heart says, Lot's of things with rays, Hiding oneself to be cried. Dreaming to come out. One day must come for me, One day will live on me, One day no desired heart live, Dreaming for that, Dreaming for that, Dreaming for all about, My happy life, Dreaming. -kavitarani1

My Aim

 My Aim A desired Heart in me, Thinking always for dreams. A love desire hurts me. Wishing always for mean. My aim on the way. Stoping to distrack, My love has lost. Searching to be cream. I wish to be happy, Wishing to shine. My aim on the way. Way of all suffer. My aim on the ray. Hoping to be gain. I have begun life, With leaving you on way. My aim on the way, My life suffocated, On your gay, My aim on way. -kavitarani1

जीवन यही तो जीना होगा / jivan yahi to jeena hoga

  जीवन यही तो जीना होगा हो घने बादल छाये। बिजलिया कङके और डराये। आँसुओं की धार निरंतर बहे। लब सुखे रहे अनकहे। मन में घुटन, चिखे दवायें। इच्छायें चाहे अंदर ही मर जाये। कङवा हो घूट वीना ही होगा। जीवन है यही तो जीना होगा।। साथ रहे लोग या छोङ जाये। चले राह पर या गीर जाये। दीवारों सी बन बाधायें आये। पथ पर काँटों की सेज सज जाये। बढ़े आगे लोग पिछे खिंचे जाये। जोर आजमाईशें करते रहना होगा। जीवन यही तो जीना होगा।। आज की चोटे कल तक सताये। कल के घाव नासुर बन जाये। किलों से शब्द मन घायल कर जाये। बिते लम्हें यादों को जलाये। मन के बसे मन को बसाये। दुर्गंध सी तन मन को घुटन कराये। साँसों के सार ही तब रहना होगा। जीवन यही तो जीना होगा।। मटमैले नये परिधान हो जाये। नहाये कई महिनें बीत जाये। पीने को अशुध्द जल पाये। खाने को बासी रोटी चलाये। पल-पल कर लम्हें गुजारे जाये। घङियों के घङे घङते जाये। जीवन को निराधार तो धार में बहना होगा। जीवन यही तो जीना होगा।। बेसुध सुझ खोई रहे। आँखों के तारे एकटक रहे। कानों को प्रिय ना शब्द कोई। स्वाद रस नीरस हर कोई। नींद औझल हो फिर भी सोना होगा। जीवन यही तो जीना होगा।। अनिच्...

मैं हार नहीं मानूंगा / main har nahi manunga

  मैं हार नहीं मानूंगा हारा नहीं हूँ, ना हारुँगा मैं। जीवन पथ-पर चलता जाऊँगा मैं। हो बाधायें पहाङ बनी। जीवन डगर हो मुश्किलों भरी। खुद का सहारा बनुँगा मैं। हार नहीं मानुँगा मैं।। आये-जाये खुब सताये। लङे झगङे आग लगाये। बाधायें बन लकिरें स्थाई हो। जीवन में हर पल मुश्किल हो। हर बाधा को पार जाऊँगा मैं। हार नहीं मानुँगा मैं।। मन को मार-मार रहना हो। तन पर मार भारी हो। छाले पङे तलवे लहुलुहान हो। हाथों को लकवा पङा हो। जीवन सार नहीं हारुँगा मैं। हार नहीं मानुँगा मैं।। प्रिय-प्रियतमा प्रफुल्लित हो। छोङ मुझे लाभान्वित हो। जले-बुझे लाभान्वित हो। आँखों से नीत झरने बह जाये। सब बाधाओं को पी जाऊँगा मैं। हार नहीं मानूँगा मैं।। साथ रहे जग छोङ जाये। पास खङे मुझसे लङ जाये। हर रिश्ता होङ लगाये। पास पङोस जले चिल्लाये। सबकी मार सहुँगा मैं। हार नहीं मानूँगा मैं।। है, जीवन यही तो सच है। है, सहना यही तो सच है। आशाओं के दीप बुझने ना दूँगा। जीऊँगा गिरुंगा पर बढुँगा मैं। हार नहीं मानुँगा मैं।। सफल रहूँ असफल रहूँ। जीवन डगर पर बढता रहूँ। कोसु किसी को कोसों दूर रहूँ। लङु भी तो प्यार करुँ। सबको अपना ही कहूँगा मैं। ...

मधुर है शाम / madhur hai sham

  मधुर है शाम है सफर मधुर.... मधुर है मेरी शाम। आसमां है साफ और साँस है साथ। यही कहानी कह रही है जिन्दगी आम। है जिन्दगी आम, है जिन्दगी आम।। भूला भटका राह पर, आ खङा हूँ फिर। आकर राह पर, आ लङा हूँ फिर। फिर से हो रही है, नयी-नयी शुरुवात। कल के घाव भूल रहा, कर रहा याद। कर रहा याद... कर रहा याद।। है यादों में बचपन... बचपन की है याद। याद है मुझे के क्या थी बात। फिर से वही गलियाँ, वही रेगरलियाँ। वही दिख रहा दुखों में दबा है जो पहाङ। दुखों का पहाङ... दुखों का पहाङ।। हो आज मधुर... मधुर हो मेरा आज। कोशिशों के ज्वार में बह रहा आज। हो रही हैं आजमाई हो ख्वाहिशें आज। सपनों के सेज पर, सेज है आज।। है सफर मधुर... मधुर है मेरी शाम। आसमां है खुला... खुला है लिबाज। बंदिशें खत्म है... है खत्म मेरी चाह। है उङने की चाह... है उङने की चाह।। है जिन्दगी मधुर... मधुर है शाम। है चाहत मधुर... मधुर है शाम। देख रहा ढलता सुरज ढल रहा आज। है मधुर शाम मेरी मधुर है रात। है मधुर शाम मेरी मधुर है शाम। मधुर है शाम।। -कवितारानी।

जीवन सफर चलता जाऊँ / jivan safar chalta jau main

  जीवन सफर चलता जाऊँ नित आशाओं के दीप जलाऊँ, हर पल धुन कोई गुनगुनाऊँ। सबके मन को हरता जाऊँ, मैं प्रगति पथ स्वर्णिम बनाऊँ।। भुले-बिसरे भुलता जाऊँ, हर दिन नये रिश्ते बनाऊँ। सबके मन को खिलखिलाऊँ, मैं जीवन सफर में मुस्कुराऊँ।। घायलों की सेवा करता जाऊँ, घायल करें उसे माफी दिलाऊँ। भटकों की राह बनता जाऊँ, मैं हर दिन नये बंधंन बनाऊँ।। कल की किताबें भूल जाऊँ, रोज नये पन्ने लिखता जाऊँ। हर कहानी का किरदार बन जाऊँ, मैं अपनी धुन अपना गीत बन जाऊँ।। अपने परिधान प्रधान करुँ, अपनी जमीन को स्वर्ग करुँ। मन को रोज राजी करता जाऊँ, मैं जीवन डगर फुल सजाऊँ।। द्वेष-क्लेश पास आने ना दूँ, ईर्ष्या कपट दूर भगाऊँ। मिलन-सार चरित्र पाऊँ, मैं आजीवन परोपकार बन जाऊँ।। -कवितारानी।

मेरे बिना / mere bina

 मेरे बिना सपने होंगे, सहजादे होंगे। अपने होंगे, दिलवाले होंगे। घर होगा, घरवाले होंगे। खुशियाँ भी आयेंगी आँगन को। लोग पुछेंगे हाल को। सब जीवन जैसा होगा। बस मेरे बिना होगा।। तू खैलेगी, भी लङेगी भी। हॅसेगी भी, रुठेगी भी। मनायेगी भी, पुछेगी भी। बतायेगी भी। जीवन का हर रंग होगा तेरे साथ। बस तेरे साथ।। शादियों में, डिनर में। पार्टियों में, श्रृंगार होगा। अदायें होगी, रंग होगा। चेहरा खिलेगा भी। मस्ती होगी भी। सब होंगे तेरे आस-पास। बस मेरे बिना।। नजरें होगी, नजारे होंगे। बातें होगी, बहाने होंगे। सब सुहाना होगा। सब दीवाना होगा। अपनी ही लगने वाली दुनिया होगी। बस मेरे बिना।। लौट आने को जी भी करे। मचले चाहे आहे भरे। आँसुओं की धार रुके ना। दिल किसी की सुने ना। तो भी रहना होगी। सब कुछ सहना होगा। मेरे बिना।। लोग समझाने आयेंगे। तर्क-वितर्क कर तोलते जायेंगे। समझ आ जायेगी कई बार। समझ नहीं आयेगी कई बार। तब भी समझना होगा। मेरे बिना।। वो बारिस भी होगी। वो नहाना भी होगा। भीगना-भीगाना, चिल्लाना भी होगा। थोङी सी याद आयेगी भी। आँखें भीग जायेगी भी। पर हॅसी मैं उसे भुलाना होगा। मेरे बिना।। अब साथ कोई, कंधा क...

आदिवासी / aadivasi

  आदिवासी जन, जल जंगल, जमीन के रखवाले। हम आदिवासी प्रकृति के रखवाले।। अपनी जान तक लगा देते हैं, प्रकृति को सब न्योछावर करते हैं। हम वन के वासी हलवाले, जन, जल, जंगल, जमीन के रखवाले हैं।। आधुनिकता के परिचारक, चालक हम देश के रखवाले। जीव हित, परम्पराओं के ग्वाले, हम जंगल जमीन के रखवाले।। ना बैर किसी से, ना बैरी सहते हैं। हम मरते दम तक लङते हैं। हमारी बोली, संस्कृति अनमोल, हम इसे संजोये हैं। नव परिवर्तन की लहर में हम नहीं खोये हैं।। पढ़ लिख कर हमनें समाज को जाना है। अपने वजुद को दुनिया के सामने रख पर्यावरण संरक्षण क्या है बताया है। जो अनुसरण करें हमें तो प्रदुषण मुक्त धरती कर दें। हम आधुनिकता के साथ जीव जगत खुशहाल कर दें।। मान्यताओं से बंधे हम, सुधार को गले लगाते आये हैं। भारत के हम मुल निवासी बस सहते और सिखते आये हैं। अपने हक को छिनना आता, पर ना बैर फिर भी किसी से करते हैं। जन, जल, जंगल, जमीन के रखवाले, हम सम्मान से जीते हैं।। आदिकाल से जुङे, कई युगों को पाला है। तीर-धनुष-कमान संभाल कितनों को धो डाला है। रण बांकुरे हमें पुजते, वीरता के पर्यायी हम आज भी। जन, जल, जंगल, जमीन को सुरक्षा दे...

अब मन नहीं करता-2 /Ab man nahi karta

अब मन नहीं करता-2 अब मन नहीं करता। कि देखुँ तुझे जी भर के। सोंचु तुझे बिन सोंचे। बात करुँ दो ही भले। अब मन नहीं करता।। परायी लगती हो। बङी भद्दी दिखती हो। घीन भी आती है कुछ सोंच के। दुख भी होता है तुझे देख के। सब अब नया और बदला है। बस तुझसे मन बिझङा है। सामने आके खङी हो जाओ भले। बोलते-बोलते थक जाओ भले। नजरे तुझ पर टिकती नहीं। कार्नो पर झुँ रेंगती नहीं। अब कुछ मेरा दिखता नहीं। अब मन तुझपे करता नहीं।। अब मन नहीं करता। अब मन नहीं करता। कि खोजूँ तुझे झुपके-झुपके। कि सुनु तुझे बहाने से। मिलने का कोई सवाल नहीं। तेरे ना होने पर बवाल नहीं। अब साँसे एक लय तुझ बिन। अब तु मन को हरता नहीं। अब तेरे संग रहने का मन करता नहीं। अब मन नहीं करता। अब मन नहीं करता।। -कवितारानी।

जैसे तैसे / jaise taise

 जैसे तैसे जैसे-तैसे दिन बित गये। घर में उलझे सब बीत गये।। ना यादों की टिस रही। ना कोई बात विशेष रही।। ऐसे कैसे ही सब बीत गये। कहीं घुमें नहीं पर दिन बीत गये।। आती जाती यादों ने सताया था। रोज सुबह का चेहरा याद आया था।। उठते ही पानी दीवारों पर करना। याद रहा मकान का बनना।। जैसे-तैसे काम करता रहा। आहे भर लङ-लङ रहता रहा।। ना मिलना रिश्तों से ज्यादा हुआ। ना कोई मनका पास हुआ।। देख मनके के मजे दर्द हुआ। पर आते-जाते लोग हम दर्द हुआ।। ऐसे वैसे मस्ती भी की। बस एक महीना बीता अब याद ही।। जाना है कल चला जाता हूँ। याद रहे या ना रहे मैं भूल जाता हूँ।। पुरानों को भुल नयों को अपनाना है। कहीं मन लगाने का कोई बहाना है।। आती जाती किस्मत खराब रही। कुछ मन की दबी मन में रही।। अब सब बस सवाल है। अपने कहने वाले ही खराब है।। जैसे-तैसे ये साल और निकालुँ मैं। अपनी दुनियाँ बसाऊँ जी लुँ मैं।। जी लूँ मैं।। -कवितारानी।

बादलों की ओट से / badalo ki oat se

 बादलों की ओट से  हवायें तेज हुई, धुल भरी, चुभन भरी। दिख ना रहा रास्ता, ना कोई किरण भी। साफ आसमान ढक सा गया, भर ही गया। छुप गया सुरज, बादलों की ओट से।। एक मधुर मुस्कान सी, लकीरें नसीब सी। कुछ तेज लिये, आवेश लिये। सुहानी गुंबद सी, दिख रही तस्वीर सी। बादलों की ओट से, बादलों की ओट से।। संध्या की लाली में, गर्मी की चुभन से। राहत बनती पर्दे सी हवायें लिये नमी सी। ले जाती मेघों को, नजरों के हुलारे सी। मन को भाती किरणें, दिख रही बादलों की ओट से।। चुभन हुई कुछ ओट हटी, शर्म हुई सी नजर हटी। कुछ पल देख इधर, फिर से नजर वही डटी। मुस्कान मधुर वो आ रही, मन को भा रही। बादलों की ओट से, बादलों की ओट से।। अच्छा हुआ अकेला हूँ, मन से आह्लादित हूँ। जी रहा हूँ बस अभी, देख रहा हूँ सभी। वो आशाओं की जमीन, वो उम्मीद की लकीर। आ रही है जो, बादलों की ओट से।। हवायें जाये, हो जाये शाँत सब। आब छा जाये घटायें, हो जाये अँधेरा अब। ढल रहा रवि भी, भर गया रवि भी। जो देखी मधुर शाम, बादलों की ओट से। बादलों की ओट से।। -कवितारानी।

अब मन नहीं करता / Ab man nahi lagta

अब मन नहीं करता अब मन नहीं करता। कि तु ही हो पास। अब मन नहीं करता। कि सपने हो साज। अब साजन सी तु है नहीं। अब पिया के मन की तु नहीं। अब है नहीं शिकायतें कोई। अब तेरे बातें बेमतलब है। अब तुझसे मेरा मन नहीं।। आँखो में भर दोखा। बातों में भरलो चोखा। चाहे कर लो मिठ्ठी बात। आँखों को सजा लो आज। चाहे कर लो 16 सिंगार। हो चाहे तारो की भात। पर अब वो सब भुला ना जायेगा। तुझ पर अब मन नहीं आयेगा। अब बाहों में भरने का मन नहीं करता। अब जन्नतें भी जान्नुम हैं। अब तुझ बिन जिन्दगी है। तेरी सारी बातें बेमतलब अब। अब कुछ मन नहीं करता। अब मन नहीं करता। अब मन नहीं करता।। -कवितारानी।

प्रगति पथ पर गीत / Pragati path par geet

 प्रगति पथ पर गीत जीवन की इन रिमझिम झङियों में। बहती नदियाँ और दरियाँ में। आशाओं की थाम ढोर। साँसो की लय से देखता भोर। रोज नये सपने बुना करता हूँ। मैं प्रगति पथ को चुना करता हूँ। लहरे नहीं सैलाब आते। दरियाँ को सागर बनाते। ढुबा देते रोज बने मेरे मकानों को। मैं फिर सुदृढ़ किले गढ़ा करता हूँ। आशाओं की थाम ढोर। साँसो को ले जाकर छोर। रोज नये सपने बुना करता हूँ। मैं प्रगति पथ चुना करता हूँ। आज साथ है वो कल था नहीं। जो कल था साथ आज दिखता नहीं। रोज बदलते इंसानों को देखा करता हूँ। मौसम के नये-नये नजारे देखा करता हूँ। जब तक मिलती नहीं मंजिल मुझे। मैं ऐसे नया गीत लिखता हूँ। मैं रोज आशाओं पर जिया करता हूँ। हर शाम घुटता हूँ हर रात मरता हूँ। हर भौर जगाती जीवित फिर। फिर से प्रगति पथ चुनता हूँ। मैं रोज प्रगति पथ पर चलता हूँ। मैं रोज आगे बढ़ता हूँ।। -कवितारानी।

मोर संग / mor sang

मोर संग एक शाम गुलाबी। एक नैन शराबी। कजरारे काले हैं। पंखो पर शरारे हैं। मोरध्वज सुंदर। शाम रंग अति सुंदर। मधुर मय के प्याले ये। नैन रसीले प्यारे हैं।। छत पर शीतल पवन। एक ताङ, नीम और शहर। एक अमरुद फलित है। शाम मधुर है। मेर श्रृंगार विकट बैठा। देखता कभी, कभी सजता। सखा शाम आज मयुर। शाम गुलाबी है मधुर। शमा खफा मैं खुश। बैरी बैठी मैं खुश। अलग रंग अलग ढंग। शाम गुलाबी मधुर रंग। कप का प्याला। करता मतवाला। अब बहाना। मैं मतवाला। उङ चला मोर संग। उसके रंग।। -कवितारानी।

आशाओं को पुतला मैं / Aashao ka putla main

  आशाओं को पुतला मैं मैं आशाओं का पुतला, जलता अपने आप से। नहीं किसी की बुराई खाई, ना ही जला किसी के ताप से। अपनी कमीयों का मारा, मैं फिरता जला सा तेजाब से। दर-दर को आशियाना मांगता, मैं जाता जलता अपने आप से।। कल था शुरवीरों के साथ, अपने तेज से था प्रकाश में। खुब कोशिशें की चमकनें की, मिटा दिया अंधकार में। फिर से जमीन बदली गई, बदला है आप मेरा बदलाव में। निस्तेज तेज छुपा हुआ है, छुपा हुआ जैसे बादलों की आङ में।। आशा सर्पीली ढंस रही जीवन सार ये। रोज नया सपना बुनती, कहती है यही संसार ये। भुल भुलय्या नहीं जमती, नहीं भाता प्रकाश ये। रोज भुगते दर्द नया, लगता जो सहा हुआ ताप ये।। पश्चिम का सफर किया, छः माह था जैसे शोक संताप में। रोज पुरब निहारता, करता याद अपनी जमीन रात में। शाला का ताला होता, खुलता था ताला दुःख विषाद में। कोठी में जाकर भोजन होता , खुोया रहता वहाँ हमेशा आप में।। कहाँ सुकुन है मालिक मेरे कहाँ सवेरा लिखा ये। रोज उठता अब विन तङपे पर बंधी नहीं आस ये। जा टिकती है अनजानों में ढंसते रहते जो हर बात वे। समझ ना पाता कैसे मन को भाते सब इन्सान वे।। ठहर कहीं साँस लुँ की सुकन जहान आराम रहे।...

बात सीधी थी वो / baat sidhi thi vo

बात सीधी थी वो बात सीधी थी वो, सीधे दिल तक गई। पर अनजाने ही सील सी गई। एक तरफा है प्यार तभी सहते हैं। अक्सर आपकी बात कहते हैं। कोई चाह कैसे बनाये। सपने बन कोई कैसे छाये। कैसे कोई प्यार जगाये। सोये ह्रदय को उपवन बनाये। हमने रस्ते खोले हैं। बिन मतलब लोगों को तोले हैं। कुछ समझ परे दिल से ही। पर जो भाया वो मेरा था। कोशिशें नहीं की पाने की। पा ना सका खुशी जमाने की। उसी दुख को जीते हैं। अकेले में तुम्हें याद करते हैं। और लब्जों को परदा करते हैं। सीधे शब्दों को जीते हैं। मुश्किल होते यही बात है। वक्त अकेले कटता है।। -कवितारानी।

मैं रोज नये सपने बुनता हूँ / Main roj naye sapne bunta hun

मैं रोज नये सपने बुनता हूँ मैं रोज बनता बिगङता। उठता-गिरता, चलता, रुकता हूँ। मैं सपनें आज भी सुनहरे कल के बुनता हूँ।। आज भी मेरा मन वैसा है। था कङवा बचपन जो, तन आज भी वैसा है। मैं आज भी इस आज को बदलना चाहता हूँ। मैं रोज नये सपने सजाता हूँ।। वो मखमल सा बिस्तर आज भी दुर कहीं। दुर है आज भी महल मेरा वो। आज भी प्रेम पिपासा खाती है। रोज रात आज भी किसी की याद सताती है।। मैं अपनी राहें खोजता फिरता हूँ। मैं आज भी सुनहरे सपने देखता हूँ। टुट-टुट के बिसरा सा मैं। मन-ही-मन अकेला मैं। भीङ मैं भी सुकुन खोजता हूँ। मैं रोज नये लोग चुनता हूँ। मैं रोज नये सपने बुनता हूँ। मैं रोज नये सपने बुनता हूँ।। -कवितारानी। 

समय गुजार रहें है / samay gujar rhe hai

समय गुजार रहें है सपनों की जिंदगी जी रहे हैं। हाँ जो देखा था ख्वाब वही जी रहे हैं। जी नौकरी कर रहे हैं। या कहे समय गुजार रहे हैं।। सोंचा था ख्वाब हसीन होगा। मिलेगी नौकरी ते सब कुछ अच्छा होगा। जी सैलेरी आती है। या कहे जरुरतें पुरी हो जाती है।। ज्यादा लोड नहीं इतना भी। काम के बदले दाम जो मिलता है। जी हाँ काम पर काम ही मिलता है। या यूँ कहे एक का सुकून सा नहीं मिलता है।। अपना काम ही करते हैं। नहीं अपना और नाकारों का काम भी करते हैं। जी ईमानदारी जिंदा है यहाँ। या यूँ कहे ईमानदारी तो है ही ईमानदारों के लिए।। बेइमानों की मौज कहें। आलसियों की तो आराम कहे। जी यही तो बस रह गया है। लुटो जिसे लुटना है।। मैं भी समय पर जाता हूँ। काम करता हूँ और कमाता हूँ। भेदभाव सहते भर गया हूँ। या कहूँ अब बस समय गुजार रहा हूँ।। विरोधी नकारात्मकता-भेदभाव का किया है। संघर्ष और धामें सहे है। अलगाव और बुराई को पाया हूँ। ईमानदारी कर्मठ अकेला रहा गया हूँ।। मन से मजबुत हूँ काम करता हूँ। कर्मठता सहनशीलता दिखलाता हूँ। मजबुर हूँ काम-वेतन पाने को। इसीलिए टिक कर समय गुजार रहा हूँ।। देशहित जैसी बात नहीं आती अब। कुछ नया करने की ...

अब तो / Ab to

  अब तो अब कोई शिकायतें नहीं, अब कोई रुठना नहीं। अब कोई बहाना नहीं, अब कोई रुसना नहीं। अब तो जाने देते हैं, कहते नहीं बस जीते जाते हैं। अब तो बस सुनते हैं, अब तो बस सहते हैं।। समय गुजर जाता है, घङी देखे बिना। रात हो जाती है सुरज देखे बिना। बंद कमरों से बस आवाजे आती है। अब तो मकान के अंदर जिंदगी जी जाती है।। किसी से कहना अब आसान नहीं रहा। कुछ बताना किसी को गँवारा नहीं रहा। सब मन तक ही रखना उचित लगता है। अब तो अकेले रहना ही सबसे सही लगता है।। मतलब तक ही तो अब बात होती है। स्वार्थ के बिना कोई याद नहीं होती है। लोगों की भीङ चुभन करती है। जिन्दगी अब बस मन में हँसती है।। -कवितारानी।

बात पुरानी, यादें / baat purani aur yadein

  बात पुरानी, यादें शादी, पार्टी हो या कोई त्योहार, करें और मनायें अपना त्योहार। मौज करें मस्ती करें और करें दुसरों से सदव्यवहार। देंखे नयनों में गौरी के और करें पल भर में उससे प्यार। दोस्त के साथ रहे उसके मन में भी वो रहे कहे वो अपना यार। दिन बीता रात गई फिर ना वो रही रहा बस उसका इंतजार। बीते दिन की बात कह कर फिर करें नयी का इंतजार। दोस्त कहे और जग कहे की ये सब है बेकार। नयन रहे भंवरा बन चुसे रस हजार। बात पते की मैं कहूँ जीना है जग में तो होता रहेगा प्यार। कब तक अकेले जग में रह  पाओगे मेरे यार। मौज करो-करो नयन मटक्के तो क्या ना मिल पाए प्यार। जो मिले पल मजा लो और करो अपनी वाली का इंतजार। पर दिल पर जो इसे है लेता वो हो जाता दग में बेकार। फिर जग काम का उसके फिर ना वो जग के आये किसी काम। इसीलिए प्यार में ढुबो मत नहीं तो हो जाओगे लाचार। बस मौज करो मस्ती करो रहो हर पल बिंदास। दिल टुटे ना किसी का ना हो अपना कोई नुकसान। बात पते की ये है दुर रहो इस सब से तभी है मजे की बात।। -कवितारानी।

चलो मौज कर ले / chalo aaj mauj kar le

  चलो मौज कर ले वो पुराने दिन फिर याद कर लुँ। पकङ खुशियों का नाता गमों से रिश्ता तोङ लुँ। चलो आज खुद से ये सवाल कर लुँ। नाता रहे ये जीवन भर या सपने ही दुनियाँ कर लुँ। जीवन अनमोल को आज खुशियों का मोल कर लुँ। चलो आज खुशियों को नया कर लो पुराने खुशी वाले लम्हें नये कर ले। चले फिर से उसी आसमां के निचे जहाँ सिर्फ अपनी दुनिया हो। करे वही जो दिल ने सोंचा था कभी, जो किसी ने सोंचा ना कभी। चलो आज गमों पर ताला लगा दें, चलो कुछ नये लम्हें गढ़ ले। मौज वही होगी, मस्ती वहीं वही होगा मजा चलो इन्हें अपना करलें। आज नहीं किया तो कल ना ये होगा फिर ये सब ना होगा। ना होगी फिर से बचकानी हरकतें ना होगा इतना गहरा प्यार। ना होगी इतनी आजादी ना मिलेगा समय इतना। चलो आज सारी कमी पुरी करलें, जो मौज रही बाकी पुरा उसे करलें। आज ना कोई करें ना जवाब बस मौज कर लें। आज अपना ही आनन्द हो और सब बेफिक्र हो। आज सब आनन्दित हो आज सब मौज में हो। चलो आज कुछ पुराने सा कर ले, चलो आज उसे नया कर ले। चलो आज फिर वही सवाल कर ले। चलो आज मौज कर ले।। -कवितारानी।

श्याम नाम रंग / shyam naam rang

  श्याम नाम रंग श्याम नाम रंग ले, हम श्याम नाम रंग ले। श्याम की है जो सच्चाई नाम नाम है वो पाई। जो सच है वो श्याम जो रत है वही नाम। जो कर्मठ ज्ञानी सा फिरे पर जिसमें नहीं राम है। जो ज्ञान, दान की बैत करें पर जिसमें नहीं राम है। जो ढोंग करे पाखण्ड करे दुनिया में बस अपनी झोली उसमें कहाँ राम है। वो अधुरा अज्ञानी है उसका नहीं उध्दार है। श्याम नाम रंग ले, हम श्याम नाम रंग। बैठा जो अकर्मठ बन के, लिए जो राम का नाम है। करता निर्मल मन, कर्म से सेवा जो दिन रात है उसमें राम नाम है। होता जो ज्ञानी करता बात धर्म सर्वहित कि जो, होता वो राम प्रिय वो। जो पुण्य काम कर, राम नाम कर रहता इस लोक में। जो कर्म करे सत्कर्म करे जो राम नाम दिन रात करें। सुनते प्रभु उनकी ही जो होते राम प्रिय वो होता उनका उध्दार यहाँ। श्याम नाम रंग ले हम श्याम नाम रंग ले। उसपे जो विश्वास है जो जग पार वो लगवायेंगे। जो रंगा श्याम रंग में हो तो उध्दार वो उसका कर पोयेंगे। जो करता सत्कर्म यहाँ होता कर्मठ भक्त जो राम का। होता नाम जग में और पाता पावन रंग श्याम का। रंगा हुआ है जो श्याम वही पार पायेगा दुख, दर्द, दुनिया वही सह पायेगा। ...

धोबी का कुता / ghar ka kuta/ besahara

 धोबी का कुता रोटी खाई तो क्या सब सहना होगा। घर का कुता घर का ना घाट का होकर रहना होगा। करता क्या कुता बेचारा सब सहता वो लाचारा। सदस्य घर का वो कहलाता नौकर सा उसको मालिक रखवाता। जो कहा वो करना जो ना उसको आता तो गाली गलोच से पेट भराता। तो क्या उसका मन नहीं भर आता वह मन में कहाहता। रोटी खाई तो सब सहना होगा। घर का कुता ना घर का ना घाट का बनकर रहना होगा। लात मिले जो बात ना आये समझ। बिना वजह मजाक उसकी मालिक रिश्तेदार बनाता। काम घर के करता रखवाली घर की करता। फिर भी गमों का साया छाया रहता मन ही मन पुछता। रोटी खाई तो सब सहना होगा। घर का कुता घर का ना घाट का बनकर रहना होगा। सपने घर में रह महल के देखे पर पुरे ना देखने को मिले। जाकर घर से बाहर रह नहीं पाया। घर के कुते ने घर में ही पैर जमाया। बाहर जाकर खाये क्या कुता सोंच वापस घर पर आया। मालिक की मिली वो ही लताङ वही मार। कहने लगा मन ही मन होकर उदास। रोटी खाई तो क्या सब सहना होगा। धोबी का कुता घर का ना घाट का होकर रहना होगा।। -कवितारानी।

हारा हूँ मैं / hara hun main

  हारा हूँ मैं हारा दर्द का मारा मैं लाचारा जाऊँ कहाँ। अपनों का मारा मैं बैचारा होकर बेसहारा जाऊँ कहाँ। दर्द से कराहता मन, बहती आँखे दिखाऊँ कहाँ। वक्त का मारा हालात का मारा जाऊँ कहाँ। खुद से परेशान दुनिया से नाराज जाऊँ कहाँ। गम भरे कई सारे इसे बतलाऊँ कहाँ। बेपर्दा होता तारतार होता मन दिखाऊँ कहाँ। बेइज्जती सहता बेईमान होता समझाऊँ कहाँ। शरण जो रण रही आश्रित तो श्रापित रही सुनाऊँ कहाँ। हारा दुख दर्द का मारा अब बेसहारा जाऊँ कहाँ। किल से चुबते ताने गहराते हॅसी के बाने दिखाऊँ कहाँ। नासमझ, पागल, कुत्ता, जानवर खुद को पाऊँ यहाँ। नौकर, हरामी, नीच खुद आये दिन सुनाऊँ यहाँ। टुकङो पर पलता दुसरों के फोकट खाता जनाऊँ यहाँ। वक्त का मारा गमों का सारा बोझ दिखाऊँ कहाँ। लेता कभी ईश्वर साथ कभी मुन्ना, मुनिया से करता बात। दर्द उनके महसुस करता आँसु उनके पुछता। पर खुद के आँसु दिखलाऊँ कहाँ। हारा दर्द का मारा में लाचारा जाऊँ कहाँ।। -कवितारानी।

कहाँ जाए / kahan jaye

  कहाँ जाए जग-जग घुमु, हर नयनों में ढुँढु। कहीं हो तेरा सामना, कहीं हो जाए सामना। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाऊँ कहाँ। तु जो कह दे तो तारों संग सारा नुर बिछाऊँ यहाँ। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाऊँ कहाँ। किस-किस से पुछे तेरा पता, किस-किस को कब तक निहारें यहाँ। ना होता एतबार किसी पर ना विश्वास यहाँ, फिर हम जाए कहाँ। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ कहाँ। मन मेरा मन संजोए है ख्वाब कई, सपने कई। तुम जो मिलोगे तो होगी पलकों पर तेरी सराहना। होगा ना जग से कोई सिकवा ना रब से कोई गीला। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ वहाँ, जाएँ वहाँ। पर अभी तो तेरी यादों के दुनियाँ से जाए कहाँ। जग घुमने से मिलता तु तो नयन सब जगह लङाए यहाँ। ये माटी की मुरत देगी साथ कब तक यहाँ। अब आ भी जा नयनों से नयन मिला ना दूर जा ना दूर जा। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ कहाँ, जाए कहाँ।। -कवितारानी।

साँझ सवेरे, मन के ढेरे / sanjh savere, man ke dhere

  साँझ सवेरे, मन के ढेरे दर-दर भटका लेकर मृत्युलोक का मटका। ना पाया द्वार तेरा, मंदिर-मंदिर टटोले, द्वार-द्वार पर बोले। क्या यहाँ हरि का आसरा। बिती गई रैना, पर रैना पर कोई नहीं पाया कम तेरा मेरा फासला। मन से बोले-तन को टटोले, क्या हो पाया कोई सासरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। गोधुलि बैला की रैला में पाया पावन सारा संसार यहाँ। कर भक्ति लेकर तन-मन की शक्ति के होये अब तेरा आसरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। दिन-दिन घुमें संत-साधु के भी लुमे, हो ध्यान मग्न। होकर भजन रत होकर अन्तर्मुखी ढुंढा आसरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। शाम को हर दिन करते आरती ढुब भक्ति रंग में पुजते हम पारथी। क्या दुनिया जब क्या संसार यहाँ बस तेरा मेरा था यहाँ फासला। क्या है यहाँ हरि का आसरा। फिर जब मामा चन्दा आए नीन्द गहरी लाए तब सपनों से तेरा सामना। लोक लुभावन लागा वो सब मनोहर लगा वो क्या ये तेरा आसरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। सब से पुछा हर भक्त से पुछा सक्स हर से पुछा पर कहीं ना मिला। तेरा आसरा, क्या है तेरा आसरा, कहाँ है तेरा आसरा, कैसे पाऊँ तेरा आसरा। कैसे आऊँ, पास आसरे के कैसे, कैसे, कैसे।। -कवितारानी।

मेरी खोज / meri khoj

 मेरी खोज चल रहा है वक्त निरन्तर बन कर्मठ नैतिक ज्ञानी। मानव हूँ मैं चलना है मुझे भी कर्मठ सा बन कर ज्ञानी। सुनी है राहें जीन पर चलने से डर जाता यहाँ। फिर भी ढुँढने को मन का आसरा भटक आता यहाँ।। मनका आसरा ढूँढूँ, ढूँढूँ मन का टापरा यहाँ। सुख-वैभव से भरा, मान, ज्ञान भरा आसरा ढूँढूँ। जहाँ हो ठंडक मन का आराम तन का जहाँ। जहाँ ईमानदारी, समझदारी हो समाज में ऐसी जगह ढूँढूँ आसरा।। फिर चलते भटक गया नया आसरा ढूँढ रहा हूँ। फिर सपने देखने लगा जो पिछले थे उन्हें भुलने लगा हूँ। फिर नयी दुनिया की तलाश में चल दिया हूँ। फिर मन का आसरा ढूँढ रहा हूँ, फिर नया टापरा ढूँढ रहा हूँ।। पल-पल है दुनिया रंग बदलती हम रहते बेरंग अभी जहाँ। हर पल जहाँ नई सोंच होती हम बैठे एक ही सोंच पर जहाँ। ऐसे में कैसे मैल करूँ वक्त कैसे बने वो आसरा। वक्त के साथ चल कैसे बनाए नया आसरा।। पर रुकना सिखा हमने कहाँ, थकना हमने जाना कहाँ। घबराये ऐसा लक्ष्य साधा नहीं, मंजिल अब दूर नहीं। मंजिल जो सोंची है देगी वो सपनों का आसरा। मिलेगा हमें जरूर अपने सपनों का आसरा।। -कवितारानी।

आपकी याद आती है / Aapki yaad aati hai

आपकी याद आती है गये कहाँ आप काश पता होता। बाकि उम्र में जाने का अहसास तो होता। कुछ याद रख सकुँ उतना तो साथ होता। मम्मी हो आप पता था पर उसका अर्थ काश तब पता होता। लब्ज वो दो जो कहे याद रख सका। ना कहा मम्मी किसी ओर को जो मेरा जवाब रहा। संभाला था होंश जब से आपकी चीजे संभाली है। अनमोल रत्न से किमती उनको संजोयी रखी है। दो अश्रु जो दिए लिए मैंने आते रहते हैं। क्या हुई थी खता के चेहरा धुँधला रहा। गये हो आप जब से गम के साये है। बिन बादल बरख से नयन बरसते आये है। क्या हुई खता जो इतने दर्द मिले। क्या हुई थी वजह की अब भी ये थमते नहीं। कल था निकल गया आज है चल रहा पर क्या आगे भी होगा यही। पाप है साथ पिछले जन्म का या वास्तु दोष साथ। कर्म ही है दर्द या दर्द ही कर्म की वजह। कहाँ, से क्या शुरु करुँ और कहाँ करुँ खत्म, अब तुम्ही बताओ। अब तुम ही बताओ, माँ तुम ही बताओ।।   -कवितारानी।

सहमा सहमा हूँ / sahma sahma hun

 सहमा सहमा हूँ सहरा-सहरा बन मोहरा चढ़ रहे घोङी। सहरा-सहरा बन मोहरा घूमा रहे अपनी लोरी। कहीं चहका-चहकी चहके, कहीं हवा दवा बन महके। कहीं मन-मौजी दिखे, कहीं तन तौजी बिके। कहीं हाव-भाव से मारे कोई, कहीं नैनों से करे वार पार। गहरा-गहरा कर घाव ताव चढ़ावे कोई। पहरा-पहरा कर मान बढ़ावे कोई। कहीं मन लुट खसुट चलत रही कहीं नयन मटक्का। कहीं ठुमका-ठुमकी होय रही। कहीं छुमकी-झुमका खोय रही। कहीं होय मन बावरा कहीं तन बावरा। सहला-सहला कर समझाये कोई। सहला-बहला कर भङकाये कोई। कहीं लु चली प्रेम दीवानी बन। कहीं बरखा सावन सा हो जाए मन। कहीं अप्सरा दिखे कहीं परी पर फिर मन ना होए बरी। सहमा-सहमा दिल पर ना जाए कहीं। घबरा-घबराया मन अब ना लागे कहीं। डरा सहमा यह समझाए सभी।। -कवितारानी।

तुम्हें भुलायें कैसे / tumhe bhulaye kaise

 तुम्हें भुलायें कैसे बिखरते सपने संजोये कैसे, तेरी याद को मिटाये कैसे। सपने दिखा गये हो आप, इन्हें हकीकत बनाये कैसे। नूर भरे चेहरे कई देखे थे, हुस्न के खजाने कई देखे थे। पर जो चाहत देखी है आपकी आँखों में उन्हें भुलाये कैसे। पहली नजर रही और पहला प्यार हुआ इसे जताएँ कैसे। पहली एक रात हसीन निकल गई आप अपने घर गई। पर दे गई दर्द कई उन्हें जहन से अपनी मिटाए कैसे। अब तक करते थे नयनों की चोरी हुई ना हुई थी दिल की चोरी। नैनों से हुआ जब मिलने की आस है और बस प्यार है बस प्यार है। इस प्यार को परवान चढ़ाये कैसे आपको अपना बनाये कैसे। कहीं कोई धोखा तो नहीं हुआ मन यूँ ही गुम तो नहीं हुआ। यूँ ही न तङपते रह जाएँ कहीं पटरी से गाङी उतर ना जाए कहीं। कैसे हाल अपना सुनाएँ आपको कैसे अधुरी कहानी बताएँ आपको। हाल बैहाल हुआ है अब इसे सही हाल लाए कैसे। सपने जो पल भर में संजोए है पुरे उन्हें बनाए कैसे। बिखरते सपने संजोए कैसे, तेरी याद को मिटाए कैसे। तेरी याद को मिटाए कैसे।। -कवितारानी।

किसे ढुँढते हो / kise dhundhte ho

किसे ढुँढते हो मिला नहीं किसी ज्ञानी को सुलभ उसे ढुँढते हो। मिला नहीं किसी विज्ञानी को कहाँ ढुँढते हो। वो है जो मन में तेरे तन में तेरे उसे कहाँ ढुँढते हो। वो है जो कण-कण में पास आस तेरे उसे कहाँ ढुँढते हो। जो सिर्फ देता है दाता बन वो है उद्दारक बङा महान्। जो सिर्फ दया, प्रेम, करुणा माँगे उसे क्या तुम देते हो। है अज्ञानी मानव उसका आशिष पाने को जुर्म की प्रार्थना करते हो। है मुढ़ बुध्दि मानव अपमानित कर उसे दया की भिख मांगते हो। करते प्रार्थना जिसकी धरती अम्बर बन पावन घङी में शुध्द हो। करते ऋषि, संत महात्मा योग, दान, धर्म की नैकी हो। मिले ना उनको आसानी से उसे तुम दबाव से माँगते हो। पुजा खुद कर सको तो दुसरों पर उसे ताङते हो। ये दिया उसका है अवसर देता वो गंवा रहे तो हो तुम फिर रोओगे। जब देना होगा मन उसे जब होगा तोल तब तुझे। महाज्ञानी है वो, महा दयालु है वो भक्तों के उध्दारक है। अहिंसक है वो शुध्दता, क्षमा, दया, भाव के पारखी है वो। उसे अँधेरे में रख हो तो ना कुछ काम फिर कैसे बुरे करते हो आप। कृपा पा जाओगे उसकी राह पकङो। ईर्ष्या छोङ मुर्ख से भी मिलता है ज्ञान क्यों फिर ज्ञानी से करे बैर। है ...

शाँत मेरा मन / shant mera man

 शाँत मेरा मन शाँत-शाँत था वातावरण, शाँत-शाँत था मेरा आवरण। थी शाँति ऐसी छोई के वातावरण में फैली थी गहराई। थी शाँति अनहोनी की आहट की किसी गाज के गिरने की। शाँत था शाँत मेरा मन, शाँत मेरा मन शाँत-शाँत था मेरा आवरण। लो आहट थी जो वो आ गई, शाँति को तार-तार कर गई। कर कई भस्म रुकावटें कर गई भस्म कई यादें। बस दर्द दे गई, बस दर्द दे गई, बस साँस रह गई। अक्ष बहे अश्रु से, नीर बहे नयनों से। हर भाव बहे, हर चाव बहे, बह गये सपने नयनों से। बन बेरी दोऊ आए चढ़, मुझ से कर आए सर। बन ज्वाला दोनों ओर से जला दिया मन शाँत कर। रह गई दर्द की आस रह गई वही पुरानी तरह की बास। पर समय है बदला-बदला है जमाना। अब गाज ओर गिर सकती है अब गाज भारी पङ सकती है। है जलन भरी मन में एक के एक मुङ बुद्दी है बाप। दुश्मनी रखी बिन मतलब बिता दिए कई साल। अब राख होना बाकि है या बन पंछी उङना है। अब यहाँ मुश्किल मेरा रुकना है, मुश्किल मेरा रुकना है। बेरी जहाँ जमाना, घर में भी नहीं प्यार दाना फिर कहाँ हो आना जाना। कहाँ हो आना जाना पर फिर है शाँत मन फिर है मन शाँत। मेरे सपने शाँत मेरे अपने शाँत।। -कवितारानी।

यादें धुंधला रही है / yaadein dhundhla rhi hai

 यादें धुंधला रही है सपने अधुरे रहने का डर सता रहा है। अपने से दुर होने का डर बढ़ा जा रहा है। दुनिया में अस्तित्व ना बनने से मन कुछ भुला रहा है। भूलता लम्हें, सजोएँ लम्हे धुँधला रहे हैं। यादें ताजा थी अब तक, अपने साथ थे अब तक। दुनिया रंग भरी थी अब तक, सपने सुहाने थे अब तक। पर अब यादें दूर जा रही है, अपने दूर जा रहे हैं। दुनियाँ बेरंग नजर आ रही है, सपने धुँधले हो गये हैं। यादें धुँधला रही है। जैसे घना कोहरा बढ़, दृश्य धुँध लाता है। जैसे घना धुँआ चहूँ और बढ़ता जा रहा हो। जैसे बादल जमीं पर आ गये हो। जैसे सबसे बहुत दूर आ गये हो, वैसे ही यादें धुँधला रही है। ये यादें धुँधला रही है। कितने अरसे बीते, कितने साल बिते। हर अरसे बरसे संजोयी जिन्हें, वो आज धुँधला रही है। अदृश्य ना हो जाए डर रहता है, कहीं मिट ना जाए यादें डरते हैं। फिर ना जी पायेंगे वो मित्र, फिर ना पायेंगे वो अपने इसी से डरते है। धुँधलाई यादें डराती है, धुँधलाए सपने डराते है। धुँधलाए जी ना पायेंगे, यादों को फिर दोहरायेंगे। करते रहेंगे याद उन्हें फिर ना धुँधलायेंगे, यादें धुँधलाई है।। -कवितारानी।

फाल्गुण आया / Falgun hai Aaya

 फाल्गुण आया हर्षोउल्लास का मौसम आया, सब तरफ फाल्गुण लहराया। मीठे सपनों का समय आया, मन में उमंगे हजार लाया। रंगो का त्योहार है आया, सब ने उत्साह से मनाया। देखो, देखो फाल्गुण है आया, मौज मस्ती है लेकर आया। अपनी आभा लहराने आया, मौसम का मिजाज बदलने आया। पतझङ को ये है अपने संग लाया, सर्दी को दूर भगाने आया। देखो-देखो फाल्गुण आया, गर्मी का मौसम लेकर है आया। प्यार मोहब्बत मन में भरने आया, ऋत मिलन की मन में जगाने आया। तङप अजब सी जगाने आया, मीत से अपने को है मिलाने आया। फिर नये रंग भरने जीवन है अपने आया, फिर उत्साह का संचार है करने आया। देखो-देखो मस्ती भरा मस्ताना आया, देखो देखो फाल्गुण है आया।। -कवितारानी।

हॅसो की कहानी / hanso ki kahani

  हॅसो की कहानी दो हंसो का जोङा होता, होता दोनो का मन मैल। एक जीये तो दुजा, नहीं बिन दूजे जीवन रैन। कमी आज तुम्हारी हुई, तुम बिन ना जीवन रैल। पूर्ण अंग होती तुम, होती फिर अर्ध्दांगिनी। तरक्की के पिछे होती, होती वैभव की रानी। तुमसे घर मंदिर होता, मुझसे होती सेज। मैं दिया होता हार का, होती तुम रोशन चहूँ ओर। मैं कर्म करता बाहर, तुम नैतिकता लाती धर्म संग। नारी घर का चिराग होती नर उसमें तेल। रोशन होता घर जब मिला करते दोनों मैल। जब तक ना होता सच्चा मैल बनता है बेमैल। आज अ्धुरे हैं पर चाहे मन का सच्चा मैल। डुँडते हैं सर्वगुण सम्पन्न तुझको ऐ नारी। जिससे बन सके हम भी नर-नारी। सप्त-चक्र, सप्त व्युह से बन जाए हम साथी और राही। के बन एक चल चले बन पटरी और रैलगाङी। तुम मुझे राह दिखाओ और में संग तेरे बनुँ संग तेरे राही। आओ मैल रचाएँ, रचाएँ एक संसार। सच करले सपने बन कर हम सरकार ही। आओ बन जाए दो हंसो का जोङा जैसे, होता प्रेम अनमोल जिनमें। एक जीये तो दुजा, ना बिन दुजे जीवन ना रैन। -कवितारानी।

मैं व्यस्त / main vyast hun

  मैं व्यस्त हूँ पूर्वांचल मे व्यस्त अपनी ही धून का धूनी मैं। ताजगी की साँसों को लिये हूँ मधुर फिजाओं की खुशबू सी भुनी मैं। आवाजों की आवाजाही है, आवाज अर्न्तमन कराह कहीं। धुनों में बंटा हुआ हूँ, आगाज बर्हीमन वराह राही मैं। किस ओर मुख करुँ, हर ओर महक है फैली सी। धरा काली, धुसर है, हर ओर महक है धुल फैली सी। मृगमरीचिका से खुद ग्रसित, लक्षित अपने राह को। मार्गदर्शक सा चल रहा, पिङित कर अपने आप को। था पश्चिम अस्ताँचल सा रवि फैला अपने आप में। दुर निगाह तकता कवि होता अपने आप में। आवाज अंतिम छोर से आती रहती अपने आवेश में। नियमित, संयमित रवि उदय पुर्व की बन आवाज ये। कथित कथनी कवि लय सुर्य की बन आवाज ये।। -कवितारानी।

मुश्किल है / Mushkil hai

  मुश्किल है कितना मुश्किल है मन को समझाना। यह कह पाना अकेले ही है रह जाना। कितना मुश्किल है मन को बहलाना। कहने को बचपन से बिछुङ गया हूँ मैं। यादों को भी बिसरा चुका हूँ मैं। पर छोङा जब भी अकेला खुद को। वहीं खङा पाया हूँ आज।। कुछ नहीं कमाया मैंने। कुछ नहीं पास मेरे। अपने तो थे नहीं कभी। परायो ने निभाया मुझे।। अब सब कुछ बदला सा लगने लगा है। अब जाने सब छुटा सा लग रहा है। भुल गयी वो चाँदनी मुझे। भुल गयी वो समाये मुझे। मैं भी भुला सा महसुस करता हूँ। मुश्किल है पर जीता रहता हूँ।। उलझा हूँ अपने आशियाने को गढ़ने को। परेशान हूँ अपनी कमियों से। बहुत मुश्किल है सह पाना। उन मधुर यादों की शौगातों को। बहुत कठिन है गुजार पाना। उस यादों के ज्वार को। रहना भी है, सहना भी है, गुजर रहे हैं लम्हें भी। जब भी खाली से बैठे हैं, खो गये वहीं कहीं। फिर दर्द भी जगा, उस दर्द का अहसास भी है। यादों की शौगात भी है और आँखों को प्यास भी है। कितना मुश्किल है तब हर पाना, मन को समझाना।। -कवितारानी।

सब बदल गया है / sab badal gya hai

  सब बदल गया है। बाल पक गये हैं, हाँ बाल पक गये हैं। देखे पुराने चित्रों को तो, समझ आया कि, हम थक गये हैं। वैसे थकान सी सुरत, बैचेनी, उदासी, चेहरे की उङी रोनक, ये पहले भी थी। पहले भी हुआ करते पके बाल, पहले भी रहती खुशी की तलाश, पर आजकल उमर असर ज्यादा है। जिम्मेंदारियों में समय आधा है। सुबह का भोजन, रात की नींद, और खुद की परवाह अब कहाँ। अब तो सुरज उदय होता है, और शाम को अस्त, वही बुढ़े लोगो से दुपहर सोते, और दिन भर काम को रोते। अब सब छुटा सा है, अब सब बदला सा है। सब कुछ मन का होना था। अब मन सब का सा है। हाँ समय बदल गया है। सुरत भी बदल गयी है। गाँ अब मैं बुढ़ा हूँ। अपने अंत को अग्रसर हूँ। पर मैं जिन्दा हूँ।। -कवितारानी।

मैं जिन्दा हूँ / main zinda hun

मैं जिन्दा हूँ अब आशाऐं भी क्या। जो तू नहीं साथ। अब सपने भी क्या। जो तू नहीं साथ।  अब वजूद ही क्या। जो तू नहीं पास। अब अपना भी कौन। जो तू नहीं साथ। अब रंग भी क्या। जो नहीं कोई पास। तेरा तुझसे जो बिछङा है। ये रवि बेरंग है। सात रंग छुपाये भी। पर धुप जलाये भी। साज नहीं सुर नहीं। जो गुण गान तेरा नहीं। अब बातों का रस खोया है। तेरा मैं जो जुदा है। अब कोई उम्मीद नहीं। जो पास तू नहीं। अब कोई इच्छा नहीं। जो तू साथ नहीं। कौन अब मन भाये। जो तु छोङ ना जाये। खुद से मैं अकेला हूँ। जब से तुझसे बिछङा हूँ। अपने आप में सिमटा हूँ। जबसे तुझसे बिछङा हूँ। खुद को व्यस्त रखता हूँ। जबसे तुझसे दुर हूँ। अब मैं बस जिन्दा हूँ। कुछ शर्मिंदा हूँ। आशाओं की खोज है। अब नीरस सब ओज है। अब बस साँसे है। और मैं जिन्दा हूँ।। -कवितारानी।

बैठा हूँ / baitha hun

  बैठा हूँ  कुछ भुले बिसरे लोगो में धाक जमाये बैठा हूँ। खुद से हारा बेसहारा मैं आग जलाये बैठा हूँ। अँगारों से खैलता आँखों में शोले सजाये बैठा हूँ। मन से हारा लकङहारा मैं शाख जमाये बैठा हूँ। वो आँख का तारा मन का मारा जग बिसरा बैठा है। खुद से हारा जग में प्यारा अपनी दुनिया सजाये बैठा है। तपती जमीन छोङ बर्फ में जलता हँसता वो खैलता है। खिलती जन्नत हॅसता वो अब सहारा सा लगता है। सोये सपने दूर अपने अपने जग को निहारता बैठा हूँ। मन में उमंग लेकर तरंग सब को माफ कर बैठा हूँ। नींद के मांदे रुप से आँधे आते जाते लोग देखता हूँ। अपनी जन्म भुमि से जुङा में अपना आज देखता हूँ। कुछ आशाओं संग, कुछ लेकर उमंग में साज सजाये बैठा हूँ। खुद को बुलंद करके अंग में राज राज छुपाये बैठा हूँ। संग सबका पाकर रंग अपना में बात बनाये बैठा हूँ। भुल दुख अपने लेकर जीवन सपने में आग लगाये बैठा हूँ।। -कवितारानी।

मैं अकेला आज / main aaj bhi akela

मैं अकेला आज मन में दबाये कई राज। आज भी अकेला हूँ। आज भी अकेला हूँ। खोज वही रोज है। आँखों में रोश है। मजबूर अपने सपनों से। मैं अकेला हूँ। आज भी अकेला हूँ।। आते जाते मिलते हैं। रोज नये रिश्ते खिलते हैं। रोज मिलते लोग बिछुङते है। कहते सुनते लङते हैं। अपने आप को छिपाये। अपने राज सबको बताये। मैं आशाओं का थैला हूँ। मैं अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ।। किसे अपना कहूँ। किसे मानु खास मैं। रोज नये झंझंट है। लुटते लोग बाग। यही सारी परेशानी है। तभी मैंने ठानी है। मेरी मनमानी है। तभी मैं अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ।। -कवितारानी।

बस कुछ दिन की मजबुरी है / Bas kuchh din ki majboori hai

  बस कुछ दिन की मजबुरी है। अपनी किस्मत अपनी साँसें। बनते बिगङते रोज निभाते। चलती रहती अपनी बातें। होती रहती नई सौगातें। बस यही जिन्दगी और मजबुरी है। गुजरते दिन बैठोर जिन्दगी है। यादों की अब जीवन से दुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है।। यादों से बिसरा हो जाऊँगा। खुद से जुदा हो जाऊँगा। आऊँगा ना लौट यहाँ फिर मैं। अपनी दुनिया नई सजाऊँगा। खोज में रोज मुश्किलों की सुली है। देख रहा हूँ कल को मैं। बस कुछ दिन की मजबुरी है। ये कुछ दिन की मजबुरी है।। आज आँख से आँसु दुर है। घुटन सा जीया दुर है। मन की मनमानी दुर है। तन की मजबुरी दुर है। साँसों की टकराहट दुर है। जीवन एक सार सुरुर है। बस यही देख कहता है। बस कुछ दिन की मजबुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है।। -कवितारानी।

मेरी छत से / meri chhat se

  मेरी छत से फिर एक शाम अकेले में, बैठा में निहार रहा। सोंच रहा देख रहा, यादों कि गालियों में घुम रहा। कहता कुछ आते जातो से, मिलता रोज मिलने वालों से। तिराहे का ये नजारा है, मन को मेरे प्यारा है। एक ठोर बन बैठा हूँ, बरसों से जमा बैठा हूँ। एक ताङ पुरब चढ़ गया, नीम छटी छटाई है। मेरी कुटिया टीन ओढ़ आई है, एक बगीया पङोसी की भी, एक कुटिया गरीब पङोसी की भी। सब कुछ बरसों से वैसा ही, कुछ ना बदला सब वैसा ही। देखा है बढ़ता अँधेरा, होती छाया, खोती काया। मेरी छत से, मेरी छत से।। पश्चिम ढलती लाली है, वो दिशा चुभने वाली है। अब खाली पङी जगह कोई, नई बनी है छत वही। कोई बैठा अक्सर देखा करता था। कुछ पल ही मैं मन हरता था। वो प्यारा आँख का तारा खोया है। याद आया वो मन रोया है। दुखी सी चार मीनारें दिखी। दिख पाया चेहरा कोई, पर मन को भाया ना चेहरा कोई। मुहॅ मोङ उत्तर पाया नयी छत, अब नया साया। माँ सी एक भोली छवि होती। हाल पुछती सब ठीक होगा कहती। यूँ ही दक्षिण सब छीपा सा। अब मन है खोया सा। फिर पुरब नजर करता मैं। मेरी छत से देखता मैं। ढुब गया आज का रवि। होगा सवेरा बात नई। मैं पश्चिम को गया पुरब में आया। थोङा ...

हवा शुष्क है, hava shushk hai

  हवा शुष्क है धुल भरी आँधिया, वादियाँ निराश है। तपती जमीन,  हवा शुष्क है, हवा शुष्क है।। है धरा धधक तेज, वेग में आवेश, रवि क्षितिज शांत है, फिर भी हवा शुष्क है। छांव घनी तेज है, पत्तों पर हर वेग है, शाँत सुकून आलोक है, पर हवा शुष्क है। गाँव गली विरानियाँ, खो गई कहानियाँ, आँखों में रोश है, हवा शुष्क है। साँझ शीतल आस है, हवा हो नम आभास है, आसमां में मेघ है, और हवा शुष्क है। ठोर-ठोर, ठहर-ठहर। पत्थरों को सहल-सहल, छु रही है ऊँगलियाँ, और हवा शुष्क है। डर है आंतक है, मन में कंपन है, तन में भय है, हवा शुष्क है। है खो गई वो फिजा, मस्त समां आसमां, खो गई चाह है, हवा जो शुष्क है। हर चेहरा रंग ओढ़ के, छाँव की खोज से, जा रहे अपने जहाँ, हवा शुष्क है। चल रही है जिन्दगी, अब यही है बन्दगी, अब यही है सुना, हवा शुष्क है। बीतने को है समा, खोने को है जहाँ, आने को है बर्खा, हवा अभी शुष्क है, हवा शुष्क है।। -कवितारानी।

शराबी कहर / sharabi kahar

  शराबी कहर वो शाम क्या शाम होती जब शराब की आँच ना होती। वो रात भी शाँत होती जब मदिरा आम ना होती। शुकून में कटते हैं दिन जब दिनों-दिन दारु ना होती। फिर मन सोंचता है फिर दिमाग में कोई हरकत होती। कि काश ये शराब ही नहीं होती। तो जी लेता बचपन हॅस खुस होकर। जी लेता मां और मम्मी मेरी अगर ये दारु ना होती। बचपन की हर उमंग नये पंखों के संग होती अगर शराब ना होती। ना दुख होता ना चिंता ना कोी कमी आर्थिकता की होती कमी। ना शर्म से आँखें नम होती ना आँखें नम होती। ना बेबस हम लाचार होते ना हम बेचार अँधियारे होते। ना तुमसे कुछ गीला होता ना रब से शिकायत होती। अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती। खुलकर जीते जिंदगी, जिंदगी की राह भी सुहानी होती। ना होता पथ भ्रम ना किसी से मदद की गुहार होती। मंजिल इतनी पास होती चमन होता आशियाना और महल अपना। अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती। मद के मद मे मदा है जो मर्द, नहीं उसे किसी की कद्र ना कोई हद। मद के मदिरे में मरी पङी है मदिर की मत। क्या करे मद का मारा जिसने समझ खुद को इसका आदि लिया। अगर बाप ही हो मदिर हो जाते हैं सब अधिर। बन बेचारा कट गया जीवन आगे क्...