संदेश

देश मेरे / Desh mere

  देश मेरे देश मेरे... देश मेरे, मेरी जान है तु। देश मेरे... देश मेरे, मेरी जान है तु। तेरी मिट्टी जोङे मुझे तुझसे मैं हूँ। देश मेरे... देश मेरे... नाम आये जब तेरा लब पर दिल कुरबां होवे यूँ। आँच आये आँचल तेरे पर तो खुन खोले यूँ। देश मेरे... देश मेरे... नाम होवे सबसे ऊपर ओर उसमें सहयोगी हूँ। माता कहते तुझको हम शिश तुझ  पर झुकायें यूँ। गोदी जैसे माँ बेटा बिलखाये जूँ। नाम जिंदगानी तुझसे, तुझपे जहाँन वार दुँ। देश मेरे... देश मेरे... कर मतवाला वीरों को तुझ रक्षा बढ़ाऊँ यूँ। आँख ऊठा देखे कोई तो शिश कदम रख दुँ यूँ। नाम करूँ, उल्लास करुँ, करुँ जय जयकार जहाँ रहूँ। देश मेरे... देश मेरे, देश मेरे माँ है तु, देश मेरे... देश मेरे... मेरी माँ. देश मेरे देश मेरे मेरी जान है तु। -कवितारानी।

मैंने नया जहान देखा / Maine naya jahan dekha

मैंने नया जहान देखा मैंने इस जहान मैं आज एक नया जहाँ देखा। दिन में रात और रात को नये राग में देखा। गहराई थी गहरी और सुहावनी थी घङियाँ। एक-एक पल कट रहा था मानों हो एक-एक जीवन। मैंने उस मंद मुस्कान के साथ एक खुबसुरत जहाँ देखा। जिस पल देखा लगा की एक सुनहरा इतिहास लिख बैठा। तेरी आँखों की सच्चाई मैं जहाँ सारा भुला बैठा। वो मदहोश गहराई देखी, वो अद्भुत अहसास देखा। देखा वो पल जो शायद किसी ने परिलोक में देखा। एक-एक पल का क्षण लाखों पुण्यों का फल लगा। लगा जैसे इनसे ही है जहाँ और इनसे ही अंत देखा। तेरी आँखों में पुरा समय चक्र देखा। मैंने तेरी आँखों में जो खुबसुरत जहाँ देखा। सजाए रखा हो उसे अब भी, और फिर चाहता हुँ देखना। मैंने तेरी आँखों में नक्षत्रों को मिलते देखा। हाँ मैंने वो खुबसुरत जहाँ देखा।। -कवितारानी।

तेरी बात / Teri Batein

तेरी बात आये पल हजार, हजार थे लम्हें। हर पल थी उम्मीदें तुमसे, कुछ थे सपने। जब भी मैंने सोंचा मिले तुम नहीं। जब भी मैंने देखना चाहा, तुम दिखे ही नहीं। जब भी मैंने चाहा सुनना, तुम बोले नहीं। जब भी मैंने कुछ कहना चाहा, सुना तुमनें नहीं। हैं इत्तेफाक या जोङी मैल नहीं। है तेरा गुस्सा या लायक मैं नहीं। या ये किस्मत है कि तुम मेरे नहीं। पुछुँ मैं रब हर घङी, हर घङी। क्या है तेरी मर्जी, क्या है तेरी मर्जी। हो रहा दिल मझसे खफा, मैं तुझसे खफा। क्या तुने चीज बनायी, क्या बनायी रजा। ऐ मेरे खुदा है मेरे जहाँ। अब जीना है या मरना, अब कहना है या चुप रहना। मुझको बता तू मुझको बता। है मेरे ईश्वर मेरे खुदा।। -कवितारानी।

विनती / Vinati

विनती करता हूँ विनती अपने प्रभु से, कहता हूँ यह सब से। की अभी है राह लम्बी साँसे बचाये रखना, दुर है मंजिल अपनी हौंसला बनाये रखना। हो रहे हैं असफल अभी पर विश्वास जगाये रखना। किस्मत भी साथ नहीं दया दिखाये रखना, कांटे आ रहे हैं कई सुई मलहम तैय्यार रखना। दर्द ही दर्द है करुणा बनाये रखना, करना दुआ-प्रार्थना की सफल हो जाऊँ। लक्ष्य ना सही उद्देश्य तो अपना पाऊँ, राष्ट्र का ना सही गाँव का विकास मैं कर पाऊँ। रिश्तेदार ना सही दोस्तों को साथ में पाऊँ। करना इतना मेरे लिए मेरे प्रभु। कि आशा का साथ होंसले से थामें रखुँ, आलस और निराशा से दूरी बनाए रखुँ। कर सकुँ सकारात्मक कार्य नकारात्मक ना बन पाऊँ, करुँ पुजा अर्चना दया-प्रेम का ही गुण गाऊँ। रखना हाथ सिर पर देना आशीर्वाद, बनी रहे कृपा आपकी विनती है आपसे मेरे नाथ। जय, जय, जय हो प्रभु आप।। -कवितारानी।

मन की आवाज / man ki aavaj

मन की आवाज तब होती चाह ना ओर जीने की, तब पकङ हाथ आशा का दम भर जीगर में। बेहरा होके और अंधा होकर देख मन की, आँखों से और सुन मतबल की बात। कर हौंसलों को मजबुत करता नित काम, एकाग्रचित हो जो करता है लक्ष्य पर वार। दुनियाँ करती उसको सलाम्, दुनियाँ करती उसे सलाम। कहती है तब जमीं ना हटुंगी अब छोङुंगी तेरा साथ। हो चाहे दिन-रात, दलदल हो या दरार। कहता है ये गगन तु ही है मगन। दुँगा पुरा तेरा साथ है चाहे ऋत बंसत, बर्खा, सावन आज। कहती है काया फिर की रहुँगी अब तेरे साथ। ना छोङुंगी तेरा साथ बस दृढ़ तो तेरा आत्मविश्वास। तब भगवान कहे आशीर्वाद है मेरा तेरे साथ। तब में खुद से कहूँ की अब क्या डरने की बात कृपा है। जब सबकी साथ, तब मन कहे धन्य हो दुनियाँ देवी। तेरे रुप है अनेक, तू रखती सबका ख्याल, बस भी लेना संभाल की माया तेरी अपार। -कवितारानी।

दुनिया / Duniya

दुनिया दुनिया अजीब है दुनिया, ख्वाब कितने दिखाती दुनियाँ। अपनों को मिलाती-बिछङाती दुनियाँ। कितना बङा अर्थ लिए है ये दुनियाँ। सारा जहाँ, सारा नभ, तीनों लोक शामिल हो इसमें जैसे, सच भी तो है ये कहना, विस्तृत है इसमें। सारे गम भरे पङे जहाँ वहीं पङी सारी खुशियाँ। सारे दोस्त है जहाँ वहीं सारे दुश्मन भी है यहीं। जितनी खुबसुरती लिए है वहीं इन्सानी गंदगी भी भरी है यहाँ। कहने को पुरी हलचल, स्थिरता, सच्चाई लिए है ये दुनियाँ। ये दुनियाँ गजब की है ये दुनियाँ। पल-पल रंग है बदलती ये, हरपल गम देती ये। खुशियाँ होती है जब सब गम भुला देती है ये। जहाँ दगा करते मित्र, रिश्तेदार, ताने मिलते हैं जहाँ हजार, अपने पराये सब शत्रु बन, जब करते हैं दिलों दिमाग पर वार, जब प्रकृति ही अपने विपरित हो जाए। तब रहता बस नश्वर शरीर अपने साथ। तब होती है नफरत खुद से, तब टुटता मन हर पल। तब समझ आती है असली दुनियाँ।। -कवितारानी।

कौन अपना यहाँ / kon apna yha

कौन अपना यहाँ कौन यहाँ अपना होता है, जो होता है अपना मेरे लिए वो है सपना, प्यार कहते हैं किसे किसी ने जताया ही नहीं। गमों में जीते हैं कैसे जिंदगी ने सिखाया बस यही, वक्त मिला तो सुहाने दिन पाये पर वो भी दहशत में बिताये। जब देखता हूँ अपने तो इच्छा होती नहीं अपना कहने की, जब सुनता हूँ आदर्श पिता, भाई की तो कल्पना तक नहीं होती। कहाँ मिलते हैं आदर्श देखने की इच्छा रही बहुत, मुझे तो मिले स्वयं राक्षसी, मतलबी, लालची, मुर्ख। कैसे कहूँ आदर मैं बङों का करता हूँ, कैसे में दिल से अपना तक कहूँ। जब नाश्ते में ताने, भाव में ईर्ष्या और त्योहारों में गालियाँ भर्त्सना मिले। हर दिन और हर समय रोक टोक मिले। जब बोले तो चुप करे और ना बोले तो गुन्ना कहे। घर में रहे तो डरपोक, चुहा और घुमें तो गुण्डा, उठाइगीरा कहे। जब पङे तो पङाकु किङा और ना पङे तो जाने क्या करेगा। ऐसे में करुँ तो क्या जाऊँ तो कहाँ, किससे पुछे, दुख सुनाये किसी से तो दुख बङे ना सुनाये तो दम घुटे। फिर कैसे मानसिक तैयारी हो और शारीरिक तैय्यारी, बस कहे तो कहे है राम अब लेना आप संभाल, जब ना संभले तो बतला देना, फिर मुझे यहाँ नहीं रहना। -कवितारानी।

सुनी भाग-18 उपसंहार / suni part-18 The Conclusion

  सुनी भाग-18 उपसंहार ये कहानी थी बाल विवाह की, नहीं ये कहानी थी एक लङकी की, नहीं ये कहानी थी सफलता की, नहीं ये कहानी थी समाज के आईने की। नाम चाहे दो कुछ, इसका विस्तार चाहे दो कुछ, पर है ये मर्म एक जान का, ये भाव था एक छुपी हुई जान का। जब काल का काम आता है, सब रिश्तों नातो को से खा जाता है, जब बुरा समय भाग्य में होता है, तो कोई कुछ नहीं कर पाता है। पर जो किया दृढ़ संकल्प तो, काल को भी मानना पङता है, जब जपा नाम भगवान का तो, बुरे समय को भी जाना पङता है। जो सुनी जकङी थी समाज में, उसने समाज को झुका दिया, जो सुनी थी अनजान दुनिया से, उसने दुनिया को दिखा दिया। वो नारी बन के आई, उसने अपने मन की कर दिखाई है, लक्ष्य साधा अपना खुद ने, जिद से ही व्याख्याता बन दिखाई है। पर मन की पीङा तो मन ही जाने, जो घाव पङे मन पर वो कौन जाने, तन को सवाँर वो लेती है, पर यादों में बंधी वो रहती है। है जोर जग का और बंधंन है तन का, उसपर विजय पानी है, यह तो आधी ही कहानी है, अंतिम मुकाम तक हिम्मत उसे दिखानी है। हम कामना करे भावी भाग्य की, जो हार रहे हिम्मत उन सबकी, सिख जो दे रही सुनी या नहीं आपने, सुनी की कहानी सुनो...

सुनी भाग-17 प्रत्यक्ष भाव / Suni part-17 Pratyaksh bhav

  सुनी भाग-17 प्रत्यक्ष भाव लिखते-लिखते उसके नाम पे, आ गये प्रत्यक्ष भाव पे, कौन-कहाँ किस मतलब से, समझ रहा अपने काम से। भौर समय जब कभी दर्शन था, जमीन पर निगाहें होती मुख तरसा था, कुछ दुख की मारी और सताई, नजर आई सुनी पुरवाई। अपने दुखों का भण्डार समेटे, मैं मिल रहा खुशी से दो घङी,  वो अपने आप की सताई सी, अपने साथी सखाओं में उलझी थी। धीरे-धीरे दिन बीते, महिनें भर में खास साथी छुटे, स्वार्थ कहे या कहे आत्मरक्षा ही, पर सनी उसके साथ ना थी। अचरज सबको मुझे भी था, खास साथी का उससे काम ना हुआ, अधिकार दुसरे साथी ने पुरे किये, जब सुनी सी.एल. पर थी जीये। ये कैसी छवि उसकी दिखी, पर नौकरी ही थी खास कमी दिखी, भावनाओं की बाढ़ पैरासुट में थी, साथी से ज्यादा परवाह खुद की थी। कौन कहेगा विश्वासी रही, अचरज नहीं जो सुनी स्वार्थी कही, पर मुझे खुशी थी साथी बिछुङन की, अब मेरी ही सुनी अकङन थी। कुछ दिन महिनें ही लगे, घुले और आगे बढ़े, मैं जहाँ अपने आप का मारा, वो भी हुई थी अब बेसहारा। पैरासुट ने साफ मना कर दिया, शादी होगी उसकी अब बात टाल गया, साथी राम-राम कह गया, अब मैं ही रह गया। कुछ खास कोशिस ना की, उसम...

सुनी भाग-16 दोस्ताना / Suni part-16 Dostana / Friendly

  सुनी भाग-16 दोस्ताना मन की विरानियाँ आम थी, खुशियाँ मिलती दुखों के दाम थी, एक तराजु जैसे जोङा था, जीवन में निराशा का फोङा था। रह सह आ जाती थी, प्रेम पीङा छा जाती थी, कहती कहाँ क्या चल रहा, अपने मन में वो मल रहा। महिनें दो महिनें में बात होती, बीच के समय याद में रोती, अब काम के सिवा आराम था, आराम में मन में वो राम था। कमियाँ ना उनमें ना इसमें थी, दोनों की अलग-अलग किस्में थी, किस्मत का साथ ऐसा ही, सोंच दुर हो रही जैसे ही। कौन अकेला रह पाया, जीवन दुख सह पाया, कल का बीता वापस ना आता, मन का उतरा फिर ना छाता। कुछ समय बाद ही, एक सहयोगी मिला साथ भी, हर कदम पर पास रहा, काम में भी आराम रहा। धीरे-धीरे घुलने लगे, विध्यालय के बाहर भी मिलने लगे, सब जान गये दोस्त काम के, इनके रिश्ते हैं बस नाम के। सुनी का खालीपन दूर हुआ, विवाहित साथी का नुंर हुआ, अपने मन के बोझ से, उठ रही थी अब ओज से। रोज-रोज अब मौज थी, साथी की जैसे खोज थी, खुब मस्ती की बातें थी, रोज बन रही यादें थी। साफ रंग और सुन्दर काया, बोली में मिठास और माया, औहदे का रुतबा इतना ना था, चरित्र में उसके जितना दम था। अनायास सब खींच आते, पास जा...

सुनी भाग-15 विध्यालय व्याख्याता / Suni part-15 school lecturer

  सुनी भाग-15 विध्यालय व्याख्याता संघर्षों के समाज से, कोशिशों के आयाम तक, अब तक जो अडिग थी, अब मुश्किलें कम थी। घर समाज पिछे छुटा सा, आत्म मन्थन में जीवन रुठा सा, छब्बीस से सत्ताइस साल की हुई, सुनी अब आत्मनिर्भर हुई। दबाव पहले सा नहीं रहा, मन पर कुछ भार अपना रहा, याद केवल कल का साथी रहा, सोंच बस कल की रही। कल के बेहतर की आस कर, लगी रहती अपने बाप पर, कैसे भुले मधुर रस को, कैसे रोके कङवे कल को। सबसे अधिक पङी लिखी समाज में, लोग देखते मान अभिमान से, कुछ बुरे भी पास आने लगे, दुश्मनों को भी भाने लगे। लक्ष्य सामने पाकर वो, लग जाती सब छोङ वो, हार होती बार-बार, मन्नतें करती हर बार। मन को संभालती आगे बढ़ती, रुठती, मनाती सबसे कहती, एक दिन नौकरी पाकर रहूँगी, आप सब को चुप कर दुँगी। कई बार असफलता आई, बार-बार सुनने लगी हाई, मन को तोङ लगी रही, व्याख्याता बनने की कहती रही। काम छोङ कोटा गई, पढ़ाई के लिये लङ गई, घर से डेड लाईन मिली, नहीं नौकरी तो तू गई। साफ लब्ज और कुछ खर्चा, पर पास नहीं हुई तो जाना होगा, कोई मैं-पर नहीं चलेगी, अब तुझे हमारी सुननी पङेगी। मान बात गई कोटा, सहेलियों साथ रहती कोटा, अब भ...

सुनी भाग-14 प्रेम विरह / suni part-14 Prem Virah

सुनी भाग-14 प्रेम विरह धीरे-धीरे ही सही, प्रेम प्रकाश को खो रही, दर्द के अब साये जागे, रात भर दवा को वो रागे। भुली अपनी बाल पीङा सारी, काम पर जाती और गाती, कब आयेगी काॅल उसका, कब कहेगी है दोष उसका। अब क्या जाने कौन दोष में, पर सुनी दिखने लगी रोष में, जोश अब सबको दिखता, हर कोई कहता क्या हुआ, कुछ बदला दिखता। कुछ नहीं हुआ कह देती,  संभाल खुद को देती, फिर घुम फिर कमरे में जाकर, खुब रोती उसे याद कर। रोज-रोज की तङप बङी, मिलने बात करने की तलब बङी, कहती सखी से अपनी सारी, बाकि रहती जैसे मन की मारी। मन की मन में रख कर, कभी कहती नहीं उससे बात कर, घुट-घुट कर इंतजार भी करती, पर बात का कभी इंतजार ना करती। अच्छे दोस्त, वो भी यही कहता, शादी, घर वालों के हिसाब से कहता, प्यार का अभी कोई किस्सा नहीं, तुम हो फिर कोई मिला नहीं। बातें ही थी याद आती रही, सुनी के गमों को बढ़ाती रही, रहना भी कभी-कभी मुश्किल हुआ, सहेलियाँ भी मांग रही अब दुआ। हाय विरहणी ऐसी थी, बात करती पर हॅसती थी, घंटो तक अकेले बैठा करती, खोई हुई वो एक टुक देखा करती। मधुरता के सारे आयाम अब, खो गये कहीं जमाने में अब, करियर की चिंता उसको थी,...

सुनी भाग-13 प्रेम बंधंन / suni part-13 Prem Sambandh

  सुनी भाग-13 प्रेम बंधंन हवाओं के खिलाफ, अदाओं के लिहाफ, अब जब नव उमंग थी, सुनी सुनाई एक तरंग थी। रोज का काॅलेज जाना रहा, अनचाहे कुछ बदला रहा, जो अहसास नहीं था पहले कभी, वो साहस अब मन करने लगा। विध्यालय, महाविध्यालय अपने आप को रोक था, आये बहुत पाने को पर खुद को टोका था, पर वश कहाँ चलता चलाने से भी, ये दंश चुभता है वक्त आने पर ही। जहाँ सुनापन रोज-रोज की टिस थी, ना सुनने-समझाने वालों पर रीस थी. आये दिन के दबाव से जो खीज थी, अब नयी लहर से ये मन की सींच थी। रोका बहुत फिर भी हो गया, टोका बहुत पर मन खो गया, वो बातें अनचाहे चाहने लगी, अब प्रेम बंधंन में सुनी बंधने लगी। इजहार ना था, ना प्यार सा, पर आकर्षक था अनुमान सा, कुछ अच्छा सा लगने लगा, किसी को देख मन खुश रहने लगा। ऐसा हुआ ना था पहले कभी, मन ही मन संतोष को जन्म देने लगी, शाँति सी खुशहाली बन छवि दिखी, अब मन की बात कवि बन लिखी। किससे कहती सुनी बात को, आखिर साथ थी कही उसी को, समझाया कुछ-कुछ छेङा उसने, हर बार बात को फेरा उसने। मौका मिला साथ रहने-घुमने का, विश्वास बढ़ा पास-पास रहने का, जीवन से आधार लेने लगा, अब सब कुछ बस प्यार में रहने लग...

सुनी भाग-12 संघर्ष, रोजगार, आत्मनिर्भरता / suni part-12 sangharsh, rojgar, aatmnirbharta

  सुनी भाग-12 संघर्ष, रोजगार, आत्मनिर्भरता समय सार कई बातें थी, आत्मनिर्भरता की रातें थी, सुख चैन कुछ खोया सा, मायुस मन था रोया सा। आत्मनिर्भरता का ऐसा साया, मनोबल पर कहर बरपाया, आया संघर्ष रोजगार बनकर, छाया जहर भविष्य पर। हर कोई अपना ज्ञान बताये, ऊँचे शिखर पर चढ़ाये, तो कभी गहरी खाई में ले जाये, बैरी मन भी तो कुछ ना भाये। सहमा से वहमा सा मन लेकर, अंहकार सा गर्व, कुछ तन लेकर, अपने रोजगार को निर्भरता के रुप लगाया, तभी आगे बढ़ने का होंसला आया, दिन भर कर्म पथ पर बढ़ कर, शाम घर खेत घुम कर, रात-रात भर पढ़ना रहा, सरकारी बनने का जुनून बढ़ता रहा। खुद जाकर या भेजकर के किसी को, हर पाठ पढ़ा नौकरी पाने को, हार ना मानी घर समाज से तो, हार कैसे मानें वो खुद से यों। खुलती ना आँखें नींदो से भरी जो, लगती ना आँख सपनों से भरी जो, कठोर तप है अगर तो मुझे करना, हो कोई बाधा पर मुझे लङना। शाम सवेरे और समय निकाला, चित्तौढ़ के गौरव को मन उतारा, साहस का थाम दामन वो, पढ़ रही थी आत्मनिर्भर होने को। उलाहना का अब फर्क नहीं, उल्टे बोल को सुल्टाती वहीं, कहती बस अब फिर मन की, चलने किसी की देती नहीं। दबे मन में सपने ...

सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट / Suni part-11 Dharm Arth sankat

  सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट घोर विपदा छाई, धर्म-अर्थ संकंट लाई, सब ओर उलाहना सहती, वो अब अकेले रहती। कहती कम गुम सी वो, काम करती रहती वो, बोलना चलना कम हुआ, अब जीवन एकाकी हुआ। समझ थी सबकी सोंच की, बात कहती पर पहले तोलती, मायुसी का मुखोटा ओढ़ा, जीवन को काम से जोङा। नये दोस्त बन गये, बच्चों मे घुल-मिल गये, पर मन में थी कुछ ठानी, कोटा जाकर नौकरी पानी। अर्थ का संकंट रोके था, धर्म का कांटा चुभ रहा, जैसे-जैसे अब चल रही, सुनी जिन्दगी कट रही। बोझ ना थी अहसास जगा, आत्मनिर्भरता का स्वाद चखा, रोज-रोज निमट कर जाना, खुद को कुछ काबिल बनाना। आसान ना थी पर झेल रही, सपनों को फिर बैग में मेल रही, कह रही खुश हूँ पर खुश कहाँ, अनसुनी मैं मेरी सुनी कहाँ। बच्चों में बच्ची बनती, स्टाॅफ से कुछ ही बनती, रोज अपने आप को संभालना, सुनना ना किसी की उलाहना। कुछ पैसे मिलते थे, अपने खर्चे चलते थे, घर से सारी मदद गई, अब वो भी कमाने लग गई। सुनकर जवाब चुप रहती, पर कुछ ना अब किसी कि सुनती, छोङ घर चली ही जाऊँगी, अगर किसी को बुरा पाऊँगी। खुद से लङती और कहती, चली ही जा क्यूँ सहती, पैसे वाले हैं खुश रखेंगे, तु कहे वैसे र...

सुनी भाग-10 पारिवारीक दबाव / suni part-10 parivarik dabav

सुनी भाग-10 पारिवारीक दबाव सबकी प्यारी लाङली वो, हॅसती, हॅसाती, रुलाती वो, मन में रखती नहीं कुछ भी हो, कह देती जो भी सुनी हो। बाल जीवन आनंदित था बिताया, सामाजिक कंलक ने जहर थमाया, घर वालों का साथ भी मिला, पर मन में रही मन की गीला। शिकवे कई, शिकायतें कई, पर हरदम उसे मौज रही, किसी का जोर चलने ना देती, मुहॅ फट थी सब कह देती। मोहल्ले की वो रानी थी, स्कुल में हर दम मनमानी की, काॅलेज में किसी की चलने ना दी, घर पर उसकी चलती ना थी। बस लाङ प्यार का सहारा, जहाँ हारे वहीं आँसुओं की धारा, जैसे-तैसे कर बित गई उमर बचपन की, अब पढ़ाई पुरी कर बात हुई जवानी की। ओने-पोने दे आने के लोग, छिंटा कसी कर देते रोज, रोज-रोज के बहानों की धुनी, अब पारिवारिक दबाव में सुनी। सारी कोशिशों से हारे वो, चली नहीं कहीं चलाई जो, लङका रहा नोंवी फैल, लङकी एम. एस. सी. कर ली तो। अब बैमेल रिश्ता भी कहते, लोग टोंट कसते रहते, सुन-सुन के वर वोले ताव में, सुनी को ले आये पारिवारिक दबाव में। अबकी बार चाल चले, घर ना चुनकर समाज चुनें, बुलाई बैठक अपनी वधु चाहने को, आरोपित किया पिता समाज बिगाङने को। सम्मानित सदस्य समझाते रहे, पिता अपनी और...

सुनी भाग-9 स्नातकोत्तर / Suni part-9 Post graduation

  सुनी भाग-9 स्नातकोत्तर पास होती गई वो ग्वाली, मस्त रहती थी वो बावली, शिक्षक प्रशिक्षण भी हो गया, अब घर पर पहरा हो गया। खुब मौज में फिर लौट आई, रोज शाम को वो दोस्त पाई, बातें अब मोबाइल पर थी, सुनी अब सबसे खुश थी। विद्वानों का सामर्थ्य मिला, पथ पदर्शन और घर का साथ मिला, सबकी तारिफें सुन परिवार खुश, आगे भी पढ़ना है चाहे हो दुख। कुछ समझाया कुछ माना, घर वालों ने उसे जाना, स्नातकोत्तर में फिर प्रवेश लिया, निरंतर अध्ययन को पुरा किया। फिर से रोज पढ़ना था, काॅलेज लाइफ में जीना था, खुशी के लम्हें सज रहे, सुनी को पीपंल खिल रहे। जिक्र नहीं ना देखा वर को, बालपन में बांधा जीवन को, एक बार काॅल आया भी, कुछ सुनी को भरमाया भी। साफ शब्दों में दो टुक कहा, मैंने कभी तुम्हें अपना ना कहा, साधो अपने जीवन पथ को तुम, मुझसे रहना हमेशा दुर तुम। फिर ना दुबारा काॅल हुआ, नम्बर ही बदला जो मन में बवाल हुआ। कहती रही सखियों में सब, जीवन की रही सलाखें जब। नव उमंग परवान थी, सुनी अब रसमय खान थी, अपनी मर्यादा में बंध कर ही, प्रेम पढ़ाई कर रही थी। काॅचिंग जाना काॅलेज जाना, संस्कारों में पहने वस्त्र दिखाना, खुलके सबको ह...

सुनी भाग-8 शिक्षक प्रशिक्षण / suni part-8 shikshak prashikshan

सुनी भाग-8  शिक्षक प्रशिक्षण अपने ओज और अपने गुण, मिले जो शब्द उनको बुन, लिखी ये कहानी जो है बुनी, अब एक मोङ पर आयी सुनी। एक बार मे ही ब्रेक किया, प्रथम प्रवेशिका परख पास किया, पुरी पढ़ाई करके लक्ष्य पर अब,  शिक्षक प्रशिक्षण महाविध्यालय में अब। वही सीमित संसाधन थे, पर अब बहिन भाई के पास साधन थे, पैसे की कोई कमी ना रही, अच्छे मन से वो रोज काॅलेज गई। नव योवन सुंदर मुख, श्वेत रंग रोचक सुख, काया से बलिष्ठ ऊँची थी, सुनी मन की पर पुरी खिली थी। साङी की पौशाक शाक पर, दिखती अब बहुत धाक पर, कुछ अहं यहीं से जन्मा था, जब सबसे कुछ अच्छा सुना था। सुनेपन की अब परवाह नहीं, व्यस्त जीवन अब परवाह नहीं, गाँव शहर से संपर्क टुटा, रोज काॅलेज से नाता जुङा। अप टु डेट रहना था, मस्त लग रही सबका कहना था, पढ़ाई में सबसे आगे थी, कुछ खुशी मन की जन्मी थी। चर्चाओं का यहाँ बाजार गर्म हुआ, नैनों से मन नर्म हुआ, देख एक अनजाने को, अपनापन पनपा उसे पाने को। नया परिवेश नई उमंग थी, रोज देख-देख चाहत दंग थी, एक अहसास प्यार सा हुआ, संभाला बहुत पर असर हुआ। ध्यान कर अपना बचपन, कुछ कङवे किस्से और भदा मन, जीवन डगर भविष्य की...

कोई पुछे / koi puchhe

  कोई पुछे कितने दर्द है इस दुनिया मैं कोई मुझसे पुछे। दुख किसे कहते हैं कोई मेरी रग से पुछे। दर्द होता है और आँखे बरसाती नदिया बन बहती है। कराहना चाहता है गला पर आवाज कैद होती है। दहशत में हर लम्हा हर घङी मन बैचेन रहता है। जब थोङी आवाज से ही दिल घबरा जाता है। फिर पुछे कोई मन से कि दर्द क्या होता है। जब सुख देने वाला पालनहार ही दुख दाता होता है। जिस के आसियाने में रहे वो ही राक्षस शैतान खुनी होता है। उसकी नजरों से नजरें चुरा जिने में जो मर्ज होता है। इस हालात में कोई पुछे की दर्द क्या होता है तो कैसे ये बयां होता है। एक किरण आस की चाहे मन चाहे कि खुशी कहीं दिखे आस-पास। चाहे मन की किसी को करे दर्द बयाँ। पर कोई नहीं आस-पास होता है जिसे बतायें वही राक्षस मित्र होता है। तब पुछ मुझसे की दहशत में जिने से क्या होता है। रोके मन बहने से नीर इन आँखों से रोके गले को आवाज करने से। चहरे से कहे की हँसता दिख नहीं तो समाज बुझदिल कहेगा। पर उधर पाजी राक्षस कोङे मारे तो नीर अधीर हो बता देता सब है। तब पुछ मन से की दुख क्या होता है। मैं पुछता हूँ मन से की क्या होता तेरा बात वक्त मानता नहीं । ना मानता न...

खत थारे नाम / khat thare naam

  खत थारे नाम एक खत लिखुँ थारे नाम, यो पत्र लिखुँ थारे नाम। बतलाने को दशा म्हारी, थेई समझणे को बात म्हारी। जग बणायो थाने छोको घणों, मन बणायो थाने पर धोखो घणों। आ जावे मण हर जगवासिणी प, पर इमें मण क्यों थ रोको कोणी। मणक बणाया पर विश्वास कोणी, लक्ष्मी बणाई पर एक की कोणी। दिमाग बनायों पर चलाबो सिखायो कोणी, जिण चलायो उ जमीं प ही रयो कोणी। प्रीत बनायी शहर बणाया-बणाया घर बार, पर जाँ अपणों कोणी खँई भी कोणी। जाँ अपणो ह वाँ मिलबा देव कोणी। मिलबा देवे तो शक रुके कोणी। दोस्त बणाया प दोस्ती कोणी, बात फेली की अब री भी कोणी। गजब थारी ह मोर माया प्रभु सच्चो दोस्त भी साथ कोणी। जां ह माया प्रभु सब कर इज्जत उकी या तो मंदर भी साफ तभी जब या ह साथ। या कोणी तो थार प भी विश्वास कि कोणी। गरीबी की तु सुण ल, पापियाँ की भी सुण ल म्हारी भी सुण जा। और हर दुखी की सुण ल कृपा ह सब प थारी। जय नर नारी, कृपा हो जाँप थारी। लिख रह्यो ह बण दुखदारी कृपा वार जो प्रभु थारी। फेर मुँ कहुवां, जय श्री कृष्ण, जय मुरारी।। -कवितारानी।

बैचेन मन / bechen man

  बैचेन मन आज एक बैचेनी सी छायी मन पर, क्यों तङप सहा मन मेरा। कहीं लगाना चाहूँ जीया तो लगता नहीं कहीं, क्यों घबरा रहा मन मेरा। बतलाना चाहूँ दर्द ये अपना किसी को, क्यों कोई मिलता नहीं ऐसा मुझे। लग रहा है ऐसे जैसे इस पल छुट रही दुनिया पिछे, क्यों लग रहा कि अब प्राण निकल जायेंगे मेरे। जैसे गंभीर था अनजाने में किसी के बारे में, और अब जा रहा छोङ मेरी दुनिया। क्यों यह अहसास निचोङ रहा मन मेरा, ऐसे पहले हुआ नहीं कभी और ना होगा शायद कभी। क्यों मन रोकने पर भी सोंच रहा तेरी। आज हुआ ये मेरे साथ जब हम दोनों के बीच कुछ नहीं, तभी एक मन रोक रहा ना मिलने को तुझे। पर इसमें मेरी तो खता कुछ नहीं।। -कवितारानी।

तु जाने ना / Tu jane na

  तु जाने ना तु जाने ना... तु जाने ना... के गम कितने सहे हैं मैंने... सहे हैं गम मैंने. तु जाने ना... जाने ना. कि कितना तङपा हूँ मैं. कि फिर.. फिर तुझे याद किया. और फिर से भुला दिया। तु जाने ना... जाने ना. जाने ना तु। कि मैं हूँ... अभी वहाँ.. जहाँ है ख्वाबों का आसरा। तु जाने ना... बतला भी दे, मुझे... कि है कहाँ तेरा आसरा... तेरा आसरा. मैं.. डुँ डुँ तुझे, हर जगह हर पता. तु जाने जाँ... जाने ना. कितने पलको आँसुओं सहा मैंने. आ पास आ... मैं सुना दुँ तुम्हें. दर्द जो सहे मैंने... कितना... हो कितना अकेला हूँ मैं बिन तेरे. बिन तेरे.. तु जाने जाँ... जाने ना. सपनों में अक्सर डुँ-डुँ तुझे. यादों के घर में रखुँ... तुझे.. जाने जाँ. तु बतला भी दे कैसे पास रखुँ मैं तुझे. तु जान भी ले... के मैं हुँ अकेला तन्हां बिन तेरे... ओ. जाने जाँ.. तु जाने जाँ... जाने ना.. मिलेंगे जब होगा नया ये जहाँ होगा नया. ये सारा आसमाँ, होगी नयी दुनिया अपनी होगी नयी हर. सुबह आ.. ओ जाने जां. तब दिल कहे जब मिले गले तो मिलेगा समां, ओ जाने जाँ।। -कवितारानी।

अभी भी / Abhi bhi

 अभी भी काॅलेज के दिन गजब सताते है। अभी भी मुझे बैचेन कर जाते हैं। अभी भी याद है वो इंतजार भरी सुबह। अभी भी वो दोपहर याद है, जब लंच साथ होता था। याद है कि कैसे हम मस्ती करते थे। कैसे सब की प्रेम लीला को मोज का मार्ग बनाते थे। कैसे खुद की केमिस्ट्री की हिस्ट्री मुझे। याद है उन नैनों का जादू, जादू उनकी अदाओं का। अभी भी रहती है कशिश की क्यों मिली ना वो मुझे । क्यों कुछ बयां में कर ना पाया वो। अभी भी मुझे दोस्तों का छेङना चिढाना याद है। याद है मुझे उसका हर बहाना और दोस्तों का इशारा। दोस्तों का मदद मांगना मुझसे और बङी सी बहस। फिर सबका साथ रहना और मोज मस्ती करना। अभी भी बस का सफर याद करता हूँ, पर भीङ भाङ से डरता हूँ। अभी भी सबको याद करता हूँ। हाँ अभी भी में वो पल जीता हूँ।। -कवितारानी।

सब स्वार्थी है / sab swarthi hai

  सब स्वार्थी है सपने सजाये चल रहा था अपनी राह पर। साथ चाहता था अपने परिवार संग दोस्तों का, पर सबको यहाँ अपनी पङी है। जहाँ मतलब की झङी है, वहीं लाईन खङी है। मैंने भी उनको काँटा ना माना भावनाओं को बहा कर, चलता रहा मंजिल की ओर राह पर। कभी बेरी समाज ने डराया, कभी शराब का रहा साया। गद्दारी ने दिल तोङा तो कभी अपनों की जिद ने मरोङा। जहाँ तपती धुप सी पथरीली राह मिली। वही मिठी छुरी लिए कई कुवाँरी निगाहें खङी। जिस समय में ओर मेरी पढाई थी उसी समय ये निगाहें मुझे। डंसने आयी थी में भी पागल गीर पङा था मोह माया में। पर मंजिल की तस्वीर रोक रही थी वहाँ जाने से। जाल उन नैनों का ऐसा था सोंच ना सका और कह भी ना सका। बयां करुं किसे दर्द ऐसा जग उठा था। देखे बिन एक पल चैन नहीं मिलता। एक पल की नजर सालों सी छाप लगे। पर पाने को वो मंजिल दुर लगे, लगी कसक ऐसी की, ख्न्वाब अधुरे से लगे, ना हाल बयां किया ना मर्ज ठीक किया। अभी भी नैना के नैन बैचेन कर उठे।। -कवितारानी।

मेरी नारी / meri naari

मेरी नारी गुणवान हो वो हो शिक्षित नारी, काम काज जाने सब, जाने दुनिया दारी। बङा छोटा सबका करे समान सम्मान देख पद दे उनको मान, समझदारी भरी हो अंग भंग में उसके, भले बुरे का करे खयाल, हो लज्जाशील, वीर कोमल वो नारी। दे मुझे माँ का दुलार, बहिन सा रखे खयाल, करे बङो सा सम्मान, दे पत्नी का प्यार। रिती परम्परा का रहे ज्ञान, व्रत उपवास कर करे घर परिवार मंगल काम। उसके प्रभाव से सबका हो उद्दार, मृगनयनी हो वो हो कोमलांगी वो शिक्षाशास्त्री हो वो।  लज्जाशील ग्रहणी, मानमर्यादा जाने वो जाने सबकाम काज, दुख सुख की साथी हो, हो व मदमस्त दोस्त मेरी। आदर्श  भारतीय पतिव्रता पत्नी हो वो मेरी नारी। कर सकुं बखान उसका ले जाऊँ हर जगह उसे। जो समझे मुझे और मैं समझ उसे, आदर करे सत्कार करे वो। मुझे ये सब गुण ले बने वो मेरी आदर्श नारी। कर्ता रहूँ बखान ये कि मिले मुझे ऐसी घर वाली।। -कवितारानी।

प्रेमिका के नाम / premika ke naam

  प्रेमिका के नाम एक पन्ना प्रेमिका के नाम करता हूँ। कैसी होगी वो, कैसी मैं चाहूँ उसे यह बयां करता हूँ। अपने मन के भेद आज स्याही कलम करता हूँ। तारिफ में उसकी इतनी करुँ कि खुबसुरती उसकी नयनों से हो। बनावट उसकी संगेमरमर सी हो, खुदा भी देख श्रृंगार उसका रुक ना सके कहे क्या खुब हो। होंठ उसके गुलाब की पंखुङियों से भी नाजुक हो। लाली उसके गालों की आँखों में चमक बङाती हो। गोरा बदन उसका चमके धुप सा छाया में भी। कैश काले घनघोर अमावस्या की रात हो। बिंदिया माथे पर साँझ का सुरज हो। चेहरा उसका हुस्न मल्लिका परियों सा हो। देख जिसे नजर हटी ना पाये। देख उसके उरोंजों को नारी भी सरमाये। मदमस्त बदन उसका सबको ललचाये। नासिका उसकी अपसरा को भी लजाये। नथ उसपे चार चाँद और बढ़ाये। देख चेहरा उसका रोक ना कोई मन को पाए। ऐसी नवयुवती मेरे मन की प्रेमिका बन जाए। बखान करते खुबसुरती का उसके कलम मेरी रुक ना पाये। गुणों की चर्चा में आगे बढ़ जाए।। -कवितारानी।

जब दोस्त सच्चा होता है / jab dost sachha hota hai

जब दोस्त सच्चा होता है   दोस्ती बङी प्यारी होती है, जब दोस्त सच्चा होता है। दिल का बच्चा हो, समझ में अच्छा हो, बात में पक्का हो, तब दोस्त की दोस्ती का भी मजा आता है। उसके रुठने और अपने मनाने का भी मजा आता है। मजा आता है जब थोङी रुसवाई छाए, जब मोज मस्ती में दिन बीत जाए, बीते पल रात में सपने बन जाए। ऐसी दोस्ती मे जान लुटाने को जी चाहता है, जी चाहता है चले ये दोस्ती जन्मों जनम। फिर वही बात दोहराने को जी चाहता है, दोस्ती बङी प्यारी चीज है। जब दोस्त नाजुक सा मस्त मोला नमकीन सा हो तो। हर पकवान फिका नजर आता है। ये जहाँ झुँठा नजर आता है। नजर होती दोस्ती की अठखेलियों में इसमें समाज कहाँ नजर आता है। आज ऐसी दोस्ती पाने को जी चाहता है। जी चाहता है ऐसी दोस्ती सलामत रहे जन्मोंजनम, हर जनम ऐसे यार को पाने को जी चाहता है। फिर यही बात मन दोहराता है। कि दोस्ती बङी प्यारी चीज है।। -कवितारानी।

आज कुछ लिखने को जी चाहता है / aaj kuchh likhne ko jee chahta hai

  आज कुछ लिखने को जी चाहता है आज कुछ लिखने को जी चाहता है, दिल के अरमानों को पन्नों पर उतारने को जी चाहता है। आज इन बदलते हालातों में रोने को जी चाहता है, जो मिल ना सका दिल को वो बताने को जी चाहता है। आज हर कसक बताने को जी मचलना चाहता है, टुटते सपनों को स्याही से छापने को जी चाहता है। आज समाज के हर बंधंन को तोङने को जी चाहता है, जीया कहता है मुझसे कि ना डर इस समाज से। जी मुझे बेचैन करना चाहता है, धङकने अब दौङने लगी है। पल सारे भाग रहे हैं और समाज तेजी से बदल रहा है, ऐसे में घर पर रहकर खयालों मे जीने को जी चाहता है। जब दगा दे दोस्त और विश्वास टुट जाए आइने सा, ऐसे में हर दासतां को लिखना जी चाहता है। आज कङी मेहनत कर बुलंदी पाने को जी चाहता है, और बताना चाहता है इन बङबोलों को गद्दारी की सजा। आज फिर किसी गहरी आँखों में खोने को जी चाहता है, अपना एक सुन्दर आँसिया बनाने को जी चाहता है। जहाँ नहीं थे फासले दिलों के, ना था मैल किसी के, आज अकेले जीने को जी चाहता है।। -कवितारानी।