मुश्किल है / Mushkil hai
मुश्किल है कितना मुश्किल है मन को समझाना। यह कह पाना अकेले ही है रह जाना। कितना मुश्किल है मन को बहलाना। कहने को बचपन से बिछुङ गया हूँ मैं। यादों को भी बिसरा चुका हूँ मैं। पर छोङा जब भी अकेला खुद को। वहीं खङा पाया हूँ आज।। कुछ नहीं कमाया मैंने। कुछ नहीं पास मेरे। अपने तो थे नहीं कभी। परायो ने निभाया मुझे।। अब सब कुछ बदला सा लगने लगा है। अब जाने सब छुटा सा लग रहा है। भुल गयी वो चाँदनी मुझे। भुल गयी वो समाये मुझे। मैं भी भुला सा महसुस करता हूँ। मुश्किल है पर जीता रहता हूँ।। उलझा हूँ अपने आशियाने को गढ़ने को। परेशान हूँ अपनी कमियों से। बहुत मुश्किल है सह पाना। उन मधुर यादों की शौगातों को। बहुत कठिन है गुजार पाना। उस यादों के ज्वार को। रहना भी है, सहना भी है, गुजर रहे हैं लम्हें भी। जब भी खाली से बैठे हैं, खो गये वहीं कहीं। फिर दर्द भी जगा, उस दर्द का अहसास भी है। यादों की शौगात भी है और आँखों को प्यास भी है। कितना मुश्किल है तब हर पाना, मन को समझाना।। -कवितारानी।