दुनिया / Duniya
दुनिया दुनिया अजीब है दुनिया, ख्वाब कितने दिखाती दुनियाँ। अपनों को मिलाती-बिछङाती दुनियाँ। कितना बङा अर्थ लिए है ये दुनियाँ। सारा जहाँ, सारा नभ, तीनों लोक शामिल हो इसमें जैसे, सच भी तो है ये कहना, विस्तृत है इसमें। सारे गम भरे पङे जहाँ वहीं पङी सारी खुशियाँ। सारे दोस्त है जहाँ वहीं सारे दुश्मन भी है यहीं। जितनी खुबसुरती लिए है वहीं इन्सानी गंदगी भी भरी है यहाँ। कहने को पुरी हलचल, स्थिरता, सच्चाई लिए है ये दुनियाँ। ये दुनियाँ गजब की है ये दुनियाँ। पल-पल रंग है बदलती ये, हरपल गम देती ये। खुशियाँ होती है जब सब गम भुला देती है ये। जहाँ दगा करते मित्र, रिश्तेदार, ताने मिलते हैं जहाँ हजार, अपने पराये सब शत्रु बन, जब करते हैं दिलों दिमाग पर वार, जब प्रकृति ही अपने विपरित हो जाए। तब रहता बस नश्वर शरीर अपने साथ। तब होती है नफरत खुद से, तब टुटता मन हर पल। तब समझ आती है असली दुनियाँ।। -कवितारानी।