शाँत मेरा मन / shant mera man
शाँत मेरा मन शाँत-शाँत था वातावरण, शाँत-शाँत था मेरा आवरण। थी शाँति ऐसी छोई के वातावरण में फैली थी गहराई। थी शाँति अनहोनी की आहट की किसी गाज के गिरने की। शाँत था शाँत मेरा मन, शाँत मेरा मन शाँत-शाँत था मेरा आवरण। लो आहट थी जो वो आ गई, शाँति को तार-तार कर गई। कर कई भस्म रुकावटें कर गई भस्म कई यादें। बस दर्द दे गई, बस दर्द दे गई, बस साँस रह गई। अक्ष बहे अश्रु से, नीर बहे नयनों से। हर भाव बहे, हर चाव बहे, बह गये सपने नयनों से। बन बेरी दोऊ आए चढ़, मुझ से कर आए सर। बन ज्वाला दोनों ओर से जला दिया मन शाँत कर। रह गई दर्द की आस रह गई वही पुरानी तरह की बास। पर समय है बदला-बदला है जमाना। अब गाज ओर गिर सकती है अब गाज भारी पङ सकती है। है जलन भरी मन में एक के एक मुङ बुद्दी है बाप। दुश्मनी रखी बिन मतलब बिता दिए कई साल। अब राख होना बाकि है या बन पंछी उङना है। अब यहाँ मुश्किल मेरा रुकना है, मुश्किल मेरा रुकना है। बेरी जहाँ जमाना, घर में भी नहीं प्यार दाना फिर कहाँ हो आना जाना। कहाँ हो आना जाना पर फिर है शाँत मन फिर है मन शाँत। मेरे सपने शाँत मेरे अपने शाँत।। -कवितारानी।