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बस कुछ दिन की मजबुरी है / Bas kuchh din ki majboori hai

  बस कुछ दिन की मजबुरी है। अपनी किस्मत अपनी साँसें। बनते बिगङते रोज निभाते। चलती रहती अपनी बातें। होती रहती नई सौगातें। बस यही जिन्दगी और मजबुरी है। गुजरते दिन बैठोर जिन्दगी है। यादों की अब जीवन से दुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है।। यादों से बिसरा हो जाऊँगा। खुद से जुदा हो जाऊँगा। आऊँगा ना लौट यहाँ फिर मैं। अपनी दुनिया नई सजाऊँगा। खोज में रोज मुश्किलों की सुली है। देख रहा हूँ कल को मैं। बस कुछ दिन की मजबुरी है। ये कुछ दिन की मजबुरी है।। आज आँख से आँसु दुर है। घुटन सा जीया दुर है। मन की मनमानी दुर है। तन की मजबुरी दुर है। साँसों की टकराहट दुर है। जीवन एक सार सुरुर है। बस यही देख कहता है। बस कुछ दिन की मजबुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है।। -कवितारानी।

मेरी छत से / meri chhat se

  मेरी छत से फिर एक शाम अकेले में, बैठा में निहार रहा। सोंच रहा देख रहा, यादों कि गालियों में घुम रहा। कहता कुछ आते जातो से, मिलता रोज मिलने वालों से। तिराहे का ये नजारा है, मन को मेरे प्यारा है। एक ठोर बन बैठा हूँ, बरसों से जमा बैठा हूँ। एक ताङ पुरब चढ़ गया, नीम छटी छटाई है। मेरी कुटिया टीन ओढ़ आई है, एक बगीया पङोसी की भी, एक कुटिया गरीब पङोसी की भी। सब कुछ बरसों से वैसा ही, कुछ ना बदला सब वैसा ही। देखा है बढ़ता अँधेरा, होती छाया, खोती काया। मेरी छत से, मेरी छत से।। पश्चिम ढलती लाली है, वो दिशा चुभने वाली है। अब खाली पङी जगह कोई, नई बनी है छत वही। कोई बैठा अक्सर देखा करता था। कुछ पल ही मैं मन हरता था। वो प्यारा आँख का तारा खोया है। याद आया वो मन रोया है। दुखी सी चार मीनारें दिखी। दिख पाया चेहरा कोई, पर मन को भाया ना चेहरा कोई। मुहॅ मोङ उत्तर पाया नयी छत, अब नया साया। माँ सी एक भोली छवि होती। हाल पुछती सब ठीक होगा कहती। यूँ ही दक्षिण सब छीपा सा। अब मन है खोया सा। फिर पुरब नजर करता मैं। मेरी छत से देखता मैं। ढुब गया आज का रवि। होगा सवेरा बात नई। मैं पश्चिम को गया पुरब में आया। थोङा ...

हवा शुष्क है, hava shushk hai

  हवा शुष्क है धुल भरी आँधिया, वादियाँ निराश है। तपती जमीन,  हवा शुष्क है, हवा शुष्क है।। है धरा धधक तेज, वेग में आवेश, रवि क्षितिज शांत है, फिर भी हवा शुष्क है। छांव घनी तेज है, पत्तों पर हर वेग है, शाँत सुकून आलोक है, पर हवा शुष्क है। गाँव गली विरानियाँ, खो गई कहानियाँ, आँखों में रोश है, हवा शुष्क है। साँझ शीतल आस है, हवा हो नम आभास है, आसमां में मेघ है, और हवा शुष्क है। ठोर-ठोर, ठहर-ठहर। पत्थरों को सहल-सहल, छु रही है ऊँगलियाँ, और हवा शुष्क है। डर है आंतक है, मन में कंपन है, तन में भय है, हवा शुष्क है। है खो गई वो फिजा, मस्त समां आसमां, खो गई चाह है, हवा जो शुष्क है। हर चेहरा रंग ओढ़ के, छाँव की खोज से, जा रहे अपने जहाँ, हवा शुष्क है। चल रही है जिन्दगी, अब यही है बन्दगी, अब यही है सुना, हवा शुष्क है। बीतने को है समा, खोने को है जहाँ, आने को है बर्खा, हवा अभी शुष्क है, हवा शुष्क है।। -कवितारानी।

शराबी कहर / sharabi kahar

  शराबी कहर वो शाम क्या शाम होती जब शराब की आँच ना होती। वो रात भी शाँत होती जब मदिरा आम ना होती। शुकून में कटते हैं दिन जब दिनों-दिन दारु ना होती। फिर मन सोंचता है फिर दिमाग में कोई हरकत होती। कि काश ये शराब ही नहीं होती। तो जी लेता बचपन हॅस खुस होकर। जी लेता मां और मम्मी मेरी अगर ये दारु ना होती। बचपन की हर उमंग नये पंखों के संग होती अगर शराब ना होती। ना दुख होता ना चिंता ना कोी कमी आर्थिकता की होती कमी। ना शर्म से आँखें नम होती ना आँखें नम होती। ना बेबस हम लाचार होते ना हम बेचार अँधियारे होते। ना तुमसे कुछ गीला होता ना रब से शिकायत होती। अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती। खुलकर जीते जिंदगी, जिंदगी की राह भी सुहानी होती। ना होता पथ भ्रम ना किसी से मदद की गुहार होती। मंजिल इतनी पास होती चमन होता आशियाना और महल अपना। अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती। मद के मद मे मदा है जो मर्द, नहीं उसे किसी की कद्र ना कोई हद। मद के मदिरे में मरी पङी है मदिर की मत। क्या करे मद का मारा जिसने समझ खुद को इसका आदि लिया। अगर बाप ही हो मदिर हो जाते हैं सब अधिर। बन बेचारा कट गया जीवन आगे क्...

रुकना हमें नहीं / Rukna hum nahi

  रुकना हमें नहीं धीरे-धीरे चलना अब हमें आता नहीं। रुकावटों से घबराना हम जानतें नहीं। आ जाए मुसीबत तो रुकेंगे नहीं। क्योंकि मुसीबतों से घबरा डरना हमनें सिखा नहीं। कर दृढ़ निश्चय बढ़ हम चलें हैं। हौंसलों को कर बुलंद फिर निकल पढ़े हैं। हो जाए तो हो जाए सामना कांटों या पत्थरों से। सुई संग मरहम लेकर हम चलें हैं। मंजिल को पाना ही अब लक्ष्य रहा हैं। नैतिक मुल्यों और धर्म को भी पाने अब निकल पढ़े हैं। कहा था राहगीर ने डगर ये आसान नहीं। पर आसान डगर पर चलना आता हमें भी नहीं। कहा किसी ने था कि जीवन अनमोल व दुख से भरा है। पर हमनें कभी सुख न मोल इसका किया नहीं। बस अब बहुत सुन लिया, बहुत कर लिया दुसरों का। अब मन का है करना और मन का बनकर ही है रहना। जहाँ खुबसुरत हमें बनाना। जीवन के स्वर्ण पथ पर है घुलमिल जाना। सुख वैभव साथ हमारे होगा। जब धर्म होगा ईश्वर होंगे तो होगा स्वर्ण संसार। आओ मिलकर करे सत्कार। ना हो इसमें अपनें ही इसमें सारा संसार। नमन करो ईश्वर को, और चल पढ़ कर जय-जयकार।। -कवितारानी।

मेरी मां / Meri Maa

  मेरी मां तुम ना हो जो साथ तो डर लगता है माँ, तुम ना हो जो पास तो घबराता है जीया माँ, ओ माँ... दिन तो जैसे-तैसे कटते डराती है रातें माँ। होती सुबह-सुबह जब नजर तुमको ही ढूँढे , ओ माँ... लगता है डर आ ना जाये शराबी पापा यहाँ। कांपता दिल जब सुनता कहर बरपा जो रहा। ढुँढती नजरे तुम्हें जब गम का होता आसरा पास यहाँ। चोहूँ रोना गोद में तुम्हारे जब रुकता ये काफिला, मेरी माँ... तुम ना हो जो पास तो जाऊँ किसके यहाँ। तुम ना हो जो साथ तो हाथ ना किसी का मिला माँ, ओ माँ... भाई दिया था तुने कि साथ मेरा होगा। दुख दर्द मैं वो सांत्वना देगा, पर कैसी थी किस्मत पाई। मेरी नहीं थी गलती फिर भी उसने लताङ लगाई थी। साथ होना था जिसे वो दूर तमाशबीन बनता गया। बची थी जो बाप के द्वारा थी कसर भाई पुरी करता गया माँ। ओ माँ... माँ... तुम ना हो जो साथ ये समाज ना अपना रहा। बेचारा, लाचार और मजबुर को करता गया, मां... ओ माँ... तुम ना हो जो साथ तो डर लगता है माँ... तुम ना हो जो पास घबराता जीया। ओ माँ, मेरी माँ... ओ माँ।। -कवितारानी।

बढ़े चलो / bade chalo

  बढ़े चलो गीत मेरे मन का आज जुबां पर आया। बढ़ाने कदम ख्वाब नये लाया है, ख्वाब नये लाया है। बढ़े चलो, बढ़े चलो डगर सुहानी करें चलो। बढ़े चलो, बढ़े चलो, काम मन के किये चलो। पत्थर आये जो राह मे तो हॅसकर उसे हटायेंगे। कांटो वाली राहों पर संभलकर चलते जायेंगे। हर मुश्किलों में होंसले अपने बुलंद करते जायेंगे। जो रुकावटें हो खङी तो हिम्मत से डटकर हटायेंगे। कर मन को राजी तन को साथी हम बढ़ते जायेंगे। हम बढ़ते जायेंगे। हम बढ़ते जायेंगे। बढ़े चलो, बढ़े चलो सपने पुरे करते चलो। बढ़े चलो, बढ़े चलो सबको खुश करते चलो। आज आजमाये तो वक्त तो हम नहीं घबरायेंगे। वक्त की रफ्तार से कदम हम मिलायेंगे। जो हो जाये तो देर तो हुंकार ना हम लगायेंगे। कर मन शाँत और तन शाँत फिर कदम उठायेंगे। रुकना नहीं थकना नहीं बस बढ़ना है बढ़ना है यही दोहरायेंगे। बढे चलो, बढ़े चलो वक्त की रफ्तार ले चलो। बढ़े चलो, बढ़े चलो समसामयिक होकर चलो। कर माटी को नमन, कर मां नमन , कर हौंसले बुलंद, बढ़े चलो। कर तन साफ, करमन साथ, चरित्र साफ लेकर चलो, बढ़े चलो। लेकर धर्म, संस्कृति, परंपरायें ईश्वर की राह चलो। लेकर देश का विकास और विकास खुद पर ...

माँ आपकी याद आती है / Maa Apki yaad aati hai

 माँ आपकी याद आती है सपने देखना ना जानता था जो दिखाए आपने। परायों और अपनों में भेद ना था जो जनाया आपने। खुद खङे होना ना जानता था पर दोङवाया आपने। अब क्यों रुसवा से दिख रहे हो। अब क्यों दूर लग रहे हो। जब पास आता हूँ आपके तो दूर जाते दिखते हो। जब दूर से देखता हूँ तो पास बुलाते दिखते हो। लोग जो सुनते हैं जो कहते हैं और पढ़ते है जीवन के बारे में। सब अनुभव करवाया आपने। दर्द, तङप, जोश, कर्म, रोग, आलस्य, लोभ, मद, मोह, डर, प्यार, झिझक, शर्म, मर्म, दुख, उल्लास, आनन्द सब बताया आपने। जीवन एक हिस्सा वानप्रस्थ हो जो शिक्षा संग इन अनुभव में बितवाया आपने। पर अब समय कम है, अब ग्रहस्थ आ रहा है, पर आधार भी नहीं बताया आपने। अब क्या होगा मेरा, अब कौन होगा मेरा। अब भी वैसी ही तङप से अनुभव से भरी होगी जिन्दगी। या जो सपने संजो लिए हैं वो पूरे करने को बढ़ पाऊँगा। कुछ राह बता, अब भी जरुरत है तेरी कुछ कर्म बता। कहीं भटक ना जाऊँ इस मृत्युलोक में तेरा द्वार बता। प्रभु तेरा द्वार बता।। -कवितारानी।

मन की आवाज लिखी / man ki aavaj likhi

मन की आवाज लिखी एक आवाज आज मन से उठी है। दबा रहा हूँ जो आज कलम पर आई है। कहने को सपना है पर मन खास अपना है। जग रुसवाई से डरता नहीं पर आन की फिक्र है जो अभी भी। अमानत की तरह है किसी की। आवाज स्याही कर आज जान दे दी मैंने। आवाज एक दीवाने दिल की है जो समाज में सीधा साधा है। दीवाना हर प्यारी नजर का जो पाना चाहे उन्हें हर नजर में। दीवाना हर अनौखे तर का जो अलग तरास है रब की। हर आवाज उसकी बहकाए मुझे उसकी जो खास पास होती एक समय। उसी की नजर नजारे दिखाए हर घङी। ख्वाब उसी के चलते रहते हैं जब भी अकेला होता हूँ। परवानगी, दीवानगी कई बार आई चरम पर। पर मेरा नहीं है सपना दीवाना होने का। उन नजरों में जो आकर्षण था गजब था। पर मन मेरा अजब था देखता था देखता खुब पर पास जाना नामंजुर था। कई बार जाति, धर्म भी लांगने को मन किया। कई बार हर निति-नियम तोङने को मन किया। पर सपना और मम्मी का कहा दिया ना माना। रुक जाता हर आखरी मोङ पर आकर। दबा देता उस आवाज को क्योंकि अभी कुछ ओर था बनना। ना दीवाना बना ना परवाना छोङ दिया वहाँ आना जाना। आवाज फिर सपनों कि आई और हर बार मैंने अपनी गाङी आगे बढ़ाई। खुलकर कभी किया नहीं सच वो जो ल...

जब किस्मत खराब / Jab Kismat ho Kharab

जब किस्मत खराब  कहते किस्मत खराब जब वक्त हो खराब। साथ नहीं देती तब सोला और शराब, तब कहता है मन, कैसी परिस्थिति है आई ना मन बस में ना तन। कहने को राज होता है तन का पर प्रधानमंत्री तो मन होता है। कैसी ये स्थिति आई ना खुद बस में ना जग बस में। खुद पर विश्वास करुँ तो जग साथ नहीं। जग पर विश्वास करुँ तो खुद हौंसला खो देता हूँ। कैसी ये विकट घङी है आई, ना अपनी चलती ना अपनों की। अपनी चलाऊँ सही मान तो अपने रोकते हैं। अपने चलाए गलत तो मैं चलने नहीं देता। कैसी ये घङी आई है, ना अब बस में ना कल बस में। अब वर्तमान को सभाँलु तो कल धुँधला भविष्य बनता दिखता है। और भविष्य को सुधारने चलुँ तो अभी स्थिति बिगङ जाती है। हाय कैसी किस्मत है पाई ना आत्मा बस में ना परमात्मा। आत्मा को संभालु तो परमात्मा दूर नजर आते हैं। और परमात्मा को मानुं तो आत्मा साथ नहीं देती है। कैसी मुश्किल स्थिति आई है ना बंधंन बंधा ना बंधंन वाले। बंधंन मजबुत करना चाहूँ तो बंधंन वाले दूर जाते हैं। बंधंन वालों को पास लाना चाहुँ तो बंधंन छकने लगता है। हाय कैसी घङी आई है ना चाह कर भी पास खङी रुसवाई है। ना अपना कोई आता नजर ना पराया कोई। अपने...

ख्वाब सच होते तो / Khavab sach hote to

ख्वाब सच होते तो देखा जो ख्वाब था हकीकत बन जाता। बनती दुनिया हसीन और भविष्य निखर जाता। तब गाता तेरे गुणगान बस भक्त महान बन जाता। बाँटता खुशियाँ लाखो और करोङो को हॅसाता। देखा था जो ख्वाब अगर सामने आता। बरस बीते-बीते लम्हे हजार। हर उतार-चढ़ाव ने निचोढ़ लिए मेरे हर ख्वाब। बिखरे टुकङे टुटे काँच सा बिखर रहा है ख्वाब। मन अब भी दोहराता है वही पिछङी बात। देखा जो ख्वाब था हकीकत बन जाता। तो ना होती जिन्दगी से रुसवाई ना तेरी निन्दा करवाता। रोज सोता और रोज तेरी पुजा करवाता। किस्से जो देखे महलों सा सजाता। आराम होता, मौज होता, होता आनन्द-उल्लास। देखता रहता राह नहीं पैर ना एक जगह जमाता। राह नई, मंजिल नई इस दुनिया को दिखलाता। ख्वाब जो हकीकत होता तो क्या-क्या ना होता। जो ख्वाब सच होता तो क्या ना होता।। -कवितारानी।

दो राहें / Do raahe

  दो राहें राहें कहीं खत्म नहीं होती, कहते हैं राहें खत्म नहीं होती। पर हर राह पर दो राहें आती रहती है। हर दो राह लक्ष्य को प्रभावित करती है। अब मानव हूँ समझ नहीं की सही है कौनसी और गलत कौनसी। कहते अच्छी दिखने वाली राह अच्छी नहीं होती। पर बुरी दिखने वाली की जिम्मेदारी भी कोई नहीं होती है। कहते हैं कठिन राह ही असली जीवन की राह होती है। वो अनुभव, त्याग, दर्द, समझ, ज्ञान से भरी होती है। और बुरी राह आराम, सुख और क्षणिक मौज देती है। फिर सुना की क्षणिक मतलब वर्तमान फिर सोंच की राह है। भुल-भुलैया है यहाँ इन राहों की एक सुलझाओ आगे फिर,  वही उलझन। तभी तो कहते हैं राहें खत्म नहीं होती, अन्त सिर्फ मौत है। और कुछ नहीं और चलते रहने वाला ही एक सही राहगीर है।। -कवितारानी।

देश मेरे / Desh mere

  देश मेरे देश मेरे... देश मेरे, मेरी जान है तु। देश मेरे... देश मेरे, मेरी जान है तु। तेरी मिट्टी जोङे मुझे तुझसे मैं हूँ। देश मेरे... देश मेरे... नाम आये जब तेरा लब पर दिल कुरबां होवे यूँ। आँच आये आँचल तेरे पर तो खुन खोले यूँ। देश मेरे... देश मेरे... नाम होवे सबसे ऊपर ओर उसमें सहयोगी हूँ। माता कहते तुझको हम शिश तुझ  पर झुकायें यूँ। गोदी जैसे माँ बेटा बिलखाये जूँ। नाम जिंदगानी तुझसे, तुझपे जहाँन वार दुँ। देश मेरे... देश मेरे... कर मतवाला वीरों को तुझ रक्षा बढ़ाऊँ यूँ। आँख ऊठा देखे कोई तो शिश कदम रख दुँ यूँ। नाम करूँ, उल्लास करुँ, करुँ जय जयकार जहाँ रहूँ। देश मेरे... देश मेरे, देश मेरे माँ है तु, देश मेरे... देश मेरे... मेरी माँ. देश मेरे देश मेरे मेरी जान है तु। -कवितारानी।

मैंने नया जहान देखा / Maine naya jahan dekha

मैंने नया जहान देखा मैंने इस जहान मैं आज एक नया जहाँ देखा। दिन में रात और रात को नये राग में देखा। गहराई थी गहरी और सुहावनी थी घङियाँ। एक-एक पल कट रहा था मानों हो एक-एक जीवन। मैंने उस मंद मुस्कान के साथ एक खुबसुरत जहाँ देखा। जिस पल देखा लगा की एक सुनहरा इतिहास लिख बैठा। तेरी आँखों की सच्चाई मैं जहाँ सारा भुला बैठा। वो मदहोश गहराई देखी, वो अद्भुत अहसास देखा। देखा वो पल जो शायद किसी ने परिलोक में देखा। एक-एक पल का क्षण लाखों पुण्यों का फल लगा। लगा जैसे इनसे ही है जहाँ और इनसे ही अंत देखा। तेरी आँखों में पुरा समय चक्र देखा। मैंने तेरी आँखों में जो खुबसुरत जहाँ देखा। सजाए रखा हो उसे अब भी, और फिर चाहता हुँ देखना। मैंने तेरी आँखों में नक्षत्रों को मिलते देखा। हाँ मैंने वो खुबसुरत जहाँ देखा।। -कवितारानी।

तेरी बात / Teri Batein

तेरी बात आये पल हजार, हजार थे लम्हें। हर पल थी उम्मीदें तुमसे, कुछ थे सपने। जब भी मैंने सोंचा मिले तुम नहीं। जब भी मैंने देखना चाहा, तुम दिखे ही नहीं। जब भी मैंने चाहा सुनना, तुम बोले नहीं। जब भी मैंने कुछ कहना चाहा, सुना तुमनें नहीं। हैं इत्तेफाक या जोङी मैल नहीं। है तेरा गुस्सा या लायक मैं नहीं। या ये किस्मत है कि तुम मेरे नहीं। पुछुँ मैं रब हर घङी, हर घङी। क्या है तेरी मर्जी, क्या है तेरी मर्जी। हो रहा दिल मझसे खफा, मैं तुझसे खफा। क्या तुने चीज बनायी, क्या बनायी रजा। ऐ मेरे खुदा है मेरे जहाँ। अब जीना है या मरना, अब कहना है या चुप रहना। मुझको बता तू मुझको बता। है मेरे ईश्वर मेरे खुदा।। -कवितारानी।

विनती / Vinati

विनती करता हूँ विनती अपने प्रभु से, कहता हूँ यह सब से। की अभी है राह लम्बी साँसे बचाये रखना, दुर है मंजिल अपनी हौंसला बनाये रखना। हो रहे हैं असफल अभी पर विश्वास जगाये रखना। किस्मत भी साथ नहीं दया दिखाये रखना, कांटे आ रहे हैं कई सुई मलहम तैय्यार रखना। दर्द ही दर्द है करुणा बनाये रखना, करना दुआ-प्रार्थना की सफल हो जाऊँ। लक्ष्य ना सही उद्देश्य तो अपना पाऊँ, राष्ट्र का ना सही गाँव का विकास मैं कर पाऊँ। रिश्तेदार ना सही दोस्तों को साथ में पाऊँ। करना इतना मेरे लिए मेरे प्रभु। कि आशा का साथ होंसले से थामें रखुँ, आलस और निराशा से दूरी बनाए रखुँ। कर सकुँ सकारात्मक कार्य नकारात्मक ना बन पाऊँ, करुँ पुजा अर्चना दया-प्रेम का ही गुण गाऊँ। रखना हाथ सिर पर देना आशीर्वाद, बनी रहे कृपा आपकी विनती है आपसे मेरे नाथ। जय, जय, जय हो प्रभु आप।। -कवितारानी।

मन की आवाज / man ki aavaj

मन की आवाज तब होती चाह ना ओर जीने की, तब पकङ हाथ आशा का दम भर जीगर में। बेहरा होके और अंधा होकर देख मन की, आँखों से और सुन मतबल की बात। कर हौंसलों को मजबुत करता नित काम, एकाग्रचित हो जो करता है लक्ष्य पर वार। दुनियाँ करती उसको सलाम्, दुनियाँ करती उसे सलाम। कहती है तब जमीं ना हटुंगी अब छोङुंगी तेरा साथ। हो चाहे दिन-रात, दलदल हो या दरार। कहता है ये गगन तु ही है मगन। दुँगा पुरा तेरा साथ है चाहे ऋत बंसत, बर्खा, सावन आज। कहती है काया फिर की रहुँगी अब तेरे साथ। ना छोङुंगी तेरा साथ बस दृढ़ तो तेरा आत्मविश्वास। तब भगवान कहे आशीर्वाद है मेरा तेरे साथ। तब में खुद से कहूँ की अब क्या डरने की बात कृपा है। जब सबकी साथ, तब मन कहे धन्य हो दुनियाँ देवी। तेरे रुप है अनेक, तू रखती सबका ख्याल, बस भी लेना संभाल की माया तेरी अपार। -कवितारानी।

दुनिया / Duniya

दुनिया दुनिया अजीब है दुनिया, ख्वाब कितने दिखाती दुनियाँ। अपनों को मिलाती-बिछङाती दुनियाँ। कितना बङा अर्थ लिए है ये दुनियाँ। सारा जहाँ, सारा नभ, तीनों लोक शामिल हो इसमें जैसे, सच भी तो है ये कहना, विस्तृत है इसमें। सारे गम भरे पङे जहाँ वहीं पङी सारी खुशियाँ। सारे दोस्त है जहाँ वहीं सारे दुश्मन भी है यहीं। जितनी खुबसुरती लिए है वहीं इन्सानी गंदगी भी भरी है यहाँ। कहने को पुरी हलचल, स्थिरता, सच्चाई लिए है ये दुनियाँ। ये दुनियाँ गजब की है ये दुनियाँ। पल-पल रंग है बदलती ये, हरपल गम देती ये। खुशियाँ होती है जब सब गम भुला देती है ये। जहाँ दगा करते मित्र, रिश्तेदार, ताने मिलते हैं जहाँ हजार, अपने पराये सब शत्रु बन, जब करते हैं दिलों दिमाग पर वार, जब प्रकृति ही अपने विपरित हो जाए। तब रहता बस नश्वर शरीर अपने साथ। तब होती है नफरत खुद से, तब टुटता मन हर पल। तब समझ आती है असली दुनियाँ।। -कवितारानी।

कौन अपना यहाँ / kon apna yha

कौन अपना यहाँ कौन यहाँ अपना होता है, जो होता है अपना मेरे लिए वो है सपना, प्यार कहते हैं किसे किसी ने जताया ही नहीं। गमों में जीते हैं कैसे जिंदगी ने सिखाया बस यही, वक्त मिला तो सुहाने दिन पाये पर वो भी दहशत में बिताये। जब देखता हूँ अपने तो इच्छा होती नहीं अपना कहने की, जब सुनता हूँ आदर्श पिता, भाई की तो कल्पना तक नहीं होती। कहाँ मिलते हैं आदर्श देखने की इच्छा रही बहुत, मुझे तो मिले स्वयं राक्षसी, मतलबी, लालची, मुर्ख। कैसे कहूँ आदर मैं बङों का करता हूँ, कैसे में दिल से अपना तक कहूँ। जब नाश्ते में ताने, भाव में ईर्ष्या और त्योहारों में गालियाँ भर्त्सना मिले। हर दिन और हर समय रोक टोक मिले। जब बोले तो चुप करे और ना बोले तो गुन्ना कहे। घर में रहे तो डरपोक, चुहा और घुमें तो गुण्डा, उठाइगीरा कहे। जब पङे तो पङाकु किङा और ना पङे तो जाने क्या करेगा। ऐसे में करुँ तो क्या जाऊँ तो कहाँ, किससे पुछे, दुख सुनाये किसी से तो दुख बङे ना सुनाये तो दम घुटे। फिर कैसे मानसिक तैयारी हो और शारीरिक तैय्यारी, बस कहे तो कहे है राम अब लेना आप संभाल, जब ना संभले तो बतला देना, फिर मुझे यहाँ नहीं रहना। -कवितारानी।

सुनी भाग-18 उपसंहार / suni part-18 The Conclusion

  सुनी भाग-18 उपसंहार ये कहानी थी बाल विवाह की, नहीं ये कहानी थी एक लङकी की, नहीं ये कहानी थी सफलता की, नहीं ये कहानी थी समाज के आईने की। नाम चाहे दो कुछ, इसका विस्तार चाहे दो कुछ, पर है ये मर्म एक जान का, ये भाव था एक छुपी हुई जान का। जब काल का काम आता है, सब रिश्तों नातो को से खा जाता है, जब बुरा समय भाग्य में होता है, तो कोई कुछ नहीं कर पाता है। पर जो किया दृढ़ संकल्प तो, काल को भी मानना पङता है, जब जपा नाम भगवान का तो, बुरे समय को भी जाना पङता है। जो सुनी जकङी थी समाज में, उसने समाज को झुका दिया, जो सुनी थी अनजान दुनिया से, उसने दुनिया को दिखा दिया। वो नारी बन के आई, उसने अपने मन की कर दिखाई है, लक्ष्य साधा अपना खुद ने, जिद से ही व्याख्याता बन दिखाई है। पर मन की पीङा तो मन ही जाने, जो घाव पङे मन पर वो कौन जाने, तन को सवाँर वो लेती है, पर यादों में बंधी वो रहती है। है जोर जग का और बंधंन है तन का, उसपर विजय पानी है, यह तो आधी ही कहानी है, अंतिम मुकाम तक हिम्मत उसे दिखानी है। हम कामना करे भावी भाग्य की, जो हार रहे हिम्मत उन सबकी, सिख जो दे रही सुनी या नहीं आपने, सुनी की कहानी सुनो...

सुनी भाग-17 प्रत्यक्ष भाव / Suni part-17 Pratyaksh bhav

  सुनी भाग-17 प्रत्यक्ष भाव लिखते-लिखते उसके नाम पे, आ गये प्रत्यक्ष भाव पे, कौन-कहाँ किस मतलब से, समझ रहा अपने काम से। भौर समय जब कभी दर्शन था, जमीन पर निगाहें होती मुख तरसा था, कुछ दुख की मारी और सताई, नजर आई सुनी पुरवाई। अपने दुखों का भण्डार समेटे, मैं मिल रहा खुशी से दो घङी,  वो अपने आप की सताई सी, अपने साथी सखाओं में उलझी थी। धीरे-धीरे दिन बीते, महिनें भर में खास साथी छुटे, स्वार्थ कहे या कहे आत्मरक्षा ही, पर सनी उसके साथ ना थी। अचरज सबको मुझे भी था, खास साथी का उससे काम ना हुआ, अधिकार दुसरे साथी ने पुरे किये, जब सुनी सी.एल. पर थी जीये। ये कैसी छवि उसकी दिखी, पर नौकरी ही थी खास कमी दिखी, भावनाओं की बाढ़ पैरासुट में थी, साथी से ज्यादा परवाह खुद की थी। कौन कहेगा विश्वासी रही, अचरज नहीं जो सुनी स्वार्थी कही, पर मुझे खुशी थी साथी बिछुङन की, अब मेरी ही सुनी अकङन थी। कुछ दिन महिनें ही लगे, घुले और आगे बढ़े, मैं जहाँ अपने आप का मारा, वो भी हुई थी अब बेसहारा। पैरासुट ने साफ मना कर दिया, शादी होगी उसकी अब बात टाल गया, साथी राम-राम कह गया, अब मैं ही रह गया। कुछ खास कोशिस ना की, उसम...

सुनी भाग-16 दोस्ताना / Suni part-16 Dostana / Friendly

  सुनी भाग-16 दोस्ताना मन की विरानियाँ आम थी, खुशियाँ मिलती दुखों के दाम थी, एक तराजु जैसे जोङा था, जीवन में निराशा का फोङा था। रह सह आ जाती थी, प्रेम पीङा छा जाती थी, कहती कहाँ क्या चल रहा, अपने मन में वो मल रहा। महिनें दो महिनें में बात होती, बीच के समय याद में रोती, अब काम के सिवा आराम था, आराम में मन में वो राम था। कमियाँ ना उनमें ना इसमें थी, दोनों की अलग-अलग किस्में थी, किस्मत का साथ ऐसा ही, सोंच दुर हो रही जैसे ही। कौन अकेला रह पाया, जीवन दुख सह पाया, कल का बीता वापस ना आता, मन का उतरा फिर ना छाता। कुछ समय बाद ही, एक सहयोगी मिला साथ भी, हर कदम पर पास रहा, काम में भी आराम रहा। धीरे-धीरे घुलने लगे, विध्यालय के बाहर भी मिलने लगे, सब जान गये दोस्त काम के, इनके रिश्ते हैं बस नाम के। सुनी का खालीपन दूर हुआ, विवाहित साथी का नुंर हुआ, अपने मन के बोझ से, उठ रही थी अब ओज से। रोज-रोज अब मौज थी, साथी की जैसे खोज थी, खुब मस्ती की बातें थी, रोज बन रही यादें थी। साफ रंग और सुन्दर काया, बोली में मिठास और माया, औहदे का रुतबा इतना ना था, चरित्र में उसके जितना दम था। अनायास सब खींच आते, पास जा...

सुनी भाग-15 विध्यालय व्याख्याता / Suni part-15 school lecturer

  सुनी भाग-15 विध्यालय व्याख्याता संघर्षों के समाज से, कोशिशों के आयाम तक, अब तक जो अडिग थी, अब मुश्किलें कम थी। घर समाज पिछे छुटा सा, आत्म मन्थन में जीवन रुठा सा, छब्बीस से सत्ताइस साल की हुई, सुनी अब आत्मनिर्भर हुई। दबाव पहले सा नहीं रहा, मन पर कुछ भार अपना रहा, याद केवल कल का साथी रहा, सोंच बस कल की रही। कल के बेहतर की आस कर, लगी रहती अपने बाप पर, कैसे भुले मधुर रस को, कैसे रोके कङवे कल को। सबसे अधिक पङी लिखी समाज में, लोग देखते मान अभिमान से, कुछ बुरे भी पास आने लगे, दुश्मनों को भी भाने लगे। लक्ष्य सामने पाकर वो, लग जाती सब छोङ वो, हार होती बार-बार, मन्नतें करती हर बार। मन को संभालती आगे बढ़ती, रुठती, मनाती सबसे कहती, एक दिन नौकरी पाकर रहूँगी, आप सब को चुप कर दुँगी। कई बार असफलता आई, बार-बार सुनने लगी हाई, मन को तोङ लगी रही, व्याख्याता बनने की कहती रही। काम छोङ कोटा गई, पढ़ाई के लिये लङ गई, घर से डेड लाईन मिली, नहीं नौकरी तो तू गई। साफ लब्ज और कुछ खर्चा, पर पास नहीं हुई तो जाना होगा, कोई मैं-पर नहीं चलेगी, अब तुझे हमारी सुननी पङेगी। मान बात गई कोटा, सहेलियों साथ रहती कोटा, अब भ...

सुनी भाग-14 प्रेम विरह / suni part-14 Prem Virah

सुनी भाग-14 प्रेम विरह धीरे-धीरे ही सही, प्रेम प्रकाश को खो रही, दर्द के अब साये जागे, रात भर दवा को वो रागे। भुली अपनी बाल पीङा सारी, काम पर जाती और गाती, कब आयेगी काॅल उसका, कब कहेगी है दोष उसका। अब क्या जाने कौन दोष में, पर सुनी दिखने लगी रोष में, जोश अब सबको दिखता, हर कोई कहता क्या हुआ, कुछ बदला दिखता। कुछ नहीं हुआ कह देती,  संभाल खुद को देती, फिर घुम फिर कमरे में जाकर, खुब रोती उसे याद कर। रोज-रोज की तङप बङी, मिलने बात करने की तलब बङी, कहती सखी से अपनी सारी, बाकि रहती जैसे मन की मारी। मन की मन में रख कर, कभी कहती नहीं उससे बात कर, घुट-घुट कर इंतजार भी करती, पर बात का कभी इंतजार ना करती। अच्छे दोस्त, वो भी यही कहता, शादी, घर वालों के हिसाब से कहता, प्यार का अभी कोई किस्सा नहीं, तुम हो फिर कोई मिला नहीं। बातें ही थी याद आती रही, सुनी के गमों को बढ़ाती रही, रहना भी कभी-कभी मुश्किल हुआ, सहेलियाँ भी मांग रही अब दुआ। हाय विरहणी ऐसी थी, बात करती पर हॅसती थी, घंटो तक अकेले बैठा करती, खोई हुई वो एक टुक देखा करती। मधुरता के सारे आयाम अब, खो गये कहीं जमाने में अब, करियर की चिंता उसको थी,...

सुनी भाग-13 प्रेम बंधंन / suni part-13 Prem Sambandh

  सुनी भाग-13 प्रेम बंधंन हवाओं के खिलाफ, अदाओं के लिहाफ, अब जब नव उमंग थी, सुनी सुनाई एक तरंग थी। रोज का काॅलेज जाना रहा, अनचाहे कुछ बदला रहा, जो अहसास नहीं था पहले कभी, वो साहस अब मन करने लगा। विध्यालय, महाविध्यालय अपने आप को रोक था, आये बहुत पाने को पर खुद को टोका था, पर वश कहाँ चलता चलाने से भी, ये दंश चुभता है वक्त आने पर ही। जहाँ सुनापन रोज-रोज की टिस थी, ना सुनने-समझाने वालों पर रीस थी. आये दिन के दबाव से जो खीज थी, अब नयी लहर से ये मन की सींच थी। रोका बहुत फिर भी हो गया, टोका बहुत पर मन खो गया, वो बातें अनचाहे चाहने लगी, अब प्रेम बंधंन में सुनी बंधने लगी। इजहार ना था, ना प्यार सा, पर आकर्षक था अनुमान सा, कुछ अच्छा सा लगने लगा, किसी को देख मन खुश रहने लगा। ऐसा हुआ ना था पहले कभी, मन ही मन संतोष को जन्म देने लगी, शाँति सी खुशहाली बन छवि दिखी, अब मन की बात कवि बन लिखी। किससे कहती सुनी बात को, आखिर साथ थी कही उसी को, समझाया कुछ-कुछ छेङा उसने, हर बार बात को फेरा उसने। मौका मिला साथ रहने-घुमने का, विश्वास बढ़ा पास-पास रहने का, जीवन से आधार लेने लगा, अब सब कुछ बस प्यार में रहने लग...

सुनी भाग-12 संघर्ष, रोजगार, आत्मनिर्भरता / suni part-12 sangharsh, rojgar, aatmnirbharta

  सुनी भाग-12 संघर्ष, रोजगार, आत्मनिर्भरता समय सार कई बातें थी, आत्मनिर्भरता की रातें थी, सुख चैन कुछ खोया सा, मायुस मन था रोया सा। आत्मनिर्भरता का ऐसा साया, मनोबल पर कहर बरपाया, आया संघर्ष रोजगार बनकर, छाया जहर भविष्य पर। हर कोई अपना ज्ञान बताये, ऊँचे शिखर पर चढ़ाये, तो कभी गहरी खाई में ले जाये, बैरी मन भी तो कुछ ना भाये। सहमा से वहमा सा मन लेकर, अंहकार सा गर्व, कुछ तन लेकर, अपने रोजगार को निर्भरता के रुप लगाया, तभी आगे बढ़ने का होंसला आया, दिन भर कर्म पथ पर बढ़ कर, शाम घर खेत घुम कर, रात-रात भर पढ़ना रहा, सरकारी बनने का जुनून बढ़ता रहा। खुद जाकर या भेजकर के किसी को, हर पाठ पढ़ा नौकरी पाने को, हार ना मानी घर समाज से तो, हार कैसे मानें वो खुद से यों। खुलती ना आँखें नींदो से भरी जो, लगती ना आँख सपनों से भरी जो, कठोर तप है अगर तो मुझे करना, हो कोई बाधा पर मुझे लङना। शाम सवेरे और समय निकाला, चित्तौढ़ के गौरव को मन उतारा, साहस का थाम दामन वो, पढ़ रही थी आत्मनिर्भर होने को। उलाहना का अब फर्क नहीं, उल्टे बोल को सुल्टाती वहीं, कहती बस अब फिर मन की, चलने किसी की देती नहीं। दबे मन में सपने ...

सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट / Suni part-11 Dharm Arth sankat

  सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट घोर विपदा छाई, धर्म-अर्थ संकंट लाई, सब ओर उलाहना सहती, वो अब अकेले रहती। कहती कम गुम सी वो, काम करती रहती वो, बोलना चलना कम हुआ, अब जीवन एकाकी हुआ। समझ थी सबकी सोंच की, बात कहती पर पहले तोलती, मायुसी का मुखोटा ओढ़ा, जीवन को काम से जोङा। नये दोस्त बन गये, बच्चों मे घुल-मिल गये, पर मन में थी कुछ ठानी, कोटा जाकर नौकरी पानी। अर्थ का संकंट रोके था, धर्म का कांटा चुभ रहा, जैसे-जैसे अब चल रही, सुनी जिन्दगी कट रही। बोझ ना थी अहसास जगा, आत्मनिर्भरता का स्वाद चखा, रोज-रोज निमट कर जाना, खुद को कुछ काबिल बनाना। आसान ना थी पर झेल रही, सपनों को फिर बैग में मेल रही, कह रही खुश हूँ पर खुश कहाँ, अनसुनी मैं मेरी सुनी कहाँ। बच्चों में बच्ची बनती, स्टाॅफ से कुछ ही बनती, रोज अपने आप को संभालना, सुनना ना किसी की उलाहना। कुछ पैसे मिलते थे, अपने खर्चे चलते थे, घर से सारी मदद गई, अब वो भी कमाने लग गई। सुनकर जवाब चुप रहती, पर कुछ ना अब किसी कि सुनती, छोङ घर चली ही जाऊँगी, अगर किसी को बुरा पाऊँगी। खुद से लङती और कहती, चली ही जा क्यूँ सहती, पैसे वाले हैं खुश रखेंगे, तु कहे वैसे र...

सुनी भाग-10 पारिवारीक दबाव / suni part-10 parivarik dabav

सुनी भाग-10 पारिवारीक दबाव सबकी प्यारी लाङली वो, हॅसती, हॅसाती, रुलाती वो, मन में रखती नहीं कुछ भी हो, कह देती जो भी सुनी हो। बाल जीवन आनंदित था बिताया, सामाजिक कंलक ने जहर थमाया, घर वालों का साथ भी मिला, पर मन में रही मन की गीला। शिकवे कई, शिकायतें कई, पर हरदम उसे मौज रही, किसी का जोर चलने ना देती, मुहॅ फट थी सब कह देती। मोहल्ले की वो रानी थी, स्कुल में हर दम मनमानी की, काॅलेज में किसी की चलने ना दी, घर पर उसकी चलती ना थी। बस लाङ प्यार का सहारा, जहाँ हारे वहीं आँसुओं की धारा, जैसे-तैसे कर बित गई उमर बचपन की, अब पढ़ाई पुरी कर बात हुई जवानी की। ओने-पोने दे आने के लोग, छिंटा कसी कर देते रोज, रोज-रोज के बहानों की धुनी, अब पारिवारिक दबाव में सुनी। सारी कोशिशों से हारे वो, चली नहीं कहीं चलाई जो, लङका रहा नोंवी फैल, लङकी एम. एस. सी. कर ली तो। अब बैमेल रिश्ता भी कहते, लोग टोंट कसते रहते, सुन-सुन के वर वोले ताव में, सुनी को ले आये पारिवारिक दबाव में। अबकी बार चाल चले, घर ना चुनकर समाज चुनें, बुलाई बैठक अपनी वधु चाहने को, आरोपित किया पिता समाज बिगाङने को। सम्मानित सदस्य समझाते रहे, पिता अपनी और...

सुनी भाग-9 स्नातकोत्तर / Suni part-9 Post graduation

  सुनी भाग-9 स्नातकोत्तर पास होती गई वो ग्वाली, मस्त रहती थी वो बावली, शिक्षक प्रशिक्षण भी हो गया, अब घर पर पहरा हो गया। खुब मौज में फिर लौट आई, रोज शाम को वो दोस्त पाई, बातें अब मोबाइल पर थी, सुनी अब सबसे खुश थी। विद्वानों का सामर्थ्य मिला, पथ पदर्शन और घर का साथ मिला, सबकी तारिफें सुन परिवार खुश, आगे भी पढ़ना है चाहे हो दुख। कुछ समझाया कुछ माना, घर वालों ने उसे जाना, स्नातकोत्तर में फिर प्रवेश लिया, निरंतर अध्ययन को पुरा किया। फिर से रोज पढ़ना था, काॅलेज लाइफ में जीना था, खुशी के लम्हें सज रहे, सुनी को पीपंल खिल रहे। जिक्र नहीं ना देखा वर को, बालपन में बांधा जीवन को, एक बार काॅल आया भी, कुछ सुनी को भरमाया भी। साफ शब्दों में दो टुक कहा, मैंने कभी तुम्हें अपना ना कहा, साधो अपने जीवन पथ को तुम, मुझसे रहना हमेशा दुर तुम। फिर ना दुबारा काॅल हुआ, नम्बर ही बदला जो मन में बवाल हुआ। कहती रही सखियों में सब, जीवन की रही सलाखें जब। नव उमंग परवान थी, सुनी अब रसमय खान थी, अपनी मर्यादा में बंध कर ही, प्रेम पढ़ाई कर रही थी। काॅचिंग जाना काॅलेज जाना, संस्कारों में पहने वस्त्र दिखाना, खुलके सबको ह...

सुनी भाग-8 शिक्षक प्रशिक्षण / suni part-8 shikshak prashikshan

सुनी भाग-8  शिक्षक प्रशिक्षण अपने ओज और अपने गुण, मिले जो शब्द उनको बुन, लिखी ये कहानी जो है बुनी, अब एक मोङ पर आयी सुनी। एक बार मे ही ब्रेक किया, प्रथम प्रवेशिका परख पास किया, पुरी पढ़ाई करके लक्ष्य पर अब,  शिक्षक प्रशिक्षण महाविध्यालय में अब। वही सीमित संसाधन थे, पर अब बहिन भाई के पास साधन थे, पैसे की कोई कमी ना रही, अच्छे मन से वो रोज काॅलेज गई। नव योवन सुंदर मुख, श्वेत रंग रोचक सुख, काया से बलिष्ठ ऊँची थी, सुनी मन की पर पुरी खिली थी। साङी की पौशाक शाक पर, दिखती अब बहुत धाक पर, कुछ अहं यहीं से जन्मा था, जब सबसे कुछ अच्छा सुना था। सुनेपन की अब परवाह नहीं, व्यस्त जीवन अब परवाह नहीं, गाँव शहर से संपर्क टुटा, रोज काॅलेज से नाता जुङा। अप टु डेट रहना था, मस्त लग रही सबका कहना था, पढ़ाई में सबसे आगे थी, कुछ खुशी मन की जन्मी थी। चर्चाओं का यहाँ बाजार गर्म हुआ, नैनों से मन नर्म हुआ, देख एक अनजाने को, अपनापन पनपा उसे पाने को। नया परिवेश नई उमंग थी, रोज देख-देख चाहत दंग थी, एक अहसास प्यार सा हुआ, संभाला बहुत पर असर हुआ। ध्यान कर अपना बचपन, कुछ कङवे किस्से और भदा मन, जीवन डगर भविष्य की...