संदेश

डर भी है / darr bhi hai

  डर भी है परिवर्तन की लहर में डर भी है। हवा, पानी, जीवन की बदल में डर भी है। कैसे होंगे दिन अकेले एकान्त के। धोरों वाली मिट्टी में होंगे कैसे खैल वे। कब जाके सुकून मिलेगा मेरे लहजे को। प्यास अधुरी कब मिटेगी, कब जाके शांत होगा चित्त मेरा ये। परिवर्तन की लहर में डर भी है। बदलने को जमीन मन निडर भी है। जाने को जहान तैय्यार हूँ मैं। अपने हिसाब से जीने को तैय्यार हूँ मैं। तैय्यार हूँ कि अब अकेले हाथ मजबुत है। करना है बहुत कुछ उससे तैय्यार हूँ। परिवर्तन की लहर में डर भी है। आगे जाने से पहले म मैं डर भी है। किसी का साथ पाने को डर भी है। किसी का साथ ना मिलने से डर भी है। परिवर्तन की लहर में डर भी है।। -कवितारानी।

बाल मनुहार / bal manuhar

 बाल मनुहार नटखट नादान रंग रहता हर वार। स्कुल जाते पाते रहते हम बाल मनुहार। बात वात हमेशा होती, कुछ ही बस सार। हाथ दात मधुर साथ मेरा बाल मनुहार। कभी मंद-मंद, कभी रन्ध्र-रन्ध्र होती धार। मन उल्लास, तन आलास पर चलती रहती बाल मनुहार। पास रहे मेरे साथ रहे हमेशा सबका प्यार। मन भरु खुलकर जिऊ मिला जो भी बालल मनुहार। कसौटी समय रोकता रहता करता मुझसे लार। कर हुलार अपने अनुसार जीता में बाल मनुहार। कौन कपट मन कहता भरता आह हर बार। बिछुङन की आहट होये जो बाल मनुहार। बाल मनुहार उल्लास हर बार। प्यार हर बार बाल मनुहार।। -कवितारानी।

नया जमाना है / naya jamana hahi

  नया जमाना है  ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ने उठने पढ़ने, ये प्रगति मोढ़ का जमाना है। दिखावे के साथी आते, गाते मन से मन बहकाते। लाते सपने बनते अपने, ये दिखावे का जमाना है। ये आजमाने का जमाना है, स्वार्थ ही सब माना है। सिध्द अपने काम ही, मिलने का ये बहाना है। ये निज का बहाना है, हर मोङ पर गाना है। आगे बढ़ने को दुसरे को गिराने का जमाना है। हित का बहाना है, ये नजदिक ही आना है। प्रेम पथ सब गाते आते, मन को समझाना है। ये लत का माना है, ये निज का जमाना है। ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ते स्वार्थ रोह पे, ये होङ मोङ का जमाना है।। -कवितारानी।

कली हूँ मैं / kali hun main

कली हूँ मैं आज रो दी मैं तेरी फटकार से, रोक ना पाई आँसु तेरी डाट से,  खता हुई तो समझाना था, मेरी गलतियों को देना सहारा था, फिर से खिलकर की में महक उठती, कली थी मैं कि फिर चहक उठती, इतना ना दबाव डाल, ऐ माली मेरे ना दाव डाल, मैं सीधी साधी बढ़ती हूँ, तु भी जानता है मैं बनती बीगङती है, कोई हवा का झोंका हिलाता है, कोई शीत लहर बुलाती है, मैं जाती कहाँ तेरी बगीया से, पानी ना ज्यादा डाल, ना खाद से जला ज्यादा, खाद डाल की सह सकुं, काट- छांक की बढ़ सकुं, सुन्दर उपवन जो मैं खिलुंगी, तेरे आँगन की शान बनुँगी, रुक जा थोङा की आगे बढ़ सकुं, कली हूँ मैं तोङ ना की फुल बनुँगी, कली हूँ मैं कि फिर खिलुँगी। -कवितारानी।

सब शांत है /sab shant hai

  सब शांत है गलियारा था बगीया थी, शांत दोपहर पाठशाला थी। महकती बहकती आली थी, नम आँखे थी कपोल भी। कैसे भावुकता का सागर बहता, देखा कैसे आँगन था रोता। देख रहे नव युवती युवक भी, कह रहे अक्ल विदुषक भी। समझ रहा एकान्त अन्तर्मन,  रोकुं कैसे बहता मन। ना अंत दिखे अन्तर्ध्यान हुआ, बहते नयनों मे सब सार हुआ। कौन समझे खता हुई, माफ करदो मैं पापी ही। दुर तलक उजियारा है, मति भ्रम बस अँधियारा है। नहीं दिखा नम भावी भाग था, भुल हुई विकराल रुप था। बीत गया अब याद है, दिन गया सब शांत है। बीत गया सब शांत है। भूल गई सब शांत है।। -कवितारानी।

नित निरंतर आहट / nit nirantra aahat

 नित निरंतर आहट नित निरंमित भौर ऊठूँ। स्नान, माँग पठन करुँ। पाठन कार्य रोज सवेरे। बोलते करते शाम को ढेरे। शाम आम मन भिगोति। खान पान कर रात होती। निशा नाश किताबें पढ़कर। नित निरंतर उठकर पढ़कर। कटते रह रहे दिन मेरे। अपने मार्ग अपना काटे। हम भये मुर्ख सपने बाटें। मन बहलाये रोज बातें। लोग कहे कर्म के भाटे। कर्म कठोर खुशी अपार। रोज लङते बढ़ते पढ़ते पार। कहे किससे किस्से सार। शाम को बेठते होकर हार। अपने मन की बात कहूँ तो। थका नहीं पर कब तक ही। चलना है मुझको भाता। पर मनका अँधेरा सहा ना जाता। कौन भौर याद ना दिलाती। खा गई बैरी प्यार की बाती। जलता रहता मन दिया सा। कहना नहीं हाल जिया का। नित नियमित दिन ढलते। कितने सपने बनते बिगङते। खुशी किसी की मन चढ़ती। पल भर से ज्यादा आस ना बढ़ती। सांस थमे जब कोई पलटे। दिल के पन्ने नम करते। नित नियमित संघर्ष रत। खुद से लङता रहता रत। शीत गलन मुझको भावे। कठिन निद्रा अब ना आवे। ध्यान भंग अब अंग जलन। खो गई जीने मरने की लगन। मन मस्त जब भीङ गावे। उलझे जग में चैन पाये। पलटी हवा अब मन नहीं। कट जाये जीवन जल्दी अब। आस नहीं अच्छा होने की अब। सब रद्द सब रत कुछ नहीं। ढल...

vidai / विदाई

 विदाई ये वक्त विदा, ये जज्बात विदा। जो जिये साथ थे बच्चे हो रहे विदा,  जिनके साथ था किया काम वो गुरुजी हो रहे विदा। ये विदाई की घङियाँ है, ये भावनाओं का ज्वार है। ये दिन दुख का है, ये पल दुख का है। मेरे मुख मंडल पर निशान है, मेरी आँखों में आँसु है। मेरे मन में पीङा, और स्मृति में बस यादें हैं। मैं भाव व्यक्त करुँ कैसे, मैं अपने दिल को हरुँ कैसे। मैं समझाऊँ मन को ये कैसे, मैं इस पल को चाहूँ कैसे। कैसे में ये आलाप करुँ, जब मन से बस विलाप करुँ। मैं कैसे आप सब को विदा करुँ, मैं कैसे आप को विदा करुँ।। दिल से दर्द बयां करता हूँ, मैं रोती आँखों से ही कहता हूँ। आप सदा रहे दिल में मेरे, आप सदा रहेंगे दिल में मेरे। में मन से आप को विदा करुँ, आपके शुभ मंगल के गान करुँ। मैं मन से आप को विदा करुँ, मैं मन से आपके गुणगान करुँ।। हॅसमुख आप सब, गुणवान आप सब, रहे खुशहाल सदा। महानता के आचरण लिए, मन में गुरुओं का सम्मान लिए, रहे आप आबाद सदा। ज्ञान का सागर समेट, दुखो-कष्टों को मेट, आप करें कुल का नाम सदा। मैं करुँ विदा दिन ये, ना आप करना मन से कभी विदा।। आदरणीय का भाव करुँ मैं, गुरुवर से रहे आप। ह...

मन मेरा माने ना / man mera mane na

  मन मेरा माने ना रुठा नहीं किसी से अब। याद नहीं आती है। अकेले में फिर क्यों आँख भर आती है। कैसे कहुँ हाल कोई जाने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। ख्वाहिशें हो अधुरी तो पुरा करने जाऊँ। मन से रोऊँ और मुस्कुराऊँ। हालात दिल के कोई जाने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। कहता फिरे जग को की कौन अपना है। भरे दिल से मिलते सब सपना है। दिल को भाये वो अपना माने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। लगता है हवाएँ खिलाफ है मेरे। भाग में पल भर की खुशियाँ है मेरे। कोई अपना दिल से खुशियाँ जाने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। खुब कहा है कहने वाले एकान्त ने। जी लो ऊपर से, अंदर ना जाना किसी के। तुम बुरे जग ओर बुरा कौन किसी की माने है। मेरा मन अकेला माने ना। हाल अपना माने ना। मेरा अकेला माने ना।। कवितारानी।

हवायें बहने लगी है / havayen bahane lagi hai

हवायें बहने लगी है हवाएँ बहने लगी है। लगता मौसम करवट ले रहा है। अजब सी खमौशी छाने लगी। लगता है बरसात होने वाली है। बादल कम है आसमान पर। मौसम जाने कैसे सता रहा है। हाल ऐ दिल मुश्किल है समझना। अहसास बदलने लगा है। कोई आके हाल पुछ ले बस। बैठे पास मन की सुन ले बस। कहता रहुँ शाम तक अपनी ही। कोई आके समझ ले बस। आज रोना नहीं, पर शीत भी नहीं है। गर्मी का आलम नहीं ना शीत गई है। जाने कैसे इस मौसम ने करवट ली है। हवाएँ बहने लगी है।। -कवितारानी।

रुक जा रहा / ruk ja jaraa

रुक जा रहा रुक जा जरा... साँस ले लुँ मैं, रुक जा जरा, साँस ले लुँ मैं... थक गया हूँ, चलते-चलते, थक गया हूँ, चलते-चलते है। रुक जा जरा, साँस ले लूँ मैं। तु तेज बङा, जा रहा हूँ, गति तेरी, बहुत तेज है, देखुँ कहाँ, की कोई छोर नहीं, मन का पंछी, टिके ठोर नहीं, बन चकोर, उङता फिरुँ, जग में अपने, ठहरुँ कहाँ, रुक जा जरा, साँस ले लुँ मैं, रुक जा जरा, साँस ले लूँ मैं। इस बार तु, मान ले मेरी,  कहता है मन मेरा, सुन ले जरा, दो पल की, रुक जा जरा, साँस ले लूँ मैं। ऐ मनवा तु धैरी, माने नहीं मेरी, सुनता नहीं मेरी, सुनता नहीं कभी, करता नहीं कभी, करता है बस मन की। रुक जा जरा, साँस ले लु मैं, रुक जा जरा, साँस ले लुँ मैं, थक गया हूँ, ठहर जाऊँ मैं, रुक जा जरा, रुक जाना। कभी-कभी मन मैं, प्रश्न हो ये मन मैं, मेरे मन में तु होवे, आये कहीं से हवा, हवा सिहर करें। कह दुँ तुझे, मन दुँ तुझे, मन का मैल हरे, रुक जा जरा, मन मेरे, रुक जा जरा, मन मेरे, कुछ देर देर तो मैं, साँस ले लु मैं, रुक जा जरा, कुछ देर रुक जा, रुक था वक्त के, वक्त के साये में, रुक जा जरा, साँस ले लु मैं, रुक जा जरा, रुक जा जरा।। -कवितारानी।

मन की ठेस / man ki thes

मन की ठेस भीङ-भाङ, ताङ-ताङ, बार-बार, लगातार, बिना सार, हार-हार, मार-मार, मनका सार, हुआ तार-तार, छोर कहीं, नहीं ठोर कहीं, अहसास नहीं, मन में बात नहीं, चल रहा, बार-बार, हर बार, उठ खङा हुआ, यहीं पङा हुआ, इस बार, कभी उस बार, बिना सार, मैं कह रहा, मन की लैस, मन की ठेस, मन की ठेस, मन की ठेस।। -कवितारानी।

अधुरा / Adhura

  अधुरा अधुरा था मैं अधुरा ही रहा। पाकर एक आसमां को धुल बना। ना जमीन से अंकुरित हुआ। ना सार जीवन का बना।। जमीन में दफ्न आधा नम पङा हुआ। खिलने को अभी भी जमीन में पङा हुआ। कब वो बरसात होगी। रहमत खुदा की प्यास होगी। जाने कब बनेगा तराना मेरा। जाने कब प्यार की बात होगी। सुकुन उर आराम होगा। मन का मन से साथ होगा। जो देखुँगा मुस्कान संग ही। जहाँ चाहुँगा मन उमंग ही। अहसास प्यार का हर तंरग में होगा। जब दिल होगा मौज का आसमां होगा। अधुरा था मैं अधुरा रहा। कहा क्या, क्या रह गया। पहले से शुरु हुआ। पहले पे ही खत्म हुआ। अधुरा था मैं, अधुरा ही रहा। खुद को खोजता हूँ मैं कहाँ होगा। अधुरा था, अधुरा ही रहा।। -कवितारानी।

ऐ आसमां झुक जा जरा / e aasman jhuk ja jara

ऐ आसमां झुक जा जरा मेरा मुझमें रहा क्या। जो भीङ में रहूँ अकेला मैं। मेरा मुझमें रहा क्या। जो अँधेरे में घुटता रहूँ मैं।। ऐ आसमां जरा झुक भी जा। नमी से तर हो जाऊँ मैं।। सुखा पङा है उपवन मेरा। बंसत सुनहरी पाऊँ मैं।। मेरी जमीन दरारों भरी। रेत की आँधियाँ ही बन जाऊँ मैं।। ऐ आसमां झुक जा जरा। अनन्त सा खो जाऊँ मैं।। तु भी खुब मजे करता है। दुर खङा मुझे तकता है।। कहना नहीं तुझसे कुछ । चादर मुझपे बन जा जरा।। मेरा मुझमें रहा नहीं। जो भीङ में रहूँ अकेला मैं।। पुरा ्ब होना पाऊँगा। रह गया अधुरा मैं।। पाकर जो खोया है। मुझे अब बचा नहीं है। ऐ आसमां झुुक जरा। बह जाऊँ खुलकर मैं।। अन्तर्मन भी अकेला है। आसमां में कही ढेरा है।। तारों संग यारी है। सबकी अपनी बारी है।। तपन शीत अँधेरा घना। मैं खुद में बचा कहाँ।। फुल बगीया महक रहा। खुशबु खुुद को आती कहाँ।। बह रहा हूँ नदिया सा। प्यास खुदकी बुझती कहाँ। चमक चाँदनी खुब है। पर चाँद है अँधेरे का यहाँ।। तपन हूँ रवि की मैं। पर ढण्डक मुझमें है कहाँ।। उङ रहा ठोर-ठोर जग में मैं। बेठोर हूँ भाता कुछ कहाँ। जाऊँ जहाँ लौट आता हूँ।। लहर हूँ जलधि नदी कहाँ। ऐ आसमां जरा झुक जा।...

ले चल दुर कहीं / le chal dur kahin

ले चल दुर कहीं ले जा दुर कहीं की अरमानों की ख्वाहिंशे है। सपनों की सेज से दुर कहीं पैमाईश है।। ले जा ख्वाब मेरे आँखो मे आ जाती नमी। खो जाता हूँ मैं, जो तु संग नहीं।। आजमाइश जिंदगी, कह दुँ कमी है तु ही। ना कल तु हुआ, ना आज भुला हूँ कहीं।। दबे अँधेरे कोने रहते हो तुम कहीं। आजमाशें आ जाती रहके यहीं।। ले जा दुर कहीं की अरमानों की ख्वाहिशें है। सपनों की सेज सजी दुर है आजमाइशें भी।। ले चल संग मुझे भाता नहीं जग कहीं। जीता हूँ रोज में जिंदा है तु मुझमें ही।। हाँ वो दिन फिर से आ जाते है मन मैं कभी। ना चाहते हुए भी रोक पाता हुँ मैं नहीं।। चल संग चल मेरे मैं कभी साथ छोङुगाँ नहीं। मेरा मकसद तुझे पाने को है तेरे दिल में बसना ही।। ना चाहूँ तेरी काया को काया में मेरा कुछ नहीं। सपनें हैं अपने हैं जोर है आजमाइशें भी।। चल संग चल मेरे सपनों की दुनिया है हसीन। आ चल संग मेरे अकेला हूँ रुका तुझमें ही।। ले जा दुर मुझे लगता है डर अँधेरे से कहीं। सपनों की सेज है ले चल दुर कहीं।। -कवितारानी।

हवायें खिलाफ / havayen khilaf

हवायें खिलाफ ऊपरी धुन था, था अपने लिहाफ। चलता रहा अकेला ही, हवायें थी खिलाफ। कभी मंद-मंद, कभी शौर-शौर। आती जाती कानों में खिंचती थी डोर। काया कंचन हुई-हुई शीत चुभन भी। चली जब शरद ऋत तो लगती थी टीस।। चलता रहता गलता रहता, रहता फिर बंद-बंद। थोङी तेज कभी-कभी मंद-मंद करती हवाएं तंज। रुकना था कभी सिखा नहीं चाहे रहूँ पुरा या हाॅफ। लगता था दुर्दिन है जैसे हो हवायें खिलाफ। अपने लिहाज अपने हिसाब खिंचता डोर चलता सख अपनी लाज। कि कोई ठेस नहीं, अब कोई पेंच नहीं रहता में अपने लिहाफ। मन में उठता बढ़ता रहता करके खुद से जिहाद। नजर उठाई पता चला हवायें ही थी मेरे खिलाफ। कभी ऋत मेरी स्थाई ना आई। ना एक निरंतर समय की परछाई। जाने कब किस घङी बीत गई एक मिसाज। चलते रहता, बढ़ते रहता थी भले हवायें खिलाफ। सोंचता ना कोसता ना था, दृढ़ किये अपने लिहाफ। चलता रहता, बढ़ता रहता चाहे थी कितनी हवायें खिलाफ। चाहे थी कितनी हवायें खिलाफ।। -कवितारानी।

एक त्योहार और गया / ek aor tyohar gya

एक त्योहार और गया गुजर गया त्योहार एक और। परवान ना चढ़ी पतंग मेरी। तरसता रह गया खुद में ही। साँस ना जुङी साँस से ही। कब से सोंचा था कल बेहतर होगा। आज नहीं हुआ चलो कल तो बेहतर होगा। हर कल में मेरी कल की उम्मीद बिगङी। आज की अधुरी जिन्दगी रह गयी। एक और त्योहार गया रह गयी साँसे अधुरी। आस तो टुटी थी रह गयी प्यास अधुरी। ऐसा तो कल भी था मेरा मन लगता ना था। लगती ना थी आस किसी से किसी से प्यार नहीं था। ना प्यार आज परवान है। जाने क्यों फिर से त्योहार कोरा रहा । गुजर गयी एक दिन की ओर जिन्दगी। गुजर गया त्योहार एक ओर। परवान ना चढुी पतंग मेरी।। -कवितारानी।

रब्बा मेरे लिख दे मेरी जिन्दगी / rabba mere likh de meri zindagi

रब्बा मेरे लिख दे मेरी जिन्दगी वो तेरी साँसे थी, वो थी तेरी गली। मैं तो तेरी राह था, मैं तो था ही तेरी गली। वो तू थी जो पहचानी नहीं, वो तू थी जो मानी नहीं, मेरा ईश्क रह गया, रह गयी मेरी आशिकी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी। ख्वाबो में... नींदो में... मेरी तकदीर की हो लकीर वही। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। हो आते जाते है ख्वाबो में मेरे कैसे रोकुं में। उन खयालो को रोकुं कैसे में। कैसे कह दुँ की बदल ही दी मैनें जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। वो तेरी आस थी की मैं चलता रहा। रुका ना पल इक, मैं बढ़ता रहा। कभी सोंचा ना थी की कोई होगी बेखुदी। की कभी होगी बारिस ओ बोखुदी मेरी जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे तकदीर मेरी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। वो बातें ना लिखना, मुझे सताये हमेशा। उभर पाऊँ दर्द से कराहुँ सदा। लिखना ना तु, दोखे भरी दोस्ती। लिख देना भले, मुझे कोरे कागज सा ही। ओ रब्बा मेरे, लिखना तो सही। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। जब भी बीते लम्हों में खो जाता है मैं। कांपता रुह तक सिहर ज...

कटी पतंग / kati patang

कटी पतंग कभी डील-डील, कभी खिंच-खिंच। कभी उङी-उङी, कभी कटी-कटी पतंग।। तंग पर तंग, कर हर पतंग भंग। चली गई दुर कहीं आखिर कर मेरी पतंग।। हवा हिलोर चढ़ाई थी होकर स्याम रंग। देख दुर अनन्त सार अब जा रही अनन्त मेरी पतंग।। कौन डोर दृढ़ दंश हुआ की हो गई भ्रंश। देखता रह गया कि जा रही मेरी कटी पतंग।। कर धार तार बङा भार चल पङी हवा रंज। उठा ठोर पंतग रोल उंमग हुई फिर से अंग।। कभी इस ओर, कभी उस ओर कर मुझको तंग। कि हवा वेग हुआ तेज चली जा रही दुर कहीं मेरी पंतग।। देख रण छोर ढिली ढोर बङा दी मैंने उङा दी मैंने उमंग। भेरी हुई जयकार हुई कि मैंने उङा दी कटी पतंग।। एक ओर गया दुजी ओर गया कर दिये गढ़ सब भंग। इस ओर दिखे उस ओर दिखे बह रही सब कटी पतंग।। वो श्वेत श्याम योध्दा साम चित्र सी आई भुजंग। कौन जार लेप आये कि कत्ल किया हुई कटी पंतग।। निराश नाश ना होकर हताश फिर उठा की सर पर जंग। इस ओर गई उस ओर कई जाती रही मेरी सब ओर फिर पतंग।। आज चली मनचली हवा संग नव उमंग संक्रांति संग। सिखा गई सिख कई कटती रहती है हर रोज कई कटी पतंग।। -कवितारानी।

भारत माता जननी है / bharat mata janani hai

भारत माता जननी है धधक-धधक जल रही अग्नि अवनि है। गौरवशाली भूमि ये भारत माता जननी है। करनी अपनी इस धरा को हर युग भरनी है। विश्व विधाता ज्ञान दाता भारत माता जननी है। अग्नि ज्वाला ज्योति हर कोने जग उतरनी है। ज्ञान सागर भारत भूमि हँस वाहिनी है। रस अमृत प्रेम, पताका शाँति की स्त्रोत स्विनि है। श्री शिरोधरा अमृतसार सी भारत माता तरंगिणी है। विधु वैभव निशा छाकर बढ़ती रहनी ही रहनी है। गौरवशाली भारत भूमि ज्ञान की जननी है। तमस् वयस् बहत् घटत बढ़ती जो वहनि है। ओज रोष हटत् रहत जो ज्वाला बननी जननी है। गौरवशाली भारत भूमि जल रही अ्ग्नि अवनि है। भारत माता भाग्य विधाता भारत भूमि जननी है।। -कवितारानी।

जागो ऐ देश के युवक / jago e desh ke yuvak

जागो ऐ देश के युवक इस मिट्टी से उपजे, इसका गुणगान करो। जग भ्रम में ढुब रहा, जागो युवा ललकार करो। ललकार करो कि हिल जाये चट्टानों से इरादे वो। गाते रहते दिल्ली में टुकङे के इरादे लेकर जो। कोई जिन्ना आके फिर भारत का ना मान हरे। जागो ऐ भारत के युवक विनती हम आज करें।। ना केसरिया मटमैला हो ना हरा गायब होने दो। समझो चक्र कि किमत श्वेत का गुणगान करो। अँन्धकार फैला है सब ओर सोशल साइट नाम पर। गुणगान करो ज्ञान का ना किसी का अभिमान करो। जागो ऐ देश के युवक देश का तुम उध्दार करो। जो देखा सपना गाँधी, कलाम ने उसे तुम साकार करो।। सोया है आज तेरा, मन, मस्तिष्क निस्तेज है। बदलती करवटों में क्यों केवल दीवानगी है। दिवास्प्न से उठ जरा अपनी भारत माँ का नाम। बदलते परिवेश में विकास का पथ पान करो। जागो ऐ देश युवक देश का तुम नाम करो। ज्ञान ज्योत जलाकर खुद में देश का उध्दार करो।। वो भारत भाग्य विधाता उद्गार कर रहा। आज को सोंच रहा, आज को गा रहा। इस आज की, आँच से कल का स्वप्न साकार हो। बनती बिगङती बातों से खुद को करे आजाद हम। देश के उध्दार में हो भागीदार हम। जागो ऐ देश के युवा देश का उध्दार करो।। -कवितारानी।

ये भारत देश क्या चाहता है / Ye Bharat desh kya chahta hai

ये भारत देश क्या चाहता है। युवा दिवस है ये 12 जनवरी का, भारत जन इसे मनाता है। युवाओं का जोश बढ़ाने वाला, युवा दिवस मुझे बहोत भाता है। जन प्रचलित जर में युवा क्या-क्या ना गाता है। पर भारत जन (लोगो) जानों ये भारत क्या चाहता है। ये भारत क्या चाहता है। देख हवा आज की क्या-क्या ना मन में उपजा है। बिन बारिस बह रहा, मन मेरा समझ ना पाता है। ना मिट्टी का रंग बदल पाये, आसमां वे साया है। फिर आज के युवा को, क्यों हरा, पीला भाया है। खङा तिरंगा सिर उठाके, ना मुझमें, तुझमें भेद करें। फिर क्यों गाय, बकरी को जग में हम भेंट करें। मोल करे देशभक्ति का किसको ये आता है। है भारत जन के युवा जानों ये भारत देश क्या चाहता है। ये भारत क्या चाहता है। ना तेरा, ना मेरा, ये देश है सबका जान लो। इस माटी की खुशबु में देशभक्ति को पहचान लो। माता है यो खिलाती है अन्न, फल हम सबको। पीते है निर्मल नीर नहीं भेद करती किसी को। फिर क्यों वन्दे गान करें, जयकार करे हम इसको। ऐ भारत जन जान लो हम जयकार करें इसको। यही इसको भाता है यही इसको भाता है। ऐ भारत ये समझ जाओ ये भारत यही चाहता है।। -कवितारानी।

How will be better?

 How will be better? The worst I play, The worst I get, Nothing left to be improved. How will be better and true? I left everything behind, I haven't anything to lost, Everywhere tears to not bear. I take myself all these rare, Who will be mine? Who will be my love? How can I assume then, I never begin again. Never live right this type. Never come to attach. I am rare, I am unique. How can I make self? How will be better Aim. I wish my God will help me. I wish you will be around. I tried as I can. Will help then more. and please tell me. How will be better and true. -kavitarani1 

दुर्दिन की याद / durdin ki yaad

दुर्दिन की याद हट गयी थी जमीं पैरों तले, आग लगी थी सीनें में, निर्बुध्दी, निस्तेज जैसे औझल मैं, हो गया था, घोर अँधेरा मन में, सब ओर खाली-खाली था, आँखों से बहता पानी था, गालों पर छिल-छिल के निशान पङे, आँखों में जैसे सुजन के अँगारे पङे, कुछ समझ का आसार ना था, जीने मरने का आभास ना था, कुछ नहीं पाने को रहा, खोने को अहसास ना था. लुुट गया पुर्ण रुप, मेरा मुझमें कुछ ना था, लाल रक्त, जलधि बन ऊफान था हुआ, निष्कंठ सुर नहीं भरता रहता मन, सर्व सुन्दर चुभन करते, अंदेशे हकिकत प्रमाण देते, लगते चोट महा अवनध्य से, कैसे ओर बखान करुं, विश्वास का हुआ था ऐसे कत्ल और क्या कहुँ, ना साँस रही ना आस रही, कटती दिन-रात पहर रही, याद अब बस ज्ञान रही, वो दुर्दिन की बस याद रही, बस याद रही।। -कवितारानी।

वो धुप मखमली / Vo dhup makhmali

वो धुप मखमली श्वेत श्याम तारों वाली, आभा लिये थी मखमली। मधुर गंध, निर्मल अंग, भा रही थी गोधुलि। शीत शहर, हर पहर, ताक रहा, हर घङी। पहर-पहर हर शहर खोजा ना मिली वो धुप मखमली। छत पर मेरी आती जाती करती थी अठखैली। लुक-छुप भाती पहर सुहाती करती थी नादानी। भाती थी वो मन छाती थी, वो आती थी स्वप्न भरी। नित निशा, भौर-प्रभा सी करती थी मन की बैचेनी। ऊष्म ताप, मन संताप लिये करता रवि पहरी। दिख जाये कही मिल जाये सुकुन भरी वो धुप मखमली। आँगन वो मेरा, वो गलियारा वो चोबारा, वो ढेरा। बीत गया पास पाकर उसको कितना मेरा सवेरा। अब तक गर्म हुई संतोष भरी, अब दे गई जलन कई। घाव गंभीर, मन में टिस, असंतोष से कट गई ये घङी। रात अकेले, भीङ के मेले आह आ जाती शीत भरी। ओज करते ,खोज बढ़ते देखते कही मिल जाये धुप मखमली। चंचंल थी, कंचन थी, थी जब तक निहार दुर रही। निकट आकर उग्र होकर विभत्स रुप दिखा गई। अचरज मन, विभत्स तन आस भी ना कर रही। कौन कहे दमित मन रोक रहा वो धुप मखमली। कोई उपाय भुल जाये नव उमंग गाये मिल गई धुप मखमली। कहीं पास आये दुख हर जाये आस ना पाये। कि मिल आये के धुप मखमली, वो धुप मखमली।। -कवितारानी।

आज खुद में ही अकेला / Aaj khud mein Akela

 आज खुद में ही अकेला रह गया खुद में ही अकेला, ख्वाब मखमली सोने ना दे। कलवटें रात भर नींद पुरी होये ना, सपने अधुरे-अधुरे दिन में जाने ना दे। कौन ठौर बैठी है जिन्दगी तु, ठोकरे बहुत लगाती है। रोज कसमकस तुझसे होती, जग में तु भटकाती है। कोई छोर मिला होता, ठहर जाता मैं रुक जाता। आसियाना अपना बनाकर, सपनों का महल सजाता। रह गया अटका ही, जो भटका अपने सपने में। ना आज मिला हकिकत सा, कल का कोई ठौर नहीं। कर्म की राह चला हूँ आज, मेहनत जी तोङ है मेरी। सुबह होती है ठिठुरन में, रात अँधेरी आखरी पहर में। रह जाता है मेहनताना रोज, देता भी खुद ताने रोज। वो घङी तेरी पुरानी इन जैसी है, चल रहा काम क्या ये नकाफी है। ख्वाहीशों से जीने का समय नहीं, ये कर्म का पथ है अकेले का। फल की इच्छा करने लगा है, छोङ दे फिर निर्भर रहना। आज मिला वो कल काम आयेगा, कल की सोंच काम काम आयेगा। जो समझते है मेहनताना देंगे ही, ना समझ है वो मान लेंगे ही। कौन तेरा जी का था जो छुट रहा, साथ नहीं था जो अब रुठ गया। भुल सब के बस कर्म करजा, अकेला है भवसागर तर जा। ये जस तेरा गाये ना गाये जग, एक समय काल पुरा करना, हर ऊँची निची राह चख, हर दुख क...

देश, धर्म और कर्म पर कविताएँ

  देश, धर्म और कर्म पर कविताएँ   देश और धर्म ही है जो मानव को अपने अस्तित्व में संपोषित और आदर्श बनाये रखते है। मानव के कर्म ही उसे समाज में सम्मानित रखते है। यहाँ कविताओं के माध्यम से सबको देश और धर्म के प्रति और निष्ठावान बनाने की प्रेरणा का प्रयास किया गया है। ये कविताएँ आपको अपने कर्म से और प्रेरणा से जोङने का कार्य करेगी।   प्रस्तावना कविताएँ मानवीय भावनाओं का स्त्रोत होती है, इनसे हमें पता चलता है कि कवि ह्रदय किस तरह का भाव रखता है। हमारी कविताओं में आपको हमारे देश भारतवर्ष और यहाँ के लोगो के दिलों के जज्बे की मिशाल देखने को मिलेगी। मेरी कविताओं का स्त्रोत केवल मन की उद्वेग है और यही से मेरे टुटे-फुटे शब्दो का जन्म हुआ है जिन्हें संजोने का कार्य मेरे धर्म पति श्री रविकांत चीता जी ने किया है। यही मेरे प्रेरणापुंज है।  इन कविताओं में किसी को भी इशारा नहीं किया गया है ना किसी को निचा दिखाने की कोशिश की है। ये सारे भाव हमारे है और देश, धर्म और कर्म प्रेमियों के लिए है। किसी को कोई बात बुरी लगे तो हम क्षमा चाहते है। देश बिना हमारा अस्तित्व नहीं, धर्म बिना नैति...

बह रहे है नीर / Bah rahe hai Neer

बह रहे है नीर बिन कहे बह जाते, नम करते सुखी जमीं, छोर अंतिम ठोर तक, बहते रहने निरंतर नीर, कौन ठेस कर गया, दब गयी कौन प्रत्याशा, रोक दिया किसने, दबा दिया मन को, दब नहीं रहा सागर, ऊफान पर है जलधि ये, सीधी रेखा बन कर, बह गया अधीर, पीर ये कौनसी, कहाँ की छाया है, साग ना संबंधी वो, ना मन का ना तन का, जाने कहा से रोक रहा, दबा दिया अनायास यो, कह रहे अरमान अब, आजादी बह रही है, जो हलचल ना बही, ना रही मन जो, वो सब नीर में कह रही, ना ललकार हुई, ना हुई कोई पीर, इस बार बहे बङे रहे ये धीर, कौन घङी आ गये हो, बह रहे हो रण भीर, मुझमें मुझे ना छोङा, रहा ना कुछ भी, बह रहे है नीर, कब होंगे नम कपोल, खुशी के उन झरनों से, कब होगी बात खीर, मन बहे, बह रहे है नीर, बह रहे है नीर।। -कवितारानी।

लम्हों / Lamho

लम्हों  ऐ लम्हों ठहरो जरा, साथ हूँ मैं, भुलों ना। कौन मेरा तुम्हारे सिवा, कहना है तुमसे रहना है संग सदा। ऐ लम्हों ठहरो जरा, पता है रफ्तार तेज बहुत है तुम्हारी। मैं तो रुक जाता हूँ चलते हुए, अब वो जोश, हवा नहीं मुझमें। जो बढ़ाता था आगे मुझे, तो कुछ ही पर सुन लो मुझे। ऐ लम्हो ठहरो जरा, कुछ बुन लु मैं साथ तुम्हारे। कि सुनाने को किस्से हो, अकेले में गा सकुं। कुछ ही पर यादों के हिस्से हो, ऐ लम्हों साथ दो जरा, कि बुन लुँ मैं यादें यहाँ, ऐ लम्हों साथ ठहरो तो जरा। साथ हूँ मैं सुन लो जरा, पुकारता हूँ ध्यान दो ना। मेरे संग कुछ दुर तक चलो जरा, कह दो की पास हो यहाँ, ऐ लम्हो ठहरो जरा। वो आती जाती यादें, वो किस्से ओर बातें। संग चलते हुए ही तो बुनी थी, कही थी जो भी, किया था जो भी, वो बातें साथ ही है यहाँ। हाँ वो यादे है, वो बातें है, कहती है जो, साथ रहने की सौगाते है। ऐ लम्हों कह दो जरा, साथ चलनें की कह दो जरा। साथ लेकर ही चलो यहाँ, ऐ लम्हों ठहरो जरा, कहता हुँ साथ तो चलो जरा। ऐ लम्हों चल संग जरा, ऐ लम्हों ठहरो जरा।। -कवितारानी।

प्रिय परिणय प्रेम गाथा / Priya parinay prem gatha

प्रिय परिणय प्रेम गाथा दो जिस्म रुसवा थे, बेवफाई जो कि प्रियतमा ने। अग्नि सा जलता जिया लिये चल रहा प्रियतम धुप में। वो भीङ का समारोह याद है मुझे खुद में खोया अकेला था वो। बातें थी तरह-तरह की, मुस्कान चुभ भी रही थी बेवफा की तो। करता क्या लाचार सामने जाने बचता रहा हर पल वहाँ। सिस्कियाँ मौसी की गोद में हुई और आँसुओं की धार बंधा में वहाँ। देखा ना एक नजर उठाकर प्रेमी ह्रदय ने अकङ दंभ में वो रही। अथाह सागर भरा प्रियतम का दबा जैसे खुद ही था रहा। कोसता रहता मन ही मन कि क्यों किया यार से प्यार वहाँ। वो निर्मोही स्वछंद मस्त मन हर अदा से जला रहा। उसका था सहारा सात से मेरे सात महिनों की दुनिया ही रहा। लुटा वो या नहीं पर मुझमें था बाकि ना कुछ रहा। कोशिशों के सफर में मस्त मगन नाचना प्रिय ने शुरु किया। वो पास थी दो कदम क्षण भर कि नजर ने योवन ताक लिया। निर्मोही, निर्दोष, निष्कलंक, पुर्ण दंभ सा नाच उल्लास भरा। टीस भरा मन प्रियतम साथ दल मस्त मगन दिखता रहा। हर लय, ताल पर कोशिशें हर्ष दिखलाता था रहा। जाहीर ना थी मन की कुछ जग सारा भ्रमित रहा। नजर संरक्षक दिख रही पर में भुला बिछङा अनजान रहा। को काल कलेष विक...

फिर से हॅस / Phir se has

फिर से हॅस ले मैं फिर आ गया, कहना ना कि मैं फिर छा गया। बातें तो अपनी जग जाने है, कहाँ मैं मैं अटका हुँ। तु सुना ना, ना सुना अपनी बातें। क्योंकि टाइम है ये फोर मेरी कथनी। ले कथनी करनी की बातें होने लगी। इसमें तो तु ही है बङी सनी। अब तु हैण्डपंप पे जोर ना करना। चल काम बस किताबों को मरना। चल कुछ काम की बात करें। आ चल फिर रिट की रट करें। वैसे तेरा हॅसना अब मुमकिन है। सरकार ने 30 हजार की निकाली भर्ती है। बात बङी सहज है। समझ आया की हॅसी छुट पङी। हॅसना अपना काम कर ले। कुछ ना ते अब पङ ले। ले मैं भी बात मानुं। पङ ले अब तो मेरे नाल तु। हॅसी ना, हॅसी, करले पङाई। लङना ना, कर लेना बुराई।। -कवितारानी।

चल हॅस दे तु / chal has de tu

चल हॅस दे तु ले चल तुझे हॅसाता हुँ, ज्यादा मन समझना, पर तुझे फसाता हुँ। पता है मुझे तु फसेगी नहीं, पर जानता हुँ तु हसेगी ही। क्योंकि तु है छोटी सी, प्यारी सी, नन्ही सी, मुन्नी सी, चुन्नी, और मैं करता रहता हुँ कोशिशें हॅसाने की। तु जानती नहीं कि दुनिया बङी शैतान है, और तु जानती उसमें बङी हैवान है।  कभी कमीना तो कभी पागल तुने कह दिया, चल छोङ मैंने कुछ मन पे नहीं लिया। तु टाइम को अच्छा पास करे है, और मेरे टाइम पर रास करे है। देखो कितना अच्छा प्रयास किया है, तुझे हॅसाने को रेप किया है। अब हॅस भी दे कि लिखा ना जाता, मन को कुछ अब लिखा ना जाता। बातें मेरी तु एक्सपेक्ट ना कर, मेरे सिवा ऐसा, ऐसा किसी से एक्सेप्ट ना कर। दोस्ती अपनी युँ रहेगी, तु हॅसेगी तो मेरी कलम ना चलेगी। तो हॅस ना, पर अब चल हॅसना, हॅसना, हॅस, हॅस, हॅसना... हॅस दी क्या.. -कवितारानी।

पहला / Pahla

पहला पहला कौन जो मुझमें समाया, मन को भाया हाथ ना आया। या मन को भाकर तन ललचाया, या मन को छोकर शौर मचाया। या जिसने मुझको खुब सताया, पहला कौन जो मुझमें समाया।। एक वक्त था जब आ जाते थे तेरी रोशनी में हम। भुल गये थे अंधेरे ठण्डक को शांति को हम। धुल उङी तो आँखे भर आयी जब। याद आयी अंधेरे की जब धुप से आँखे चरमराई अब।। तो पहला कौन जो मुझे रुुलाया। या सांसे भर दी ओर तङपाया। या सपने सुन्दर साथ देकर भुल गया। या मन को सिखाकर छोङ गया। पहला कौन जो मुझे हराया।। वो वक्त पहर भुला ना हुँ, ना याद करके उलझा हूँ। शुक्र करुँ की आगे हुँ, उससे अब मैं वाकिफ हुँ। समझ आई दुनिया कि अब प्रौढ़ में गीना जाता मैं। महरबानी है कि अब समझदार कहलाता मैं।। तो पहला कौन जो मन का बन पाया। इस जग के नियमों को आसानी से समझ पाया। तो पहला कौन जो आगे है, सिख दुनिया का साथी है। इस दुनिया से अब वाकिफ है। दृढ़ ह्रदय अब साकी है। पहला कौन ... -कवितारानी।

एकान्त है तेरा / Akant hai tera

एकान्त है तेरा देख रहा हूँ पलक के छोर से। पलट गया है कितना कुछ।। एक साफ मन दुषित है। दुजा नजरिया प्रदुषित है।। कोई भीङ मन लुभाती थी। अब अहसास भी अकेला है।। दुर दरिया बहता था। आज मन मे लगा मैला है।। आते जाते लोग मिल रहे हैं। कोई अपना राग आलाप रहा।। सब ओर रोशनी कुछ छुपता ना रहा। साँस के हर आस में प्यास बुझती नहीं। मिल जाती है नदियाँ पर प्यास बुझती नहीं।। हर आँख में दोखा है। अपना कोई है नहीं।। हर एक को खुरेद कर देखुँ। तो एकान्त ही में मैं रहुँ।। कोई नहीं जग में सिखा अब रहा। सबको में अब कहता एकान्त है तेरा।। एकान्त है तेरा।। -कवितारानी।

साथी छुटा हुआ / sathi chhuta hua

साथी छुटा हुआ छुटा हुआ बहुत कुछ समझता हूँ। पा ना सका तुझे मानता हूँ। पर ऐसा तो ना की तो ही लिखा हो भाग में मेरे। कि पा ना सका तुझे और करता रहुँ मलाल खुद में। वो वक्त की रफ्तार तेज थी बङी। साथ में चल सका नहीं। अब समझता हूँ बित गया है वो। मेरा था नहीं पाने की कोशिशे की बङी। अब मेरा मन मुझमें धङकता है। किसी की आहटें जगाती नहीं अब। सामनें मेरे कोई चेहरा नहीं। नजरें फिर से खोजती है अपना कोई। अब आँसुओं के लिए समय कहाँ। साल नया व्यस्त मैं खुद में रहा। किसी से कोई मतलब नहीं। नजर भी नई नजरीया भी कोई नही। सब वक्त का फैर है। बढ़ जाते है। भुल जाते है। चल आगे बढ़ चलते हैं। ओर कौन साथ तेरा। एक एकान्त ही तो है साथी तेरा।। -कविताrani1।

सबर / sabar

सबर  कट जाते है पहर युँ ही, रह जाते है करते बसर सबुरी, राहत की राह मिलती नहीं, सपनों की कली खिलती नहीं, हट नहीं रहा कोहरा घना, दिख नहीं रहा सवेरा यहाँ, ठोर बदलुँ सोंचता हुँ, बदल नहीं रहा भाग यहाँ, जाऊँ कहाँ सोंच वही, सपनों में बसी है दुनिया यही, समझाती बुझाती मुझको ही, मै हुँ यहीं मेरा छोर कहीं, वक्त की रफ्तार से, मांगता हुँ प्यार से, मिलता पर बस वही, जो कहा दिल था नही, कट जाते है पहर युँ ही, रह जाते है करते सबुरी।। -कवितारानी।

मुझे रोकेगा कौन / mujhe rokega kon

चित्र
मुझे रोकेगा कौन मैं मिट्टी का बना, कौन मिटाने वाला मुझे। रुप, रंग का सौदागर, कौन हटाने वाला मुझे।। रंग बदलुंगा, रुप बदलुंगा, स्थान, काल भी बदलुंगा मैं। बहता रहुँ, उङता रहुँ, कौन रोकेगा मुझे।। मैं धरा रंग हुँ, धुल संग हुँ, मटमेले बहते दरिया में हुँ।

अभी सार बाकी है / abhi sar baki hai

अभी सार बाकी है गीर गया था उठने से पहले, थक ही गया दौङने से पहले। उठ खङा हुआ चलने लगा हूँ, नये रास्ते फिर से खोज रहा हूँ। लगता था की हार ही गया था तब तो मैं, चल ना पाऊँगा एक कदम भी अब तो मैं। एक साहस भर उंमगों को हवा भरी है, सोंचना छोङ कर्म की राह जङी है। कहता है मन अभी असली हार बाकी है, जीतने तक जीवन का सार बाकी है। आती जाती शीत लहर कंपा भले देती मुझे, भरी गर्मी में लू तपा भले देगी मुझे। पर गलने तक मुझे बढ़ते था रहना तब भी, राख हो जाँऊ तब तक चलते रहना है अब भी। रुकना ना मेरा मिजाज रहा था अँधेरे मैं तब, फिर आज कैसे रुक जाऊँ थक ही गया जब मैं। नव ऊर्जा, नव उंमग के बहाने सजाये हैं, आगे बढ़ने को दुखों को भुलाये हैं। हर्ष के पल घमंड ना करते देंगे कभी, चोट के निशान को देख आह भर आये हैं अभी। बस खयाल आज का साथ साकी, साथी है, जीवन बाकि की अभी सार बाकि है। अभी सार बाकि है।। -कवितारानी।

नव वर्ष- उमंग मिले / Nav varsh- umang mile

नव वर्ष- उमंग मिले सतरंग मिले, इन्द्र धनुष खिले। चहुँ ओर नव उमंग मिले। जाओ जहाँ खुशहाली हो। महके फिजाएँ जैसे बंसत हो।। बरखा संग हरियाली हो। सब ओर महकती होली हो। दुर मावस सा घोर अँधेरा हो। नव निशा जैसे रोज दीवाली हो।। खिली धुप तपन शीत हो, शुष्क, ग्रीष्म, शरद ऋत हो। स्वच्छ निर्मल बहती दरिया हो। शांत नयन मखमल ह्रदय हो।। स्वर गुंजन रस कोयल हो। मधुर मिठास रसना प्रौढ़ हो। शांत चित्त, कोमल लिहाफ हो। महकते उपवन में मधुमास योवन हो।। आभा यश किर्ति बखान गाती हो। सर्व सिध्दि, नव निधि प्राप्ति हो। जाओ जहाँ स्वकेन्द्र जग हो। प्रकाश मान बन समाज को रोशनी हो।। हर दिन खिले, नव माला बुने। सुन्दर लुभायमान जीवन बनों। नववर्ष पर कामना करें। आपका नववर्ष उज्जवल हो।। -कवितारानी।

बीते लम्हे, नव वर्ष आया / Beete lamhe, nav varsh aaya

बीते लम्हे, नव वर्ष आया फिर बीत गया साल देखो, फिर बीत गयी बात देखो, रहा नहीं साथ कुछ, रह गये जो जज्बात देखो। कहते हैं हम साल जीते हैं, अपनों संग दिन रात सीते हैं, काट देते हैं समय के साथ को, वास्तव में हम दिलों के जज्बात जीते हैं।  जा रहा है एक साल दो हजार पच्चीस भी, आ भी रहा है एक साल दो हजार संग छब्बीस भी, देखते हैं ये जाते हुए साल को कैसे भुला पाते हैं, नये साल का एक स्वागत गान आज से गाते हैं। मेरे रुठे, मुझसे ना मिलना तुम, मेरे छुटे लम्हें पुरे होना तुम, सपनों तक को राहें देना, नव वर्ष मांगु तुझसे हर्ष ही देना तुम। चलो आज को अच्छे से अलविदा कह दें, भुल जाये बुरे रहे जो लोग ओर लम्हे, याज रखे सिख जो दे गया है, आगे बढ़े लेकर नये  रास्ते। नव उमंग संग, नव वर्ष नव रंग हो, ईश्वर करे नव वर्ष शांत, संतुष्ट सुकून रहे, करे कृपा ईश्वर सब पर, अपनी नाव सन्मार्ग, उन्माद बहे।। -कवितारानी।

अहसास होता है कई बार / ahsas hota hai kai bar

  अहसास होता है कई बार अहसास होता है कई बार, कि कितनी तपन है सब ओर। कितनी ठण्डी हवाएँ भी टकराई है, वक्त का पहीया ऐसा दौङेगा, अहसास होता है कई बार। पता ही नहीं होता बैठे बिठाये साल खो दिया, कितने खाली लम्हें बैठे यूँ ही सब खो दिया। जैसे रहा ही नहीं कुछ मेरे पास, अहसास होता है कई बार। जाने कब से पत्थर दिल बन बैठा हूँ। सोंचता नहीं किसी के बारे में अब। परवाह नहीं होती खुद की ना दुनिया की। जब से चलने लगा हुँ गिरकर इस बार। अहसास होता है कई बार। अहसास होता है कई बार। कि खो दिया मैंने बचपन अपना। वो महफिलें वो यारियाँ भी खो दी मैंने। खो दी मैंने दुसरों की परवाह वाली आदतें। खो दी एक कोमल ह्रदय की यादें। बचपन की सारी सौगातें। वो टिस, वो जख्म, वो अहसास खोजने का अपना, वो किसी के साथ जीनें, मिलने का अहसास। अहसास होता है कई बार।। मिट्टी का बना था महक उठता था हर त्योहार, वार, करता नहीं एतबार इस बार, रहा क्या आज वार, निकल जाते है दिन, महिने, साल हर बार। -कवितारानी।

ये वक्त भी गुजर जायेगा / ye waqt bhi gujar jayega

ये वक्त भी गुजर जायेगा आयेगा अंधेरा फिर ऊँजाले के बाद, घङी की सुईयाँ फिर होगी लेकर नया सार। आयेगा नये दिन की पहर नये लम्हे लिये। नया साल होगा फिर एक याद। आज की करुँ बात तो आज मिट जायेगा। ना यादें होगी ना अँधेरा ऐसा। मन में बातें होगी जो होगा नया। कहनें को बातें चार है ये वक्त भी गुजर जायेगा होकर सार। गुजर जायेगी हाथ की रेंखाएँ रेत सी फिसलन लिए। सोंचते रह जायेंगे कितना सा था साल। ये वक्त भी गुजर जायेगा होकर सार।। -कवितारानी। 

भारी मन / bhari man

  भारी मन बोझ कई लिये, मन पर बोझ कई लिये। रवि अपनी धुन का चलने वाला, पर अभी है मन पर बोझ कई लिये। खुद को संभाल रहा है अभी, समाज को खो रहा है अभी। परिवार की अपेक्षाओं में उलझा, धर्म की नांव पर तरता। अभी लिये है सपने कई, विचारों को लिये है कई। मन पर है रवि के बोझ कई, मन पर है बोझ कई। मन के दुश्मन मेरे हैं बढ़ गये, कई बेवजह ही बैरी बन गये। अपना माना था जिन्हें भी, वो परायों से ज्यादा दुखी कर गये। कभी रोग में उलझा खुद ही, कभी दोष में उलझा खुद ही। कभी दुनिया की है सोंच मन में ही, अभी मन में बोझ ही।। ये बोझ मन के भारी । मन के भार में जी रहे हैं जी। भारी मन कह रहे यही। मन पर है बोझ कई, मन पर है बोझ कई। किसको अपना कहे, कहे पराया किसे। किसको सपना बताये, छुपाये किससे ही। है उलझन ही, है उलझन ही। और उलझनों का भी है बोझ कई। मन पर है बोझ कई।। -कवितारानी।

कल-कल / kal kal

चित्र
  कल-कल वो पल मैं क्यों याद करुं जो सताये मुझे, रुलाये मुझे। जो पथ पर ना ले जाकर भटका दे मुझे, भुला दे मुझे। आज मेरा है साँसे मेरी है। हर दम प्रयासरत बातें मेरी है। कौन कहता है कल नहीं आता। मैं तो कहता हुँ आज नहीं जाता।। जो गया है कल वापस ना आने को है वापस यहाँ। आया नहीं जो उसकी सोंचुँ क्यों मैं भला। आने वाला आयेगा ही। जाने वाला जायेगा ही। ये वक्त की रफ्तार है। रोक इसे सकेगा कोई नहीं।। फिर वो बातें आने क्यों दे मन में मस्तिष्क में। फिर क्यों करुँ कल-कल की चिंता मैं। ना कल का आज ठीक होगा। ना कल का आज जीना होगा। एक लय से आज जीया तो। कल ना याद होगा ना याद आयेगा।। वो बुरे कल का डर और निकल गया उसका भी गम। आज को ना भ्रमायेगा, जो आज ही जीता जायेगा। आज मेरा है साँसे मेरी है। हरदम प्रयासरत बातें मेरी है। मैं कल-कल मैं कलकल ना गाऊगाँ। कल-कल में आज नहीं गवाऊगाँ।। -कवितारानी।

वैचारिक मतभेद / vecharik matabhed

चित्र
  वैचारिक मतभेद मैं किनारे खङा अकेला सोंच रहा,  सोंच रहा खुद के बारे में और जमाने के बारे में। मैं खुद को अकेला पाता हूँ,  इस भीङ भरे जग में खुद को किनारे पाता हूँ। क्रांति का संदेश साँसो में भर कर,  मन को विचारों से लाद आता हूँ। सिखा ज्ञान बताता हूँ, और जग को जगाता हूँ। मैं उलझा ही जाता हूँ, मैं उलझ जाता हूँ। जो बखान करते ज्ञान विज्ञान का,  जो रोज अलापते अपनेपन की, जो नैतिकता के पुजारी है। जो मानवता प्रकृति के रक्षक हैं. वो सब मेरे विरोधी हो जाते है। वो सब मुझसे रुठ जाते है, वो मुझे निचा दिखाना चाहते हैं। वो मुझे गिराना चाहते हैं। मैं विरोध सहता और रुकता हूँ। सोंचता हूँ, विचार मंथन करता हूँ, कि आखिर क्यों मेरा उन्ही की बातों को अपनाने का विरोध है। फिर मैं पाता हूँ यो वैचारिक मतभेद है। वैचारिक मतभेद ऐसा है कि सुना ना जाता है। अच्छाई को कुचला जाता है, ईर्ष्य़ा से भर कर लङा जाता है। किसी की अच्छाई नहीं भाती है। किसी के व्यक्तित्व से लङाई हो जाती है। किसी को साथ ना सहा जा सकता है, बुरों के बीच कुचला जाता है। वैचारिक मतभेद मन भेद बन जाते हैं। आपसी लङाई का कारण बन जात...

लोग मतलबी सारे / log matalabi sare

  लोग मतलबी सारे स्वार्थ सिध्ध साथी सारे, मत के मद में अपनी गाते। अपनी ही आलाप सुनाना चाहते, कहते साफ अपने को,  पर मैं कहता मतलबी है सारे।। लोग मतलबी है सारे, साथ चाहते मतलब तक का। अपना बतलाते अपने स्वार्थ तक, स्वार्थ पुरा होने पर पुछते नहीं। अपने स्तर की ही कहते यही, वो अपने स्तर का है ही नहीं।। जब काम अपना बढ़ जाता है, मन में भाव अपनों का आता है। वो अपना-अपना रंग बताता है, बहाने सुना दीन हीन कहलाते हैं। जीवन में पङे  एक काम ना आते हैं।। अपने काम की जब बारी आती, सारे रिश्ते याद दिलाते हैं। लोग सारे उपकार गिनाते हैं, कैसे अपने जीवन को गाते हैं। लोग बस मतलब से पास आते हैं।। मतलबी दुनिया मे बाशिंदे यो मतलब तक ही साथ रहते। मतलब तक  ही बात कहते, मतलब तक ही काम करते, ये लोग मतलबी सारे।। अपनी कमियाँ उजागर ना करते, अपनी बातें दबाये रखते हैं। हमारी सारी बातें फैलाते, हमारी दुनिया में गिराते हैं, ये मतलबी लोग सारे।। दुर इनसे रहना है, अपना काम करना है, अपने हिसाब से रहना है, इनसे मतलब ना रखना है, इन मतलबियों से दुर रहना है।। मतलबी बुरा जल्दी मानते हैं, इनकी सुनों ना तो दहाङते ...

खुद में सिमट गया हुँ / KHUD MEIN SIMAT GAYA HUN

चित्र
खुद में सिमट गया हुँ अपने बचपन से निकल, अपनी जवानी में सिमट गया हुँ। आजादी के सपनों से निकल, अपनी वास्तविकता में सिमट गया हुँ। वैसे एक समाज लेकर बढ़ता हुँ मैं, पर लगता है आजकल खुद में सिमट गया हुँ।। वैचारिक क्रांति लिये हुँ, मैं दुनिया बदलने के ख्वाब सिया हुँ। मौका ढुँढता रहता आगे बढ़ने का और रुकावटों में उलझ गया हुँ। लेकर चलना चाहता था सबको साथ में, पर आज लगता है, खुद में सिमट गया हुँ।। क्या चाहता हुँ भुल गया हुँ, क्या मानता हुँ भुल गया हुँ। अपनी सीमायें बनाने लगा हुँ, अपने दिल की सुनने लगा हुँ।  कभी चाहता था सबको खुश करना, पर लगता है अब मैं खुद में सिमट गया हुँ।। बहुत कोशिशें कर ली मैंने, बहुत दुनिया की सुन ली मैनें। खुब भलाई के काम किये, और बदले में बस भुला दिये। मैं इन सबको ही तो याद करता हुँ, अब मैं खुद में सिमटा महसुसु करता हुँ।। जिससे कहो वो सुनाने लगता है, जिसे सुनों दबाने लगता है। अपनी कह दो तो चिढ़ जाते हैं, मस्त अपने मैं तो लोग जलने लगते है। फिर कैसे मन को शांत करता, मैं जानता हुँ इसी सोंच से अब खुद में सिमटा हुँ।। हाँ मन दुखी भी होता है, अपना रहे जग यही मन कहता है। सब द...

सुनी भाग-5 बाल विवाह / suni bhag-5 Bal vivah

  सुनी भाग-5 बाल विवाह आने वाला था परीणाम साल का, उसके पन्द्रह साल के अंजाम का, खुशियाँ आशा बन पलकों पर ठहरी थी, बचपन से सिखी बातें बह रही थी। कैसे-कैसे पढ़-पढ़कर यहां थे पहँचे, दौङ-भाग से गुंथे थे रेशे, अपने बालपन की बातों में बचपन था, किशोरी जीवन दहलीज पर था। शुरु हुआ था नव योवन वो, आभा से उसकी हर योवन खिंचता जो, खिंच रहे थे रसुखदार भी, ले बेङियां अँधकार की। एक आया सौदागर देह खरीदने, सौ टके सोने पर मौल रखने, अभी कच्चा था जो खान में, नजर जमाये था वो सामनें। अपने रिश्तेदारों को भेजा, समझाया बापु को और रोज टोका, हर जगह अब बेटी की सुनते-सुनते, बापु पसीजा मन को समेटे। समाज में सब किशोरियाँ परनी थी, तेरी बेटी कब परनेगी, कब तक तु घर रखेगा, कैसा बाप है क्या कंवारी रखेगा। हर जगह मां भी सुनती, मन मार-मार बेटी को चुनती, आने लगे बुरे ख्याल भी अब, क्या सच है जो जग कहता सब। ख्वाब लेकर सुखी संसार के, हॅसकर बार-बार गले लगाकर, बेईजी बेवजह बना ही डाला, समधन कर घर पर ढेरा डाला। बेटे की बात कम थी, बेटी की परवाह कम थी, एक समाज साथ चलना था, बढ़े होने का मान रखना था। एक दो बार मना किया, आना कानी कर बात...

सुनी भाग-4 विध्यालय में / suni part-4 vidhyalay mein

सुनी  भाग-4 विध्यालय में घुँघुँरु की मधुर धुन से, चहलकदमी के शौर तक, आँगन-आँगन से अब, विध्यालय की ढेळ तक। अपने गाँव की शाला में, जाती है रोज बन बाला ये, अक्षर ज्ञान से तुरंत परिचित, मधुर मुस्कान चिरपरिचित। प्रथम पाठ पुरा हुआ तेज से, द्वितीय में दिखा कुछ वेग से, तृतीय तक थी कुछ आनाकानी, चतुर्थ में नियमित हुई सयानी। पांचवी तक आते-आते, दिखा दिया ज्ञान मन भाते-भाते, सबकी बनी चहेती सी, कुछ औसत कुछ तेज सी। तिसरी-चौथी पंक्ति भाति, कभी कभार अंतिम पंक्ति हो जाती, प्रथम पंक्ति दुर्बर दिखी, शैतानी भी की पढ़ाई भी की। मधुर बातें ही अक्सर सुनी, वो बाला अक्षर की हुई धुनी, सब कुछ रट झट याद करती, सबसे पहले रहने को मरती। रोज तैय्यार होके जाना,  अपने जमें पर रोब दिखाना, दो चोटी में प्यारी गुङिया, मंजरी आँखों वाली वो भुरी गुङिया। कभी माँ कभी पापा आते, कभी भाई, बहिन ले जाते, छोटी थी अनजानी थी सुनी, आवाज देती कहती मेरी नहीं सुनी। अपने मन की रानी थी, जिद जब-जब उसने ठानी थी, चाॅकलेट पैसों से काम ना चलता, पापा की फटकार से मुॅह चिढ़ता। रोज समय पर काम करती, विध्यालय में आदर्श सी बनती, कोई श्रेष्ट जो उसस...

सुनी भाग-3 बाल जीवन / suni part-3 Bal jivan

सुनी भाग-3  बाल जीवन   सुदूर शहर से उपवन किनारे, सरिता जिस गाँव के चरण सँवारे, विध्यारागी चहल आँगन में, जब सुनी चित्कार घङी मंगल में। अनुजा सबकी विशाल कुटुम्ब में, दौङती फिरती आँगन-आँगन में, वो खैल-कुद में अग्रगामी थी, कहा कुछ भी तो, सबने सुनी थी। सुंदर मुख तेज प्रतापी दिखता, चंचल, चपलापन उसपे जचता, लाङ प्यार ने आजादी दी, हर बात उसकी सबने सुनी थी। धुल-मिट्टी से फर्क ना पङता, गुड्डे-गुड्डी से बचपन बढ़ता, गाँव सखाओं मे सबसे प्यारी थी, हर घर में जाती जहाँ उसकी सुनी थी। अपने ज्ञान का परचम लहराती, अपनी धुन में गाती जाती, कोई नहीं पराया लगता, उसे बस हरदम मौज जमता। हुङदंग से दंग करती थी, हमेशा सबसे लङती थी, आँसुओं से लगाव था जैसे, समझती नहीं थी कोई समझाये कैसे। जैसे-जैसे साल गुजरे, शाला में जाती अब पढ़ने, सारा सार अपने मे रखती, पढ़ने में ध्यान रखती। घर आते कुएं पर जाना, कुआँ भरा तो कुएँ में नहाना, नदी चढ़ी तो कलाबाजियाँ की, बचपन में खुब शैतानियाँ की। पेङ पर चढ़कर कुलाम खैली, आम, अमरुद पेङ पर तोङे, चोरी-चुपके शहद भी तोङे, नेता बनी तो अपनी टाली। हमजोली की बना के टोली, गाँव बसा मिट्टी क...

सुनी, भाग-2 मुलाकात / suni, part-2, mulakat

सुनी,  भाग-2 मुलाकात मैं तुफानों को समेट, पुरब से पश्चिम तक होके, देख आया जीवन बयार सारी, अब मध्य में पहाङों की बारी। प्रथम दृष्टा मनोहर थी, आभा उसकी नव योवन सी, श्वेत वर्ण कंचन थी, अनंत जीवन वो सुनी थी। शर्माई कुछ-कुछ घबराई, पास आकर बात बढ़ाई, मुलाकात में कुछ खास ना था, पर जीवन का यह मोङ था। मुङ जाती अपनी धुन में, स्वार्थ था अपने गुन में, कर्तव्य पथ पर अटल दिखी, ज्ञानी सी थी पर नव सीखी। हर बात पर अपनी दात लेती, खुलकर हॅसती मन हर लेती, रहती ना उसकी कहीं कोई बात अनसुनी, वो पहली मुलाकात में लगी सुनी। एक शब्द में उसका अंत नहीं, बातों में उसके सार कहीं, हार नहीं मानती थी, खुद को हमेशा संवारती थी। अंजन नित नयन करके, आइने को रंग करके, आइने को आते निहारती थी, बार-बार खुद को संवारती थी। कल का मैल आज ना भाता, जो भी पहने खुब सुहाता, आता ना था वस्त्र विधान भारी, पर अपनी मनमर्जी में कभी ना हारी। केश सज्जा की निपुण नारी, साङी पहन थी सबकी प्यारी, शाला उत्सव की वो गाथा, उसके बिना प्रांगण सुना कहलाता। हर चीज पर अपनी राय रखती, अच्छी सिख को ही तकती,  तकते सब नयन भर-भर कर, रोकती नहीं सिर चढ़ कर।...