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तु जाने ना / Tu jane na

  तु जाने ना तु जाने ना... तु जाने ना... के गम कितने सहे हैं मैंने... सहे हैं गम मैंने. तु जाने ना... जाने ना. कि कितना तङपा हूँ मैं. कि फिर.. फिर तुझे याद किया. और फिर से भुला दिया। तु जाने ना... जाने ना. जाने ना तु। कि मैं हूँ... अभी वहाँ.. जहाँ है ख्वाबों का आसरा। तु जाने ना... बतला भी दे, मुझे... कि है कहाँ तेरा आसरा... तेरा आसरा. मैं.. डुँ डुँ तुझे, हर जगह हर पता. तु जाने जाँ... जाने ना. कितने पलको आँसुओं सहा मैंने. आ पास आ... मैं सुना दुँ तुम्हें. दर्द जो सहे मैंने... कितना... हो कितना अकेला हूँ मैं बिन तेरे. बिन तेरे.. तु जाने जाँ... जाने ना. सपनों में अक्सर डुँ-डुँ तुझे. यादों के घर में रखुँ... तुझे.. जाने जाँ. तु बतला भी दे कैसे पास रखुँ मैं तुझे. तु जान भी ले... के मैं हुँ अकेला तन्हां बिन तेरे... ओ. जाने जाँ.. तु जाने जाँ... जाने ना.. मिलेंगे जब होगा नया ये जहाँ होगा नया. ये सारा आसमाँ, होगी नयी दुनिया अपनी होगी नयी हर. सुबह आ.. ओ जाने जां. तब दिल कहे जब मिले गले तो मिलेगा समां, ओ जाने जाँ।। -कवितारानी।

अभी भी / Abhi bhi

 अभी भी काॅलेज के दिन गजब सताते है। अभी भी मुझे बैचेन कर जाते हैं। अभी भी याद है वो इंतजार भरी सुबह। अभी भी वो दोपहर याद है, जब लंच साथ होता था। याद है कि कैसे हम मस्ती करते थे। कैसे सब की प्रेम लीला को मोज का मार्ग बनाते थे। कैसे खुद की केमिस्ट्री की हिस्ट्री मुझे। याद है उन नैनों का जादू, जादू उनकी अदाओं का। अभी भी रहती है कशिश की क्यों मिली ना वो मुझे । क्यों कुछ बयां में कर ना पाया वो। अभी भी मुझे दोस्तों का छेङना चिढाना याद है। याद है मुझे उसका हर बहाना और दोस्तों का इशारा। दोस्तों का मदद मांगना मुझसे और बङी सी बहस। फिर सबका साथ रहना और मोज मस्ती करना। अभी भी बस का सफर याद करता हूँ, पर भीङ भाङ से डरता हूँ। अभी भी सबको याद करता हूँ। हाँ अभी भी में वो पल जीता हूँ।। -कवितारानी।

सब स्वार्थी है / sab swarthi hai

  सब स्वार्थी है सपने सजाये चल रहा था अपनी राह पर। साथ चाहता था अपने परिवार संग दोस्तों का, पर सबको यहाँ अपनी पङी है। जहाँ मतलब की झङी है, वहीं लाईन खङी है। मैंने भी उनको काँटा ना माना भावनाओं को बहा कर, चलता रहा मंजिल की ओर राह पर। कभी बेरी समाज ने डराया, कभी शराब का रहा साया। गद्दारी ने दिल तोङा तो कभी अपनों की जिद ने मरोङा। जहाँ तपती धुप सी पथरीली राह मिली। वही मिठी छुरी लिए कई कुवाँरी निगाहें खङी। जिस समय में ओर मेरी पढाई थी उसी समय ये निगाहें मुझे। डंसने आयी थी में भी पागल गीर पङा था मोह माया में। पर मंजिल की तस्वीर रोक रही थी वहाँ जाने से। जाल उन नैनों का ऐसा था सोंच ना सका और कह भी ना सका। बयां करुं किसे दर्द ऐसा जग उठा था। देखे बिन एक पल चैन नहीं मिलता। एक पल की नजर सालों सी छाप लगे। पर पाने को वो मंजिल दुर लगे, लगी कसक ऐसी की, ख्न्वाब अधुरे से लगे, ना हाल बयां किया ना मर्ज ठीक किया। अभी भी नैना के नैन बैचेन कर उठे।। -कवितारानी।

मेरी नारी / meri naari

मेरी नारी गुणवान हो वो हो शिक्षित नारी, काम काज जाने सब, जाने दुनिया दारी। बङा छोटा सबका करे समान सम्मान देख पद दे उनको मान, समझदारी भरी हो अंग भंग में उसके, भले बुरे का करे खयाल, हो लज्जाशील, वीर कोमल वो नारी। दे मुझे माँ का दुलार, बहिन सा रखे खयाल, करे बङो सा सम्मान, दे पत्नी का प्यार। रिती परम्परा का रहे ज्ञान, व्रत उपवास कर करे घर परिवार मंगल काम। उसके प्रभाव से सबका हो उद्दार, मृगनयनी हो वो हो कोमलांगी वो शिक्षाशास्त्री हो वो।  लज्जाशील ग्रहणी, मानमर्यादा जाने वो जाने सबकाम काज, दुख सुख की साथी हो, हो व मदमस्त दोस्त मेरी। आदर्श  भारतीय पतिव्रता पत्नी हो वो मेरी नारी। कर सकुं बखान उसका ले जाऊँ हर जगह उसे। जो समझे मुझे और मैं समझ उसे, आदर करे सत्कार करे वो। मुझे ये सब गुण ले बने वो मेरी आदर्श नारी। कर्ता रहूँ बखान ये कि मिले मुझे ऐसी घर वाली।। -कवितारानी।

प्रेमिका के नाम / premika ke naam

  प्रेमिका के नाम एक पन्ना प्रेमिका के नाम करता हूँ। कैसी होगी वो, कैसी मैं चाहूँ उसे यह बयां करता हूँ। अपने मन के भेद आज स्याही कलम करता हूँ। तारिफ में उसकी इतनी करुँ कि खुबसुरती उसकी नयनों से हो। बनावट उसकी संगेमरमर सी हो, खुदा भी देख श्रृंगार उसका रुक ना सके कहे क्या खुब हो। होंठ उसके गुलाब की पंखुङियों से भी नाजुक हो। लाली उसके गालों की आँखों में चमक बङाती हो। गोरा बदन उसका चमके धुप सा छाया में भी। कैश काले घनघोर अमावस्या की रात हो। बिंदिया माथे पर साँझ का सुरज हो। चेहरा उसका हुस्न मल्लिका परियों सा हो। देख जिसे नजर हटी ना पाये। देख उसके उरोंजों को नारी भी सरमाये। मदमस्त बदन उसका सबको ललचाये। नासिका उसकी अपसरा को भी लजाये। नथ उसपे चार चाँद और बढ़ाये। देख चेहरा उसका रोक ना कोई मन को पाए। ऐसी नवयुवती मेरे मन की प्रेमिका बन जाए। बखान करते खुबसुरती का उसके कलम मेरी रुक ना पाये। गुणों की चर्चा में आगे बढ़ जाए।। -कवितारानी।

जब दोस्त सच्चा होता है / jab dost sachha hota hai

जब दोस्त सच्चा होता है   दोस्ती बङी प्यारी होती है, जब दोस्त सच्चा होता है। दिल का बच्चा हो, समझ में अच्छा हो, बात में पक्का हो, तब दोस्त की दोस्ती का भी मजा आता है। उसके रुठने और अपने मनाने का भी मजा आता है। मजा आता है जब थोङी रुसवाई छाए, जब मोज मस्ती में दिन बीत जाए, बीते पल रात में सपने बन जाए। ऐसी दोस्ती मे जान लुटाने को जी चाहता है, जी चाहता है चले ये दोस्ती जन्मों जनम। फिर वही बात दोहराने को जी चाहता है, दोस्ती बङी प्यारी चीज है। जब दोस्त नाजुक सा मस्त मोला नमकीन सा हो तो। हर पकवान फिका नजर आता है। ये जहाँ झुँठा नजर आता है। नजर होती दोस्ती की अठखेलियों में इसमें समाज कहाँ नजर आता है। आज ऐसी दोस्ती पाने को जी चाहता है। जी चाहता है ऐसी दोस्ती सलामत रहे जन्मोंजनम, हर जनम ऐसे यार को पाने को जी चाहता है। फिर यही बात मन दोहराता है। कि दोस्ती बङी प्यारी चीज है।। -कवितारानी।

आज कुछ लिखने को जी चाहता है / aaj kuchh likhne ko jee chahta hai

  आज कुछ लिखने को जी चाहता है आज कुछ लिखने को जी चाहता है, दिल के अरमानों को पन्नों पर उतारने को जी चाहता है। आज इन बदलते हालातों में रोने को जी चाहता है, जो मिल ना सका दिल को वो बताने को जी चाहता है। आज हर कसक बताने को जी मचलना चाहता है, टुटते सपनों को स्याही से छापने को जी चाहता है। आज समाज के हर बंधंन को तोङने को जी चाहता है, जीया कहता है मुझसे कि ना डर इस समाज से। जी मुझे बेचैन करना चाहता है, धङकने अब दौङने लगी है। पल सारे भाग रहे हैं और समाज तेजी से बदल रहा है, ऐसे में घर पर रहकर खयालों मे जीने को जी चाहता है। जब दगा दे दोस्त और विश्वास टुट जाए आइने सा, ऐसे में हर दासतां को लिखना जी चाहता है। आज कङी मेहनत कर बुलंदी पाने को जी चाहता है, और बताना चाहता है इन बङबोलों को गद्दारी की सजा। आज फिर किसी गहरी आँखों में खोने को जी चाहता है, अपना एक सुन्दर आँसिया बनाने को जी चाहता है। जहाँ नहीं थे फासले दिलों के, ना था मैल किसी के, आज अकेले जीने को जी चाहता है।। -कवितारानी।

बचपन के दिन / bachapan ke din

बचपन के दिन अजब अनौखी बातें थी, अजब-गजब थे किस्से। मिल बांटकर करते थे हम जब हिस्से। अजब हमारी दुनिया थी, अजब हमारे कारनामें। याद आते हैं मुझे बचपन के वो दिन प्यारे। गजब की दोस्ती थी, गजब था प्यार। लङाई झगङे से बङता था हमारा प्यार। मस्ती भरे दिन थे वो शैतानी भरी रात। आज भी मिलकर करते हम वो पुरानी बात। दिन भर खैलना, स्कूल से भागना, कैरी चोरी करना, सहद का मजा। आज भी वो याद है पकङे जाने पर एक अनौखा बहाना। अजब-गजब नये कारनामें करते, अजब-गजब किस्से रचते। हर गली में एक दोस्त होता हर दिन कुछ नया होता। अजब हर बरसात थी अजब थी गर्मी। रोज कुएँ पर नहाना और गर्मी में मौज मस्ती। बचपन हमेशा खास, बचपन अब भी याद है। याद है सिसकियाँ मुझे याद है डरावनी रात। याद है हर पल जो था मेरे अपनों के साथ। भुलना चाहूँ उन्हें तभी तो करुँ नये काम।  आज मुझे याद है मेरे तोते का साथ। आज भी मुझे याद आते है बचपन के वो दिन।। -कवितारानी।

कविता कहनी है / kavita kahani hai

कविता कहनी है एक कविता लिखनी है मेरी खास सहेली के लिए। यह बात बतानी है मेरी खास सहेली के लिए। हाँ, ये सच है झुठ नहीं पर अब हम दोनों के बीच कुछ नहीं। फिर भी ये बात लिखनी है मेरी खास सहेली के लिए। बात ये खास है पुराने लम्हों के साथ है। छोटे थे जब बचपन ये तो दोस्त थे अनजाने से। आँखे उसकी कमल नयन, मृगनयनी सी। मुस्कान ये उसके सारी दुनिया लुट जाए। और बातें ये अलग है दोस्त हम अलग है। जब अकेले में करते बात तो मन के भेद खोलते थे। कुछ भी छिपा ना था हममें। पर नजरिया समाज का अलग है। डर है मुझे भी डर है उसे भी। कौन आज सच्चाई पहचाने है। कब किस बात पर रुठ जाए कोई ये बताए है। सब कुछ अलग है,  सब कुछ मिट गया है। गलती ना उसकी है, गलती ना मेरी है। संस्कार और समाज के झुठे भेद ने तोङ दिया प्यारा बंधंन ये। ये उससे दुर हुँ वो मुझसे दुर है। बात ये अनौखी है बात ये समाज की है जो समझता नहीं भावनायें। जो चलाता सिर्फ अपनी हर नजदीकियों के ये अर्थ निकालता है। हर बात का बतंगङ बनाता है ये कविता है मेरे साथ की। एक कविता है ये मेरे अपनी सहेली के साथ की।। -कवितारानी।

नया सवेरा / naya savera

नया सवेरा सुबह तो रोज होती है पर आज कुछ अलग है, अलग है सोंच आज की अलग है विचार आज के। अलग फिर नजरिया है, अलग फिर मौसम है, कल जो खास थे आज हम उनसे नाराज है। कल जिन्हें देख कर सुबह सुहानी मानते थे, आज देखने को कभी उनको जी नहीं करता। कल जिनके हम नगमें, किस्से गुनगुनाया करते थे, आज उनके विचारों, ख्वाबों से भी परहेज करते है। कल जिनसे मन की बात खुलकर करते थे, आज उन्हीं की शक्ल तक देखना नहीं चाहते थे। तभी तो मन बैचेन है भ्रमित कर रहा तन ये, उलझन में समझाये खुद को ये। कह रहा है ये की आज की सुबह नई है, हालात नये है, नयी है रोशनी, नयी है वादियाँ। नये ख्वाब है, उमंग भी ताजा है, ताजा है सपने, फिर क्यों तुम्हें मनाऊँ जब गलती मेरी नहीं है। फिर क्यों ना जीऊँ इस नयी रोशनी में, जो मुझे चमकाने आई है, चाहुँ भुलना भुत को में। क्योंकि आज सुबह सुहानी है।। -कवितारानी।

जब मंजिल दुर हो / jab manjil dur ho

 जब मंजिल दुर हो जब मंजिल दुर हो तो रास्ते धुंधले नजर आते हैं। जब तैय्यारियाँ अधुरी हो तो काम अधुरा नजर आता है। जब अपने साथ ना हो तो भीङ में भी अकेले नजर आते हैं। जब अपने दगा दे तो जहान अधुरा नजर आता है। पाने को मंजिल निकल जाते है हौंसले में दम है, पर बिना अपनों के हौंसले कहाँ जुटा पाते है। निकल पङते हैं राह पर अकेले भी अगर मन में कोई शंका ना हो, पर बिना अपनों के मंजिल पाने में मजा कहां आता है। फिर पाने को शिखर सपना मन अपना उतावला है। तोङ बंधंन छोङ अपने पाने को सपने दिल बेकरार है। छोङ दे साथ चाहे जहाँ सारा फिर भी आगे बढ़ते जाना है। नीले आसमान में फिर से लहराना है। उङ जाना है उस जहान में जहाँ शिखरी लोग रहते हैं। मिल जाना है उस भीङ में जहाँ पराये परिंदे रहते हैं। दिखाना है इस जहाँ को कि अब भी है मुझ में क्रांति। पाना है उस जहान को जहाँ ना हो कोई भ्रांति। देखेगा ये जहान ओर गुणगान करेगा मेरा, ऐसा सुनहरा सपना है मन ये मेरा। चाहे मुश्किले बङे बङ जाए ये रास्ते चलते जाना है मुझे, अब रुकना नहीं किसी के वास्ते। -कवितारानी।

बातें मन की / batein man ki

बातें मन की अब तक जिसे सच्चा हितैशी मान रहे थे, मान रहे थे दिल के करीब जिसे, अब तक जिसपर विश्वास करते थे, करते थे बंद आँख भरोसा जिस पर, अब तक देख जिसे खुश होते थे। होते हमेशा दिल के करीब जिसके, कैसे दोखा जिया उसने विश्वास नहीं होता। कैसे पल में पराया किया विश्वास नहीं आता। कैसे देखने को जी नहीं करता, पता नहीं। पता नहीं के दुरियाँ इतनी हुई कैसे विश्वास नहीं आता। अब तक जीये हँसीन लम्हें जिनके साथ। आँखों से बातों से किये बनाये रिश्ते हजार। हजारों यादें बनाने के बाद विश्वास तोङ दिया क्यों। आखिर क्यों पराया बना दिया खुशियों के लम्हों में। विश्वास नहीं आता कि कोई इतना करीबी भी बिन मतलब दुर हो जाता है। विश्वास नहीं होता कि कोई वादा करके भी भुल जाता है। दगा देता तो रीत बव गई पर, रीत में दगा कुछ समझ नहीं आता। इस क्षण से जो दगा लगा वो छुङाये छुट नहीं पाता। विश्वास होता है क्या अब यह भी समझ नहीं आता।। -कवितारानी।

रीत / reet

  रीत हर रीत रिश्ते बताती है, हर रीत हकीकत दर्शाती है। मैलजोल बढ़ाती है, दोस्त बनाती है। हर रीत रास्ते दर्शाती है। शादियाँ भी होती है रीत अनौखी। सच्चाई को ये दर्शाती है, सही रिश्तों की पहचान कराती है। जो काम में काम आये वो ही सच्चा हीतैशी है। जो रीत में प्रित रखे वही सच्चा करीबी है। अब तब दुसरों की शादियों में घुमें थे, अब घर की ये धुपें हैं। अब पता चला की सच्चा दोस्त बिन कहे आगे होता है। अब पता चला नजदीकी भी दिखावी होता है। यह रीत बङी मुश्किल है। अब पता चला की सब को खुश रखना बङा कठिन है। इसी में पता चलता है कि कौन आगे काम आयेगा। इसी में पोंगे पण्डित का पता चलता है। पर उलझन अब भी जारी है कि क्या करें गद्दारों का। चलता रहता समय का चक्र कब तक नाराज रहेगें। कब तक पुरानी यादों को भुलाने की कोशिश में जीते जायेंगे। यह रीत बङी कठिन है पर सच्चाई की तस्वीर होती है। हर रीत कुछ बयाँ करती है। हर रीत सच्चाई बयाँ करती है।। -कवितारानी।

गुजरे लम्हें / gujare lamhe

  गुजरे लम्हें हजारों लम्हों को एक पल में भुला दिया। सालों की यादों को एक पल में मिटा दिया। बित गये जाने कितने दिन पता नहीं चला। याद रहे लम्हें वो जो मदहोश करने वाले थे। याद रहे वो पल जो तीर की तरह घाव करने वाले थे। नये फसाने बन गये पल भर में कई। तो कई नयी यादें बन पङी। बरसों के किस्से जरा से लम्हें में पुराने हो गये। विश्वास का हुआ कत्ल कही, तो कहीं नया रिश्ता बना। यादों के नये तराने बने कहीं तो कहीं भावनायें नई जुङी। फिर भी याद आता है वो लम्हा जो हसीन था। याद है वो पल जो कुछ खास था। सोंचते थे बचपन से जिस रिश्तें के बारे में। दुर उससे जाने को जी चाहता है। भविष्य की डगर ये सब कुछ मुश्किल नजर आता है। आती है अजब भावनाये जो बहकाती है महसुस कराती है। आती है अजब भावनायें जो बहकाती है महसुस कराती है। की अकेले है हम कुछ नहीं साथ। की डराती है ये के कुछ नहीं तेरे पास। की कहती है की क्या भविष्य होगा क्या भुत था। यह उलझाती है कि तेरा कोई अस्तित्व नहीं। तु बदनसीब है यही सच है।। -कवितारानी।

ख्वाब बहते / khvab bahate

ख्वाब बहते उमङ-घुमङ जब ख्वाब बहते, पहर-पहल कर जब दिन ढलते, लहर-ठहर जब सपने उठते, उलङ-उलङ कर जब दिन मिलते, तब होती हर शाम सुहानी, दिन मस्ताना रात दिवानी। सुबह के फेरे दिल को घेरे, मन में होते दिवानों के ढेरे, चलते रहते नयन नसुरी, मन को नहीं तब जरा सबुरी। मचल-मचल कर दिल हिलोरे लेता, तङप-तङप कर साँस निकलती, करवट-करवट नींद उङती, सरपट-सरपट दिन ढलता, बरस-अरस सी रात लगती। जब होता किसी की नजरों का इंतजार, जब होता बिन समझे किसी से हाल बेहाल, जब उङ जाती रातों की नींद और मन जाती मन की भुख, जब देखने को रहता किसी को दिल बेकरार, ऐसे में ही कहते है कि हो जाता है प्यार। साजन के साथ सपने होते, अपने भी तब पराये होते, होता अकेले रहने का मन, दिन रेन ख्वाबों के पल होते, दोस्त भी तब अनजान होते, साजन के साथ हम मस्त होते। होते ख्वाब अनौखे, अनौखी होती सपनों कि दुनिया। दिल ही संसार होता और प्रिय ही रब होता, होता है उसी पर ऐतबार, होता सिर्फ उसी से प्यार, जब नयनृ-नयन करते बात, जब दिल-दिल करते मैल मिलाप। जब मिलने को तङप सी उठे जब कहीं भी जी ना लगे। जब अपने अनजाने लगे, तब होता है हाल,  तब हो जाता है प्यार।। -कव...

चलता रहा मैं / chalta rha main

  चलता रहा मैं रफ्तार से चलते वक्त में बचा रहा अपना वजूद मैं, दोङते रिश्तों को संभाल रहा मैं, मिलते बिछङते बनते-बिगङते रिश्तों में खुद को संभाल रहा मैं। मन टुटता जब दोस्ती दगा देती, तब आँसुओं से भीगता मैं, चाह करता, राह तकता की कोई तो मना ले मुझे, हारता टुटता, रोता, गिरता फिर भी चलता मैं। रुकने को जी नहीं करता ना भागने को, ना हॅसने को चाहता, ना किसी को मिलने को, जब चाह होती रुसवा और दिल देता दगा तो अकेला रहता मैं। अपने होते खफा और दोस्त देते दगा फिर भी हॅसता मैं, मुश्किलों भरी दुनिया में दर्द भरे कांटे निकालता मैं, फिर पाने को मंजिल चल पङता उसी राह पर मैं। आसान नहीं जिंदगी का सफर पता हुआ है अब, जिसको समझे अपना खास होता वो जरुरत में ओर के पास होता, दिखती है दोस्ती बस बिकते हैं ख्वाब यहाँ, बिना दिखावे के लगता नहीं यहाँ कोई पास। मैल खाता नहीं सब का दिल अपने दिल से, तभी तो अकेले रहते हैं हम मुश्किल में, पुछता है क्यों होती सामाजिक, पारिवारिक बैंङियाँ जब, चाहुँ उङना अकेला आकाश में मैं, यही मैं मेरा है, मैं मैं का इसिलिए मन कहता कि, हर मैं है अपने आप में अकेला।। -कवितारानी।

सुनी भाग-7 महाविध्यालय/ suni part-7 college life

  सुनी भाग-7 महाविध्यालय थी जिद की आगे बढ़ना, बस इसी मुद्दे पर नहीं लङना, किस्मत का कुछ साथ रहा, जीवन महाविध्यालय में आगे बढ़ा। अब साझँ छोङ भौर को पाई, गाँव से निकल वो मुस्कुराई, शहरी जीवन के साथ बढ़ी, मन लगाकर खुब पङी। साथ अब परिवार था, पापा का कुछ खयाल था, संभाल के अपने योवन को, काॅलेज जाती वो पढ़ने को। विज्ञान संकाय से अध्ययनरत्, अपनी मस्ती में रहती मस्त, सहेलियों के साथ घुमना-फिरना, सादा जीवन उच्च विचार रखना। अपने बनाये नियमों पर चलती, किराये के मकान मे रहा करती, गाँव के वो मालिक पढे़ लिखे, बेटी सी रखते घुले-मिले। खर्चे को मिलते सीमित पैसे, कम खर्च में भी मिलते चर्चे, कक्षा में सबसे आगे होती, जवाब देना प्रश्न करना आगे रहती। कभी-कभार सुनेपन में, याद करती बचपन योवन में, फिर याद बाल विवाह की आती, रोकर शाँत होकर पढ़ने लग जाती। खुद बनाना अपना खाना, रोज अकेले काॅलेज जाना, लङकों से भी दोस्ती निभाना, लङकियों में धोंक जमाना। मस्त मगन सी खुब हॅसती, भुल बचपन खुब पढ़ती, शिकायतें ना थी कुछ भी, पास हुई प्रथम वर्ष भी। छुट्टियों में गाँव जाना, लङके वालों के रोज बहाना, सोंचती रहती कब काॅलेज जाऊ...

notion press par book 'santvna'

समर्पण- यह पुस्तक एक कविता संग्रह के रुप में हैं जिसे मेरे और मेरे पति रविकांतचीता जी के द्वारा तैय्यार किया गया है। इसमें कविताओं को चुन कर मन को सांत्वना देने वाले भाव के रुप में संग्रहित करने का काम किया गया है। ये कविताएँ आपको निश्चित ही शाँति देने का कार्य करेगी। प्रस्तावना- मन हो या तन हो सांत्वना सब की एक जरुरत है, बिना सांत्वना के शांति मिलना मुश्किल है और बिना शांति के सुकुन मिलना नामुनकिन है। हमारी इस पुस्तक में हमनें मन की सांत्वना के लिए ही कार्य किया है। यहां केवल उन्हीं कविताओं को शामिल किया गया है जो सांत्वना दे। मेरे जीवन साथी की प्रेरणा और सहयोग के बिना मेरे जीवन में भी कोई सांत्वना नहीं है। आशा करते है आपको हमारी ये कविताएँ पसंद आयेगी। भुमिका- कविताएँ मन के मार्ग से होकर जाती है यही कारण है कि कविताएँ दिल को छुती है। हमारी कविताओं में ग्रामीण परिपेक्ष के साथ, साफ मन की अनूभुति पाठकों को आनंदित करेगी। ये कविताएँ जीवन के सत्य को भी उजागर करती है। ये हमें हमारे गहरे दुख से मिलाने के साथ ही हमें उस गम को महसुस करने पर मजबुर कर देती है। जैसे ही आप इन्हें पढ़ेंगे आपको ये आप...

अकेले में पल मेरे / Akele mein pal mere

अकेले में पल मेरे करके आँख मिचौली, करके हेरा-फेरी। करके घुम-धङाका, करके मौज मस्ती। झुम-झुम के घुम-घुम के, रो धोकर हँसकर गुजारे जो पल वो थे बचपन के पल। हर्श उल्लास से, यादों के साथ से, दिल के पास से। आये दिन मेरे पास गुजरते है वो पल। होती है बैचेनी थोङी होता है गम थोङा, होती अजब गुदगुदी। होता अलग अहसास, झुमता है मन, घुमता है मन, रहता बैचेन अजब जब याद होते वो पल। क्या दिन थे वो क्या थे पल। क्या गजब घङी थी, क्या गजब था अहसास जब था मेरे दोस्त का साथ। होती थी लङाई हमेशा, रुठना रहता हमेशा, मना लेते थे फिर से, घुमने जाते फिर से, वो लुका-झुपी खेलना वो सहद तोङना। वो निकल पङना अकेले घुमने, निकल पङते साथ सभी। चिढ़ना-चिढ़ाना चलता रहता खाना-पिना चलता रहता। क्या मजा था आता जब होते दोस्त मेरे संग। स्कुल में जाते हल्ला होता टिचर से भी झल्ला होता। भाग जाते आधी में जब नहाने और कुएँ वाले से झगङा होता। घर जाने पर डाट पङती पर फिर से वही राह होती। याद आते हैं अभी भी वो पल जब बचपन था संग हमारे। अब दोस्त है जवान है हम भी जवान अब सब अकेला हूँ मैं। और है साथ मेरे अकेलापन।। -कवितारानी।

जय राम जी / jay shree ram

जय राम जी सुनने को जो बात, बैचेन था मन का पात। समझने को जो घङी, ना चैन था कोई घङी। आई है वो खुशियों की शौगात, लेकर खुशियों भरे हालात। शुक्रिया करुँ अदा उस रब का दी जिसने ये शौगात। अब हटेंगे दुख के फेरे, खुशियाँ होगी ढेरे-ढेरे। मन भी मस्त, तन भी मस्त, सुन के ये बात। हाँ हो गई पक्की शादी की बात। कोई लक्ष्मी होगी घर में अब, खुशियाँ होगी अब सब। अब मनेगी होली दीवाली हर्ष और उल्लास से। अब गुँजेंगे भगवान को अब, होगी खुशहाली सब ओर। अब मिलेगी मुझे राहत घर के काम से अब होगा आराम मुझे। क्योंकि आ रही भाभी बनकर गृहलक्ष्मी जल्दी देने को आगाज। बङी मन्नतों के बाद आई है ये घङी उत्सव है छाया, छायी खुशी। तहे दिल से दुँ दुआ, सत् सत् करुँ नमन भगवान। जय हो मेरे राम, जय श्री राम।। -कवितारानी।

दर्द की राहें / dard ki raahe

दर्द की राहें अब तक दर्द दिए थे कईयों ने, अब ये पैदा हुआ है। जब देखा दर्द अपने का तो रोने को मन हुआ है। पाऊँगा मंजिल में सपनों की अपने पर। अपनों की दर्द की सिढ़ी पर नहीं। दर्द को सहते हुए पाना है मंजिल, चुनौती है ये। चुनौती है ये मेरी मंजिल की राह की। परीक्षा का है ये समय में इसमें भी पास होऊँगा। बिछा दो कांटे लाख में इन्हें भी पार कर जाऊँगा। ना रुकुगाँ ना झुकुँगा, ना हटुगाँ, आगे बढुँगा। कर दो और कठिन राह, लगा दो रास्तो में आग। पर हर आग को अपने आसुँओ से बुझाऊँगा। इन दुख-दर्द और मिलन हीन राहों को पार कर जाऊँगा। है जब जब तक हौंसला लङुँगा हालातों से। जब तक है साँस चलुँगा लेकर आस। रोक ना पाँएगी सिसकिया मेरी मुझी को ना। रोक पाँएगी कंठिली राहे आप की जब रुक गयी ये। तो जान मेरी जाएगी, बस अब मंजिल दूर नहीं। आस है अभी भी यही।। -कवितारानी।

मतलब की यारी / matalab ki yaari

मतलब की यारी दोस्ती होती बङी अजीब है, मतलब की ये चीज है। बिना मतलब पुछेगा नहीं कोई तुम्हें, यही इसकी तस्वीर है। कहने को होती है वफा और कहने को होते वादे सारे। दिखावे पर बनते है दोस्त भावनाओं से रहते दूर सारे। दुख में साथ नहीं होता कोई और सुख में भीङ पङी है भारी। ये दोस्ती दिखावे की चीज साली। हर दिन कोई दिल तोङ देता है, प्रिय दोस्त भी साथ छोङ देता है। जब जरुरत होती उसकी सबसे ज्यादा तो अपनी पङती है सबको। दगा देगा इसकी फितरत में होता है और आए दिन दिल टुटता है। कभी-कभी तो सच्चाई का साथ भी नहीं देते सच्चे दोस्त। फिर किस बात की ये दोस्ती यारी। ये दोस्ती मतलब की चीज है साली। दो लङके हो तो कम दर्द होता है पर लङके लङकी में अधिक होती है। यारी, जब पता चलता है दगा का तो लुट जाती है दुनिया सारी। फिर लुट जाता है चैन, करार और भुख, प्यार भी मिट जाती सारी। ऊपर से दुसरा दोस्त सहलाने के बजाए उङाता है खिल्ली हमारी। पर जब उस पर आती है ये बीमारी तब समझता है ये खिलाङी, दोस्ती मतलब की चीज है साली। माना हर जगह काम आते दोस्त, पर हम से भी वो काम लेते है दोस्त। बिना दिखावे कोई पास नहीं आता गिरगिट-गिरगिट को ही है ...

हे प्रभु / hey prabhu

हे प्रभु। है प्रभु, सहते-सहते कहीं गम में मन ना जाऊँ कहीं। दूर होकर तुझसे नास्तिक ना बन जाऊँ कहीं। देखे हैं जो ख्वाब उन्हें इन मस्त राहों में भुला ना पाऊँ कहीं। जो सजाएँ हैं अरमान भुल ना जाऊँ कहीं। हो प्रभु, मुझे वर दो। मुझे शक्ति दो इतनी की डटकर सामना करूँ हर कहीं। कठिन हो राह कितनी ही, चाहे हो राह कंटिली कितनी ही। रुकुं ना झुकु ना, पालुं दृढ़ होकर मंजिल यहीं। खोकर आपा में रुक ना जाऊं कहीं। हे प्रभु, निवेदन है आपसे की कृपा रखना। झुके मेरा सिर तो हाथ आपका रखना। भुले से हो गलती ते भले सजा देना आप। देखे हैं रखी जिंदगी मैंने जो दिखाई आपने। सहते-सहते गमों को, मैंने बिताया लम्हों को। कोशा है कई बार मैंने आपको पर आया भी आपके द्वार। इतनी सी है विनती अबके लेना आप संभाल। मेहनत करुँगा पुरी जी जान लगाकर। बस साथ आप रहना मेरे हर दम। करुँ पुजा-अर्चना हमेशा आपकी। दिखाये जो ख्वाब अपनों को पुरा करुँ उनकों। काबिल इतना मुझे बना देना, विनती है फिर से नादान की। है प्रभु, इस बार ओर सम्भाल लेना मेरी आप।। -कवितारानी।

मन में खलबली / man mein khalbali

मन में खलबली आसमान साफ है और राहें खुली-खुली। हर पता बयां कर रहा है मेरी खली-बली। मंजिल अब ज्यादा दुर नहीं, है यहीं-कहीं। जीने को अपने जहांन में बैचेन है मेरे मन की कली। दुख दर्द भी साथ है, साथ है रह कांटे राह के। वक्त भी प्रतिकुल है, प्रतिकुल है राहें। भटका रहा मुझे वो उन्नति का शिखर गली-गली। हारने का विचार मचा रहा है तन में खली-बली।। लेकर हार खङी है मंजिल यहीं-कहीं। देखने को मेरी आँखें मचा रही हल-बली। देखे हैं जो ख्वाब अब पुरे होंगे। पुरी होगी मन की देखी हर सुहानी कली।। अरमान रहते बैचेन सोंचकर कहीं छुट ना जाए राह मेरी। पथ भ्रष्ट होकर खो ना दुँ मंजिल कहीं। टुट जाऊँ अगर हो ऐसा। मर ही जाऊँ ना मिले अगर मंजिल कहीं। मचा दुँ सोंच अपने मन में यह खलबली।। -कवितारानी।

मैं शराबी हूँ / main sharabi hun

मैं शराबी हूँ आज मैं शराबी हूँ,  क्योंकि मैं खुद से दुखी हूँ। पी थी कभी मौज में,  पी थी कभी मयखाने में। पी थी मैंने कभी अपने छोटे-मोटे गम भुलाने में। आज पी है मन बहलाने में, तभी तो मैं शराबी हूँ। आज मैं शराबी हूँ। पहले कभी यह मेरा शौर्य दिखाती थी। कभी मुझे गम से दुर ले जाती थी। पहले मौज कराती थी। आज रुलाती है, क्योंकि आज मैं शराबी हूँ। पहले मैं इसको पीता था, आज ये मुझे पीती है। सादा में मुझे रहने नहीं देती। पहले ये मेरे लिए बेकरार थी, आज मैं इसके लिए बैकरार हूँ। आज मैं शराबी हूँ। पहले ये शान थी, रुतबा थी, जवानी थी, साहस थी। आज ये गरीबी है, दुख है, दर्द है, रोग है, अकेलापन है। फिर कोई नहीं साथ पर ये मेरे साथ है, आज मैं शराबी हूँ। छोङने ये देती नहीं, छोङता मैं इसे नहीं, कहाँ से आती है पता नहीं। पर जब आती है मदहोंश कर जाती है। ये जाने क्या है, ये ही मेरा सब है ना घर है ना परिवार, ना मित्र। ना रिश्तेदार बस यही मेरी जान है, क्योंकि, आज मैं शराबी हूँ। हाँ, आज मैं शराबी हूँ।। -कवितारानी।

फिर क्यों / Phir kyon

फिर क्यों  मैंने तो कभी ना कहा होगा, ना मैंने बताया होगा, फिर क्यों मुझे दी इतनी आशायें, जो हर कहीं अपनी मंजिल देख लेती है। सपनों को भी हकीकत समझ लेती है। क्यों मुझे दी इतनी दया, जो दुश्मन पर भी आ जाती है। अपनों को बार-बार माफ कर देती है। अनजान पर भी आ जाती है। क्यों मुझे दिया लगाव, प्रेम भाव, शर्म और अपनत्व, मैंने तो कभी ना मांगा था। मैंने तो ना कहा था की मुझे इतना सहनशील, अल्पतापी बनाओ। मैंने तो नहीं कहा था कि मुझे ऊँची व अलभ्य मंजिल के सपने दिखाओ। मैंने तो नहीं कहा था। फिर क्यो मुझे दिये ये, फिर क्यों मुझे दिया ये भाव, और ऐसा मन।। -कवितारानी।

तुफान आया / Tufan aaya

तुफान आया मंद-मंद रोशनी आ रही थी नजर, ढुबते सुरज में कहीं नजर आ रही किरण। बस थोङे दिन, बस थोङा और कर कट रहा था समय, वक्त का पहिया ना था रोकने को मजबुर। सब वही पुराने दुख सुख से चल रही थी जिन्दगी, पर अचानक एक तुफान आया साथ अपने दर्द लाया। कभी जिसे मैंने निकाला था मुसीबत से। जिसे में रोज हल्की हवा सा था पाला। जिसकी हमेशा झेली थी रुसवाई और भङास। आज मुझ पर वो तुफान फिर आया। मुझ पर उसने कहर बरपाया छोङने अपनी। जमीन उसने मुझे बहुत उकसाया। पर मैंने साथ था पकङा सब्र का। जमाये पैर खङा रहा ना हिला, ना मुङा मैं खङा रहा। कभी भी पैर पर फिर काबु मैं में रहा। चाहूँ ऐसे तुफानी इलाके को छोङना पर माँ तुने। और तेरी यादों ने मुझे इससे जोङे रखा।। -कवितारानी।

बस थोङे दिन की बात है / bas thode dino ki baat hai

बस थोङे दिन की बात है बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है, चलना है राह पर बहुत अभी मंजिल जरा पास है। बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है, कठिन डगर मगर हौंसलों में उङान है।  आहट हुई थमनें की मंद हुई चाल है, अकेली अपनी राह है अकेली अपनी चाह है। कठिनाई भरी राह है दुख भरा जीवन है, जिम्मेदारियाँ हजार है हौंसलों में अभी जान है। बस थोङे दिनों की बात है हौसला अभी साथ है, साथ है उम्मीदें मेरी साथ मेरा जहान है। सपने है स्वर्णीम मेरे मंजिल उज्ज्यमान है, बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है। थोङा दिया साथ हौंसले ने तब कौने मेरे पास है, थोङा दिया साथ डगर ने मंजिल ना मिली तो। जीवन अपना भी बेकार है पर अभी हौंसला मेरे साथ है, बस कुछ दिनों की बात है, हौंसला मेरे साथ है। बस कुछ दिनों की बात है।। -कवितारानी।

वैभव भरी मंजिल की ओर / vaibhav bhari manjil ki aur

वैभव भरी मंजिल की ओर  कहले ही तु चाहे कुछ भी मैं नहीं घबराऊँगा, कितनी ही तु अटकलें लगा दे मैं बढ़ता जाऊँगा। भेज हजारों अपने दुत में उनसे लङ जाऊँगा, रोक ना पायेंगे तेरे दुख के तीर में मैं घायल भी। बढ़ता जाऊँगा मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा, तुने तो हर राह पर कांटे बिछाए। तुने तो रास्ते ही बंद कर दिए, कर दिया अकेला मुझे इस राह पर। जाना कहाँ पता ना रहा मुझे ना हौंसला रहा था साथ, फिर भी आ पहुँचा यहाँ तक अब जाना है वहां तक। जहाँ की रह शाम सुहानी होगी, अनौखी दुनिया वहाँ की दिन होंगे मस्ती भरे। ओर रात होगी खुशी भरी, धन, वैभव, समद्धि सब होंगे सुख होगे सुख के साथ। और साथ हो अपनों का. प्यार होगा सब में इतना, जितना देखा ना किसी ने, मुझे पाना है उस जहाँ। को जहाँ मिले यह सब मुझको, अब ज्यादा दुर नहीं यह सपना, यहाँ सब है मेरा अपना। मैं आगे भी यही घबराऊँगा, मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा।। -कवितारानी।

कहानी देवा की / kahani deva ki (part-1)

कहानी देवा की अजब-गजब करता है कारनामें, अजब-गजब उसके किस्से कारनामें। सुनता नहीं किसी की बात, करता वही जो मन को आवे रास। सुनाता हूँ मैं कहानी एक पनवाने की, नहीं है जो किसी का गैर ऐसा दोस्त देवा। बातें रहती उसकी बङी-बङी, जिन्दगी रहती अधिकतर सपनों में पङी। अजब-अनौखे उसके खयाल ऐसा है ये रामदयाल, बात सुनों बचपन की जिसमें केवल पङाई ही उसके अङचन थी। करना दुनिया में ऐश इसीलिए बैंच डाली किताबें शेष, घरवालों ने लगाई फटकार पर कहा पङे इनकों- इनको कोई फर्क मेरे यार। बच्चों संग खैलना हर वक्त मौज-मस्ती से गुजर रहा था कि आ पङी इन पर गाज, माता-पिता ने छोङ दिया साथ। पर चलती रहती दुनिया दारी, मत तो केवल इनकी ही थी मारी। कमाने की उम्र हो चली पर खेलने से मन ही ना भरे, जोश-जोश में गये कमानें, दो दिन की कङी मेहनत। तिसरे दिन घर पर की लङाई ये काम भी इनको रास ना आया, शौक लगा गाये लाने का सपना बुना तबेला बनाने का, एक की दो और दो की चार करेंगे। दुध, दही, घी से अमीर बनेंगे पर सपने कहाँ सच होते उधार कर लाया गायें, इनकी भरपाई छठे दिन गायें रही ताक हाट, क्योंकि अब जरुरत थी मोबाईल लाने की। दो दिन ना चला दुध का व्यापा...

क्यों / kyo

क्यों मैं तो सीधा जा रहा था पाने को मंजिल। मैं तो अकेला पा रहा पाने में मंजिल। फिर क्यों मुझे इस झमेले में डाला। हाय तुने मुझे फिर मार डाला। क्यों तुनें दिखाये सपने मुझे हसीन रातों के। क्यों गले लगाने को ललचाया। मैंने तो नहीं की कभी पाने की भी कोशिश। तुझे फिर क्यों तुने मुझे फंसाया। काली गहरी आँखों में धकेल दिया मुझे। दिखाकर प्यारी मुस्कान से घायल कर दिया मुझे। हाय अब क्यों अकेला छोङ दिया मुझे। अब क्यों करुँ किसी पर भरोसा जब विश्वास ही ना रहा किसी पर।। -कवितारानी।

खोई- खोई राह / Raah hai khoi Khoi

खोई- खोई राह चलते-चलते फिर रुक गया हूँ। जाना चाहता हूँ कहीं पर जाऊँ कहाँ। हर जगह जला रही है चिंता। हर मार्ग पर है दो राहें। उलझन में है जिंदगी इसे सुलझाँऊ कहाँ। कोई दाँये बताता कोई बताता बायें। जाने को है एक मंजिल को पर दुसरा जाता कहाँ। राह में है अङचने कई। कई बेङियाँ है जकङी हुई। सब कदम रखुँ सोंचकर पर सोचुँ कब कहाँ। अब तो मंजिल पास आ रही। पर में देख नहीं पा रहा। चलते-चलते फिर रुक गया हूँ। क्योंकि जाना चाहता हूं कहीं पर जाऊँ कहाँ। सोंच रहा हुुँ अब तो अजब है तेरे खैल। तेरे खैल ना समझा कोई, बता मुझको मेरी। राह है जो खोई-खोई।। -कवितारानी।

भविष्य का राही / bhavishya ka rahi

 भविष्य का राही मन में कोई डर है भविष्य की डगर है, डगमगाये ना ये पल-पल इसी का डर है। आ रहे हर वक्त झोंके लग रही है ठोकर, पल-पल बहक रहा मन न स्थिर रहा। समय ना ठहर रहा हर पल निकल रहा, निकले पल कि यादों मे आज मन बहक रहा। भविष्य का अभाव है पथ भी भ्रमित रहा, चल रहा नाविक बन दिशा का भी ज्ञान नहीं। नहीं रहा कोई हौंसला ना साहस की बात है, पथ विचलित मन विचलित तन का ना आस रहा। ना आस रहा भु लोक का कोई, आकाश का पता कहाँ, फिर भी छुने की उम्मीद में मंजिल को ढुँढ रहा। रहा ना कोई साथ यहाँ ना कोई बतला रहा, जाना है कहाँ मन खुद से ही पुँछ रहा। अनजाना रास्ता है अनजानी मंजिल, जाना कहाँ पता नहीं फिर चला जा रहा। ईश्वर का साथ था पर मृत्यु लोक का राही था, वक्त था कलयुगी मानव थे सब दुखी। दुखी दुख मे जो कर्म किया वही उसे डरा रहा, आज बनके राही मैं मानव जगमगा रहा। क्या पता पहुँचेगा या नहीं बस अपनी धुन में जा रहा, एक राही अकेला जा रहा।। -कवितारानी।

यादों के पल / yadon ke pal

यादों के पल  याद आये वो पल जब में बच्चा था, मन का थोङा सच्चा था। याद आये वो दिन जब में कच्चा था, पर पङने में सबसे अच्छा था। याद आयी वो यादें जब दिन भर मस्ती की, हर वक्त एक नई कहानी थी हर वक्त मजा था। हर समय आजादी थी स्कूल की यादें थी, दिल कि बातें थी भविष्य की सोगातें थी। याद आये वो पल जब दोस्तों का साथ रहा, हर वक्त अपना मजा रहा कभी लङाई थी। तो कभी बस अपनी पढ़ाई थी, कभी घुमनें जाते कभी पार्टियाँ मनाते। हर दिन कुछ नया था आज क्यों ये ना रहा, बिछङे है फिर आज याद क्यों उनको करें। मन क्यों उन्हीं यादों में अब खोया रहे, अब भी करुँ मजा चाहे हो जाये कोई सजा। पर वक्त कहाँ ठहरता दोस्तों का मैला कहाँ लगता, कहाँ मिलती वो सौगातें दोस्तों के साथ है। दुनिया की सौगातें अब तो बस दुनिया बसाओ, नौकरी पर जाओ भविष्य के प्लान बनाओ। फिर भी याद आती अकेले में कभी भुली बिसरी यादें, तो मन को समझाओ और सो जाओ।। -कवितारानी।

क्यों मेरा मन उदास रहा / kyo mera man Udas rha

 क्यों मेरा मन उदास रहा बुँद-बुँद बरस रही, दुर-दुर तक फैल रही। सावन में फिर ये अठखेलियाँ है कर रही। कभी झुम रहा है मन कभी रहा है मन। क्यों अब बैचेन है आँखों में ना नींद है। हँसने को चाहता है पर हॅस नहीं रहा। रोने को कहता है पर रो भी नहीं रहा। खुद से ही परेशान है क्योंकि अभी भी नादान है। गलतियों से डर रहा पर मरनें से ना डर रहा। आज फिर मन बैचेन है अकेला है क्यों फिर आज। मंजिल को पाने की चाह में तन को टटोल रहा। बुँद-बुँद करके फिर बरस रहा। सब तरफ एक रोनक है मौसम में भी महक है। सब का मन उत्साहित है फिर में क्यों हताश हूँ। दुर-दुर तक महक फैली आज फिर घटा गहरी। बिरली तङक जोर से रही, बादल भी गरज रहे। पानी की हर लहर नई, नया है ये परवान। बुँद-बुँद में है सबकी प्यार फिर मेरा मन क्यों उदास। क्यों मन मेरा घबरा रहा, क्यों घर बैठा उदास रहा। क्यों हर वक्त सोंच रहा, क्या ये सोंच रहा। कुछ समझ क्यों नहीं आ रहा किसे ये ढुँढ रहा। इस मनमोहक सौन्दर्य भरे वातावरण में इस खुशहाल, मौसम में भी मेरा मन क्यों उदास रहा। क्यों मेरा मन उदास रहा. किससे पुँछु इसका जवाब। मेरा मन किसे ढुँढ रहा, क्यों ये उदास रहा। -कवित...

मन बावरा उलझ रहा / man bavra ulajh rha

मन बावरा उलझ रहा दुनिया पल-पल बदल रही, सबके मन से खैल रही। मौसम तो बदले सबके मन को भी बदल रही। हर बदलते मन के झाँसे में ये मन बावरा उलझ रहा। ना कुछ समझ रहा ना कुछ सोंच रहा। एक पल कि खुशियाँ पाने को सालों साल गवाँ रहा। हर एक दोखे में हर एक जाल में उलझ रहा। बीते पल याद नहीं याद नहीं वो टिस पहले की। ना याद रहा पहले का गम वो अकेले पल। जो समय था बुरा बीत गया पर फिर उसी तरह के जाल। आज क्यों मन मेरा बावरा उलझ रहा। नहीं सोंच रहा कल कि फिर नहीं गमों की सोंच रहा। फिर वही गलती करके मन बावरा उलझ रहा। बदलते इस मौसम में इन मनों के फेरे में। नहीं में कुछ सोंच रहा नहीं कुछ समझ रहा। मंजिल को तो भुल रहा भविष्य की भी नहीं सोंच रहा। दो पल कि खुशियों मेें जीवन भर का गम ले रहा। क्यों मेरा मन आज ये गलती कर रहा। मन बावरा उलझ रहा क्यों ये नहीं समझ रहा। खींच रही है वो हवाएँ बुला रहे हैं वो पल देख उनकों। रुका आज नहीं जा रहा ये बावरा उलझ गया। निकाले से नहीं निकल रहा ये तो पुरा उलझ गया। संभालने की में कोशिश कर रहा आज फिर फिसल गया। मेरा मन बावरा उलझ गया।। -कवितारानी।

बीते पल / beete pal

बीते पल जो बीते है खुशी के पल हॅसी के पल, यादों के पल अनजाने पल मस्ती के पल। याद आ रहे हैं वो पल इस पल, छोङ गये यादें अनेक किस्से अनेक, छोह गये तन्हाई फिर याद आई रुसवाई, याद आया बीते पलों का हॅसना, क्यों बीते ये मौज-मस्ती के पल, कहीं मन लगता ना अब इतने हॅसी थे वो पल। चैन गया  नींद गयी बस याद रही, घुम रहे चेहरे अनेक बातें अनेक, क्यों टिस सी जग रही क्यों याद ही बस रही, क्यों नहीं रुकते आँसु जब ना होते ये पल, कभी-कभी मिली खुशी गजब आस बनी, भुलना चाहा पर हर पल मेरे पास रही, ये बीते पल तोङ रहे मेरा मन मेरा तन। तोङ रहे मंजिल मेरी डगर. छोङ रहे अकेला फिर यादों में हर दम, हर दम बस यादें हैं क्यों नहीं कोई हम दम। ये जो है बीते पल याद रहेंगे जीवन भर, याद रहेगा जीवन डगर ये खास पल, ये बीते पल आये तो जी लुं इन्हें जीवन भर, भीगे-भीगे फुर्सत में यादों के पल।। -कवितारानी।

फिर भुखा रहा / phir se bhukha rha

  फिर भुखा रहा दिन चढ़ा रात बीती, दुपहर हुई, चिङिया चहकी। सबने खाना खाया पर किसी को रहम ना मुझ पर आया। सबने अपने मन की चलाई खुदगर्जी से दिल लगाई। सबने पेट की आग बुझाई मेरी याद किसी को ना आई। जो बनाता सबके लिए खाना उसे ही भुल गये दुख में देखो। कैसे इन्होने की अपनी भरपाई ऊपर से गुस्सा दिखाए। कैसे ये अपनी गरज दिखाए, मुझको दुख में भुल जाये। सबने अपने मन की चलाई, कैसे अपनी बात बनाई। गलती सारी मेरी बताई. कि क्यों बीमारी तुने लगाई। दवा तो दुर रही, एक रोटी ना इन्होने दिलाई। हाय कैसी गरज निभाई, खुद की भी ना मन में इनके आई। मैं ना रहा तो कौन करेगा काम आगे, कौन करेगा रसोई। इतनी भी इनके समझ ना आई, मन की आग और झुलसाई। दवाई ले भी आया कहीं से तो पेट की शाँति ना पाई। कहीं से तो कोई भुख दे मिटा, हमेशा की तरह क्यों मेरी भुख बढ़ाई। स्नेह ना मिला कभी ना सांत्वना की छाई। हर वक्त दिल में कसक सी क्यों जगाई। क्यों दुखों को बढ़ाया हमेशा क्यों ना ये भुख मिटाई। फिर भुखा रहा स्नेह, सांत्वना से ना हो पा मिलाई। दवा तो क्या मिलती एक टुकङा रोटी ना मिल पाई। हाथ पैर काम करे तब जाके मैनें भुख मिटाई। तब भी तो मेरी ना...

आज फिर भटक रहा / Aaj phir rahi bhatak rha

आज फिर भटक रहा मंजिल की तलाश में, अपनों की चाह में, सुख की प्यास में, दौलत की रास में, आज फिर बनके राही में हूँ भटक रहा, फिर सोंच वही रहा, फिर सपना वही रहा। राह फिर भटक रहा, फिर सपना वही रहा, मंजिल की आस में मैं राहगीर भटक रहा, एक अजीब कशिश जगी, अजब मजा रहा, चार दिन फिर जमकर मेघ बरस रहा। फिर वही सुखा आया आँसु ही छाया रहा, दुनिया के दर्द से क्या, खुद से में गीर रहा, आज फिर राही बनकर पथ को चुन रहा, आज फिर नई राह है नई सोंच चली आज। आज सब नया है फिर भी फिसल रहा, जहाँ से चला था में वहीं पहुँच रहा, आज फिर भटका राही मन डगर से भटक रहा, किसी ने चढाया बढ़ाई से किसी ने डकेला कढ़ाई में। सब ने गढ्ढे खोद दिये, सब आस जता दी, पर आस से कोई रास नहीं, मन तो पगला रहा, मंजिल का पता नहीं क्यों राही चला जा रहा, क्यों राही झुठी राह में पथ-पथ भटक रहा, आज फिर राही भटक रहा।। -कवितारानी। 

मंजिल की तलाश में / Manjil ki talash mein

मंजिल की तलाश में मंजिल की तलाश में आज फिर डगर-डगर। आज फिर द्वार-द्वार ढुँढ रहा मंजिल अपनी। जिन्दगी की राह में कठिनाईयों की राह में। फिर रहा मगर-मगर आज भी मिली नहीं मंजिल। हर जगह ठहर-ठहर पुँछ रहा पता मगर। भटका रहा राहगीर मुझे फिर कैसे मिले मंजिल। हर जगह लुट है हर जगह है धोखा। जो दे रहा राही को मंजिल का टोटा। मिले किसे इस झुठे संसार में मंजिल यहाँ। कलयुग का है काल बङा भटका राही राह का। मंजिल की तलाश छोङ दी किसी ने। मंजिल की राह मोङ दी किसी ने। मंजिल को लुट लिया किसी ने दलाली छेङ। हर कोई जाना चाह रहा इस ऊँची इमारत पर। पैसों के ढेर हो जहाँ आलस का आसमां। धरती को पुछता नहीं  आकाश में हो पैर जहाँ। गरीबों की सोंचता ना जन्तुओं की जहाँ। ऐसी मंजिल है आम यहाँ, फिर भी। मंजिल की तलाश में मंजिल वाला। घुम रहा डगर-डगर, द्वार-द्वार अन्त नहीं। इस राह का कौन, कौनसी है ये मंजिल पता कहाँ।। -कवितारानी।

अकेला हूँ/ Akela hun

  अकेला हूँ आज मैं फिर अकेला हूँ इस डगर पर, आज फिर अकेला हूँ इस सफर मैं, मैं आज फिर अकेला हूँ इस स्वप्न लोक में, हाँ मैं तो अब भी अकेला हूँ समाज में। क्यों मैं अकेला हूँ नहीं जानता में ये, पर पहले भी तो अकेला था फिर आज क्यों, पहले भी तो तन्हाई थी साथ बस मेरे, पहले भी तो अकेले ही देखे थे सपने मैंने। पहले भी तो सब से रसवाई थी, फिर आज कैसे अकेला मैं तो बरसों से अकेला, ढुँढ रहा हमसफर आज भी आज भी तलाश है, आज भी कोई वफादार मिले ईमानदार मिले। प्यार का प्यासा तो पहले भी था, आज भी क्यों प्यास है, पहले भी जिन्दगी कठिन थी आज भी है, इस स्वप्न लोक-मृत्यु लोक में कौन अकेला नहीं है, पर जिन्दगी में तो सबके पास कोई साथी है। फिर मैं क्यो अकेला हूँ, मैं तो आज भी अकेला हूँ, कोई था चाहने वाला जिसने पैदा किया, उसे भी तुने छिन लिया, क्यों मुझे अकेला किया, अब तो कोई मिला दे जो तन्हाई मिटा दे क्योंकि, मैं आज भी अकेला हूँ, इस जीवन पथ पर अकेला हूँ।। -कवितारानी।

अगर सपने सच होते / Agar sapne sach hote

  अगर सपने सच होते अगर सपने सच होते तो कौन भगवान को पुछता, सब सपनों में ही सहते कोई नहीं जगाता। अगर सपने सच होते ते कौन काम करता, कौन मेहनत की रोटी कमाता। कौन पढ़ाई करता सब बीना पढ़े पास होते, कौन किसी से पुछता सब सपने देखते। कोई अपनी नौकरी का, तो कोई अपनी शादी का, कोई अपनी आजादी का, तो कोई अपनी प्रेमिका का, तो कोई  स्वर्ग का। अगर सपने सच होते तो कौन दुनिया में रहता, तब तो सब स्वप्न लोक से ही काम चलाते। ्गर सपने सच होते ते सब निष्कर्म में, आलस से भरे मद के प्याले होते। अगर सपने सच होते तो ये लोक एक आश्चर्य लोक दुष्कर्मों से भरा होता। अगर सपने सच होते तो, ना मैं होता, ना तुम होते, जो होते सब सपने होते। इसलिए सपने कभी सच नहीं होते।। -कवितारानी।

काश / kash

काश काश कोई मेरा भी अपना होता, काश सब भुल जाता कभी याद नही रख पाता। काश मैं कुछ समझ पाता, काश जो मन चाहता वो पा जाता। काश ऐसा हो जाता काश सच हो जाता, हर सपने को में सच कर पाता। काश जो में मांगता वो मुझे मिल जाता, काश सपने ना देखता जो देखता लौकिक होता। काश खुद से सर्माता, सब बता जाता, काश जिसे प्यार करता उसे बोल पाता। इजहार करताचाहे सकारात्मक जवाब ना आता, काश अपनी दुनिया अपनी मर्जी से जी जाता। काश हमेशा मन की कर पाता, मैं जो लिखता, जो कहता उसी के कर जाता। काश मैं कभी झुठ ना बोलता, सत्य पर ही दुनिया जी जाता। काश सबको अपना गहरा दोस्त बना पाता, काश किसी के भी मन को पढ़ पाता। काश मैं इस दुनिया मैं ना आता तो ये सारे गम ना पाता, इस काश को अपना साथी ना बनाता। तो इस संसार को जी जाता... -कवितारानी।

suni part-6 samajik jivan / सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन

  सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन सुनी सुनाई बात थी, कुछ साथ की बिसात थी, मिजाज ही कुछ ऐसा था उसका, मिले जिसे मन हर ले उसका। बातों के फटकारे करती, चिढ़ाये कोई ललकारे करती, अब डरती नहीं पहले सी वो, मुहँ पर कहती जो कहनी थी वो। सुनना किसी का आता नहीं, काम कोई रुक पाता नहीं, सबकी सुनती करती मन की, पर मन में डरती रहती मन ही। ग्याहरवीं में प्रवेश किया, विज्ञान संकाय को ही लिया, अच्छे अंक अच्छा भविष्य सोंचा, ध्यान लगाया तो किसी ने ना टोका। रोज पढ़ती अपनी धुन में, कमरा मिला अपने गुन में, मस्ती भी करती लङती भी थी, पर पढ़ाई के समय पढ़ती ही थी। समाज का अलग नजरिया, पुछे हरदम कहाँ साँवरिया, सुनके सुनी होती बावरी, अपने राग में गाती साँवरी। बोल कई बार कङवे करती, जो चिढ़ाये उसी से लङती, बुराई का घुंघट अब बढ़ रहा, चेहरे पर गुस्सा अब बढ़ रहा। बैठ अकेले खुब रोती, माँ बाप को भी कोसा करती, दुल्हे को नफरत से नापती, चेहरे को छुपाती और भागती। शाँत चेहरा अब उदास सा, हॅसता मुखङा बिन उजास सा, कुछ रोनक खिलने से पहले खोई, किस्मत कैसी सोंच के रोई। संध्या बंध्या बन चौखट देखती, छत पर जाकर क्षितिज देखती, नयनों से सपनें बर...

हाँ बीमार हूँ / han bimar hun

  हाँ बीमार हूँ कलयुग का अन्धकार है, झुठ का प्रकाश है। बेईमानी की हवा चली, दोखों का संसार है। समाज कह रहा है हाँ मैं बीमार हूँ। खुद से ही लाचार हूँ अपनों से बीमार हूँ। मानव मेें विध्यमान हूँ हर जगह से परेशान हूँ। हर वक्त झुठ की खाँसी चली फिर कमजेरी की बुखार है। लाचार का ईमान हूँ खुद ही खुद से बीमार हूँ। मानव ने मुझे बनाया है इसी ने मुझे सङाया है। इसी से आज लाचार हूँ मैं तो बीमार हूँ। हर तरफ गंदगी ही हर तरफ प्रदुषण दिया। मैंने ही तो वनों का नाश किया तभी तो मैं बीमार हूँ। घुसखोर का घुसा मीला चोरी डकेती ने चीरा। अब तो एक कंकाल हूँ हाँ मैं ते बीमार हूँ। पैसों का जो जादू चला लक्ष्मी जी को भी नहीं क्षमा। अरे भगवान तो है कहाँ सब पोसे का जो जाल है। इस अत्याचार में कौन सुखी इस संसार में। मैं तो ेक समाज हूँ मुझसे ही तो मैं बीमार हूँ। हाँ मैं ही तो बीमार हूँ दवा दारु तो चल रहे पर ये भी। कहाँ खल रहे िसे भी मैं बीमार हूँ हाँ मैं इन्सान हूँ। हाँ मैं समाज हूँ, मैं तो बीमार हूँ।। -कवितारानी।

हाँ मैनें प्यार किया / ha mene pyar kiya

हाँ मैनें प्यार किया हाँ मैंने प्यार किया तेरा इंतजार किया। हर पल तुझको याद किया तेरा एतबार किया। हाँ मैंने प्यार किया तुझको अपना मान लिया। जाने कब से ये हुआ मेरा तो चैन गया जब से ये हुआ। जीने की उम्मीद छोङ दी हर पल तेरी याद थी। एक पल देखने को मेरी हर उम्मीद थी। आँखो को तेरा इंतजार था दिल तो बङा बेकरार था। मुझको हर वक्त तेरा इंतजार था जब से ये प्यार था। कहने को ये बेकरार था पर जाने ये क्या हुआ। हर बार मुँह ना खुला और दिल बैठ गया। जब तुम आये सामने मैं तो खुद में ना रहा। अरे मुझे ये क्या हुआ तुझे खोने का डर रहा। पर मैंने तुझे खो दिया भुला पर भुला ना सका। हर बार तु ही याद रहा हाँ मैंने भी प्यार किया है। पता है तुम भी प्यार में हो परये तो संसार है। तुम ना कहोगे मुझे मैं ना कह सका तुझे क्या यही प्यार है। पर अब भी मुझे तेरा इंतजार है हाँ मुझे तो प्यार है। ख्वाब के पुल मैंने बनाये है सपनों का महल सजाया है। पर ये एक सपना है पर यही तो मेरा अपना है। इन सपनों के सहारे ही मैं कह सकता हूँ। हाँ मैंने प्यार किया बस तेरा इंतजार किया। हाँ हर बार बस तुझे याद किया बस तेरा एतबार किया।। -कवितारानी। 

मेरी तन्हाई / meri tanhai

मेरी तन्हाई अक्सर ये बेवक्त आई, कभी भीङ में तो कभी अकेले में आई। कभी आँसु लाई कभी बनकर गम समायी, हाँ ये मेरी तन्हाई ठेरों सवाल लाई।। ये रिश्तों से आई नहीं ये अजनबीयों से आई, ये तो दोस्तों से आई ये तो पहचान से आई। नहीं ये तो मेरे दिल से आई, ये मेरी तन्हाई अनेक उलझने लाई।। ये क्यों आई क्यों मुझको बहकाये, ये तो नई मंजिल दिखाये नई डगर है लाई। अरे ये तो पथ भ्रमित करने आई, मेरी तन्हाई मुझको हर वक्त उकसाये।। अरे ये तो आँखों से दिल में आई, अरे ये तो बातों से भी दिल में आई। नहीं ये तो कानों से दिल में आई, ये मेरी तन्हाई दिल के रोग है लाई।। हजारों दर्द ले के चली आई, दिल में गमों की बारात लेकर आई। कभी रुसवाई कभी राजी बनकर आई, हाँ ये मेरी तन्हाई दिल की गहराई लाई।। हाँ ये मेरी तन्हाई हर पल नई राह लाई, कभी गम-कभी खुशी से चमक लाई ये तन्हाई।। -कवितारानी।

दर्द के साये / dard ke saye

दर्द  के  साये हर वक्त मेरे दिल में आये। कुछ सपने तोङ लाये कुछ दिल तोङ आये। जब भी आये मुझे तङपाये। यही है मेरे दर्द के साये।। कभी बनकर दोस्त मुस्काये, कभी दिल ये समाये गम लाये। कभी आँखों से आये, और कभी खामोशी से निकल आये। ये मेरे है गम के साये, जो हर एकान्त में मुझे तङपाये। कभी रिश्तों से आये अपनों से लाये। तो कभी खुद से घबराये। पर जब भी आये मुझे भिगाये। ये मेरे गम के साये, क्यों मुझे तङपाये। हर साये से मुझे डराये, कभी अँधेरों मे ले जाये। कभी मुझको सताये कभी मुझको तङपाये। मेरे गम के साये हर वक्त मेरे दिल में आये। ये मेरे दर्द के साये। -कवितारानी।

आसरा / Aasra

आसरा आसरा है गम का मन मेरा। आसरा है दर्द का तङप का मन मेरा। आसरा है चाहतों का, सपनों का मन मेरा। आसरा है दिल से चाहने वालों का माँ का मन मेरा। इस आसरे से जुङी है कहानियाँ कई। कई ऊतार जढ़ाव अनुभवों का आसरा है मन मेरा। जिन्दगी गमों से भरी है पर गमों से भरा है आसरा मन मेरा। आसरा है आँसुओं का दुखों का यहां। आसरा है चाहतों का जो मिला कभी मन मेरा। कहते हैं सपने कम देखने चाहिए पर सपनों का है आसरा मेरा। कहते हैं दिल से कम सोंचना चाहिए पर दिल में ही तो है आसरा मेरा। आसरा है पल भर कि खुश नशीबी का मन मेरा। आसरा है ढुँढती खुशियों के संसार का मन मेरा। आसरा है नई आस का मन मेरा। क्या गजब का आसरा है मन मेरा। क्या बावरा है मन मेरा। -कवितारानी।