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हे प्रभु / hey prabhu

हे प्रभु। है प्रभु, सहते-सहते कहीं गम में मन ना जाऊँ कहीं। दूर होकर तुझसे नास्तिक ना बन जाऊँ कहीं। देखे हैं जो ख्वाब उन्हें इन मस्त राहों में भुला ना पाऊँ कहीं। जो सजाएँ हैं अरमान भुल ना जाऊँ कहीं। हो प्रभु, मुझे वर दो। मुझे शक्ति दो इतनी की डटकर सामना करूँ हर कहीं। कठिन हो राह कितनी ही, चाहे हो राह कंटिली कितनी ही। रुकुं ना झुकु ना, पालुं दृढ़ होकर मंजिल यहीं। खोकर आपा में रुक ना जाऊं कहीं। हे प्रभु, निवेदन है आपसे की कृपा रखना। झुके मेरा सिर तो हाथ आपका रखना। भुले से हो गलती ते भले सजा देना आप। देखे हैं रखी जिंदगी मैंने जो दिखाई आपने। सहते-सहते गमों को, मैंने बिताया लम्हों को। कोशा है कई बार मैंने आपको पर आया भी आपके द्वार। इतनी सी है विनती अबके लेना आप संभाल। मेहनत करुँगा पुरी जी जान लगाकर। बस साथ आप रहना मेरे हर दम। करुँ पुजा-अर्चना हमेशा आपकी। दिखाये जो ख्वाब अपनों को पुरा करुँ उनकों। काबिल इतना मुझे बना देना, विनती है फिर से नादान की। है प्रभु, इस बार ओर सम्भाल लेना मेरी आप।। -कवितारानी।

मन में खलबली / man mein khalbali

मन में खलबली आसमान साफ है और राहें खुली-खुली। हर पता बयां कर रहा है मेरी खली-बली। मंजिल अब ज्यादा दुर नहीं, है यहीं-कहीं। जीने को अपने जहांन में बैचेन है मेरे मन की कली। दुख दर्द भी साथ है, साथ है रह कांटे राह के। वक्त भी प्रतिकुल है, प्रतिकुल है राहें। भटका रहा मुझे वो उन्नति का शिखर गली-गली। हारने का विचार मचा रहा है तन में खली-बली।। लेकर हार खङी है मंजिल यहीं-कहीं। देखने को मेरी आँखें मचा रही हल-बली। देखे हैं जो ख्वाब अब पुरे होंगे। पुरी होगी मन की देखी हर सुहानी कली।। अरमान रहते बैचेन सोंचकर कहीं छुट ना जाए राह मेरी। पथ भ्रष्ट होकर खो ना दुँ मंजिल कहीं। टुट जाऊँ अगर हो ऐसा। मर ही जाऊँ ना मिले अगर मंजिल कहीं। मचा दुँ सोंच अपने मन में यह खलबली।। -कवितारानी।

मैं शराबी हूँ / main sharabi hun

मैं शराबी हूँ आज मैं शराबी हूँ,  क्योंकि मैं खुद से दुखी हूँ। पी थी कभी मौज में,  पी थी कभी मयखाने में। पी थी मैंने कभी अपने छोटे-मोटे गम भुलाने में। आज पी है मन बहलाने में, तभी तो मैं शराबी हूँ। आज मैं शराबी हूँ। पहले कभी यह मेरा शौर्य दिखाती थी। कभी मुझे गम से दुर ले जाती थी। पहले मौज कराती थी। आज रुलाती है, क्योंकि आज मैं शराबी हूँ। पहले मैं इसको पीता था, आज ये मुझे पीती है। सादा में मुझे रहने नहीं देती। पहले ये मेरे लिए बेकरार थी, आज मैं इसके लिए बैकरार हूँ। आज मैं शराबी हूँ। पहले ये शान थी, रुतबा थी, जवानी थी, साहस थी। आज ये गरीबी है, दुख है, दर्द है, रोग है, अकेलापन है। फिर कोई नहीं साथ पर ये मेरे साथ है, आज मैं शराबी हूँ। छोङने ये देती नहीं, छोङता मैं इसे नहीं, कहाँ से आती है पता नहीं। पर जब आती है मदहोंश कर जाती है। ये जाने क्या है, ये ही मेरा सब है ना घर है ना परिवार, ना मित्र। ना रिश्तेदार बस यही मेरी जान है, क्योंकि, आज मैं शराबी हूँ। हाँ, आज मैं शराबी हूँ।। -कवितारानी।

फिर क्यों / Phir kyon

फिर क्यों  मैंने तो कभी ना कहा होगा, ना मैंने बताया होगा, फिर क्यों मुझे दी इतनी आशायें, जो हर कहीं अपनी मंजिल देख लेती है। सपनों को भी हकीकत समझ लेती है। क्यों मुझे दी इतनी दया, जो दुश्मन पर भी आ जाती है। अपनों को बार-बार माफ कर देती है। अनजान पर भी आ जाती है। क्यों मुझे दिया लगाव, प्रेम भाव, शर्म और अपनत्व, मैंने तो कभी ना मांगा था। मैंने तो ना कहा था की मुझे इतना सहनशील, अल्पतापी बनाओ। मैंने तो नहीं कहा था कि मुझे ऊँची व अलभ्य मंजिल के सपने दिखाओ। मैंने तो नहीं कहा था। फिर क्यो मुझे दिये ये, फिर क्यों मुझे दिया ये भाव, और ऐसा मन।। -कवितारानी।

तुफान आया / Tufan aaya

तुफान आया मंद-मंद रोशनी आ रही थी नजर, ढुबते सुरज में कहीं नजर आ रही किरण। बस थोङे दिन, बस थोङा और कर कट रहा था समय, वक्त का पहिया ना था रोकने को मजबुर। सब वही पुराने दुख सुख से चल रही थी जिन्दगी, पर अचानक एक तुफान आया साथ अपने दर्द लाया। कभी जिसे मैंने निकाला था मुसीबत से। जिसे में रोज हल्की हवा सा था पाला। जिसकी हमेशा झेली थी रुसवाई और भङास। आज मुझ पर वो तुफान फिर आया। मुझ पर उसने कहर बरपाया छोङने अपनी। जमीन उसने मुझे बहुत उकसाया। पर मैंने साथ था पकङा सब्र का। जमाये पैर खङा रहा ना हिला, ना मुङा मैं खङा रहा। कभी भी पैर पर फिर काबु मैं में रहा। चाहूँ ऐसे तुफानी इलाके को छोङना पर माँ तुने। और तेरी यादों ने मुझे इससे जोङे रखा।। -कवितारानी।

बस थोङे दिन की बात है / bas thode dino ki baat hai

बस थोङे दिन की बात है बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है, चलना है राह पर बहुत अभी मंजिल जरा पास है। बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है, कठिन डगर मगर हौंसलों में उङान है।  आहट हुई थमनें की मंद हुई चाल है, अकेली अपनी राह है अकेली अपनी चाह है। कठिनाई भरी राह है दुख भरा जीवन है, जिम्मेदारियाँ हजार है हौंसलों में अभी जान है। बस थोङे दिनों की बात है हौसला अभी साथ है, साथ है उम्मीदें मेरी साथ मेरा जहान है। सपने है स्वर्णीम मेरे मंजिल उज्ज्यमान है, बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है। थोङा दिया साथ हौंसले ने तब कौने मेरे पास है, थोङा दिया साथ डगर ने मंजिल ना मिली तो। जीवन अपना भी बेकार है पर अभी हौंसला मेरे साथ है, बस कुछ दिनों की बात है, हौंसला मेरे साथ है। बस कुछ दिनों की बात है।। -कवितारानी।

वैभव भरी मंजिल की ओर / vaibhav bhari manjil ki aur

वैभव भरी मंजिल की ओर  कहले ही तु चाहे कुछ भी मैं नहीं घबराऊँगा, कितनी ही तु अटकलें लगा दे मैं बढ़ता जाऊँगा। भेज हजारों अपने दुत में उनसे लङ जाऊँगा, रोक ना पायेंगे तेरे दुख के तीर में मैं घायल भी। बढ़ता जाऊँगा मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा, तुने तो हर राह पर कांटे बिछाए। तुने तो रास्ते ही बंद कर दिए, कर दिया अकेला मुझे इस राह पर। जाना कहाँ पता ना रहा मुझे ना हौंसला रहा था साथ, फिर भी आ पहुँचा यहाँ तक अब जाना है वहां तक। जहाँ की रह शाम सुहानी होगी, अनौखी दुनिया वहाँ की दिन होंगे मस्ती भरे। ओर रात होगी खुशी भरी, धन, वैभव, समद्धि सब होंगे सुख होगे सुख के साथ। और साथ हो अपनों का. प्यार होगा सब में इतना, जितना देखा ना किसी ने, मुझे पाना है उस जहाँ। को जहाँ मिले यह सब मुझको, अब ज्यादा दुर नहीं यह सपना, यहाँ सब है मेरा अपना। मैं आगे भी यही घबराऊँगा, मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा।। -कवितारानी।

कहानी देवा की / kahani deva ki (part-1)

कहानी देवा की अजब-गजब करता है कारनामें, अजब-गजब उसके किस्से कारनामें। सुनता नहीं किसी की बात, करता वही जो मन को आवे रास। सुनाता हूँ मैं कहानी एक पनवाने की, नहीं है जो किसी का गैर ऐसा दोस्त देवा। बातें रहती उसकी बङी-बङी, जिन्दगी रहती अधिकतर सपनों में पङी। अजब-अनौखे उसके खयाल ऐसा है ये रामदयाल, बात सुनों बचपन की जिसमें केवल पङाई ही उसके अङचन थी। करना दुनिया में ऐश इसीलिए बैंच डाली किताबें शेष, घरवालों ने लगाई फटकार पर कहा पङे इनकों- इनको कोई फर्क मेरे यार। बच्चों संग खैलना हर वक्त मौज-मस्ती से गुजर रहा था कि आ पङी इन पर गाज, माता-पिता ने छोङ दिया साथ। पर चलती रहती दुनिया दारी, मत तो केवल इनकी ही थी मारी। कमाने की उम्र हो चली पर खेलने से मन ही ना भरे, जोश-जोश में गये कमानें, दो दिन की कङी मेहनत। तिसरे दिन घर पर की लङाई ये काम भी इनको रास ना आया, शौक लगा गाये लाने का सपना बुना तबेला बनाने का, एक की दो और दो की चार करेंगे। दुध, दही, घी से अमीर बनेंगे पर सपने कहाँ सच होते उधार कर लाया गायें, इनकी भरपाई छठे दिन गायें रही ताक हाट, क्योंकि अब जरुरत थी मोबाईल लाने की। दो दिन ना चला दुध का व्यापा...

क्यों / kyo

क्यों मैं तो सीधा जा रहा था पाने को मंजिल। मैं तो अकेला पा रहा पाने में मंजिल। फिर क्यों मुझे इस झमेले में डाला। हाय तुने मुझे फिर मार डाला। क्यों तुनें दिखाये सपने मुझे हसीन रातों के। क्यों गले लगाने को ललचाया। मैंने तो नहीं की कभी पाने की भी कोशिश। तुझे फिर क्यों तुने मुझे फंसाया। काली गहरी आँखों में धकेल दिया मुझे। दिखाकर प्यारी मुस्कान से घायल कर दिया मुझे। हाय अब क्यों अकेला छोङ दिया मुझे। अब क्यों करुँ किसी पर भरोसा जब विश्वास ही ना रहा किसी पर।। -कवितारानी।

खोई- खोई राह / Raah hai khoi Khoi

खोई- खोई राह चलते-चलते फिर रुक गया हूँ। जाना चाहता हूँ कहीं पर जाऊँ कहाँ। हर जगह जला रही है चिंता। हर मार्ग पर है दो राहें। उलझन में है जिंदगी इसे सुलझाँऊ कहाँ। कोई दाँये बताता कोई बताता बायें। जाने को है एक मंजिल को पर दुसरा जाता कहाँ। राह में है अङचने कई। कई बेङियाँ है जकङी हुई। सब कदम रखुँ सोंचकर पर सोचुँ कब कहाँ। अब तो मंजिल पास आ रही। पर में देख नहीं पा रहा। चलते-चलते फिर रुक गया हूँ। क्योंकि जाना चाहता हूं कहीं पर जाऊँ कहाँ। सोंच रहा हुुँ अब तो अजब है तेरे खैल। तेरे खैल ना समझा कोई, बता मुझको मेरी। राह है जो खोई-खोई।। -कवितारानी।

भविष्य का राही / bhavishya ka rahi

 भविष्य का राही मन में कोई डर है भविष्य की डगर है, डगमगाये ना ये पल-पल इसी का डर है। आ रहे हर वक्त झोंके लग रही है ठोकर, पल-पल बहक रहा मन न स्थिर रहा। समय ना ठहर रहा हर पल निकल रहा, निकले पल कि यादों मे आज मन बहक रहा। भविष्य का अभाव है पथ भी भ्रमित रहा, चल रहा नाविक बन दिशा का भी ज्ञान नहीं। नहीं रहा कोई हौंसला ना साहस की बात है, पथ विचलित मन विचलित तन का ना आस रहा। ना आस रहा भु लोक का कोई, आकाश का पता कहाँ, फिर भी छुने की उम्मीद में मंजिल को ढुँढ रहा। रहा ना कोई साथ यहाँ ना कोई बतला रहा, जाना है कहाँ मन खुद से ही पुँछ रहा। अनजाना रास्ता है अनजानी मंजिल, जाना कहाँ पता नहीं फिर चला जा रहा। ईश्वर का साथ था पर मृत्यु लोक का राही था, वक्त था कलयुगी मानव थे सब दुखी। दुखी दुख मे जो कर्म किया वही उसे डरा रहा, आज बनके राही मैं मानव जगमगा रहा। क्या पता पहुँचेगा या नहीं बस अपनी धुन में जा रहा, एक राही अकेला जा रहा।। -कवितारानी।

यादों के पल / yadon ke pal

यादों के पल  याद आये वो पल जब में बच्चा था, मन का थोङा सच्चा था। याद आये वो दिन जब में कच्चा था, पर पङने में सबसे अच्छा था। याद आयी वो यादें जब दिन भर मस्ती की, हर वक्त एक नई कहानी थी हर वक्त मजा था। हर समय आजादी थी स्कूल की यादें थी, दिल कि बातें थी भविष्य की सोगातें थी। याद आये वो पल जब दोस्तों का साथ रहा, हर वक्त अपना मजा रहा कभी लङाई थी। तो कभी बस अपनी पढ़ाई थी, कभी घुमनें जाते कभी पार्टियाँ मनाते। हर दिन कुछ नया था आज क्यों ये ना रहा, बिछङे है फिर आज याद क्यों उनको करें। मन क्यों उन्हीं यादों में अब खोया रहे, अब भी करुँ मजा चाहे हो जाये कोई सजा। पर वक्त कहाँ ठहरता दोस्तों का मैला कहाँ लगता, कहाँ मिलती वो सौगातें दोस्तों के साथ है। दुनिया की सौगातें अब तो बस दुनिया बसाओ, नौकरी पर जाओ भविष्य के प्लान बनाओ। फिर भी याद आती अकेले में कभी भुली बिसरी यादें, तो मन को समझाओ और सो जाओ।। -कवितारानी।

क्यों मेरा मन उदास रहा / kyo mera man Udas rha

 क्यों मेरा मन उदास रहा बुँद-बुँद बरस रही, दुर-दुर तक फैल रही। सावन में फिर ये अठखेलियाँ है कर रही। कभी झुम रहा है मन कभी रहा है मन। क्यों अब बैचेन है आँखों में ना नींद है। हँसने को चाहता है पर हॅस नहीं रहा। रोने को कहता है पर रो भी नहीं रहा। खुद से ही परेशान है क्योंकि अभी भी नादान है। गलतियों से डर रहा पर मरनें से ना डर रहा। आज फिर मन बैचेन है अकेला है क्यों फिर आज। मंजिल को पाने की चाह में तन को टटोल रहा। बुँद-बुँद करके फिर बरस रहा। सब तरफ एक रोनक है मौसम में भी महक है। सब का मन उत्साहित है फिर में क्यों हताश हूँ। दुर-दुर तक महक फैली आज फिर घटा गहरी। बिरली तङक जोर से रही, बादल भी गरज रहे। पानी की हर लहर नई, नया है ये परवान। बुँद-बुँद में है सबकी प्यार फिर मेरा मन क्यों उदास। क्यों मन मेरा घबरा रहा, क्यों घर बैठा उदास रहा। क्यों हर वक्त सोंच रहा, क्या ये सोंच रहा। कुछ समझ क्यों नहीं आ रहा किसे ये ढुँढ रहा। इस मनमोहक सौन्दर्य भरे वातावरण में इस खुशहाल, मौसम में भी मेरा मन क्यों उदास रहा। क्यों मेरा मन उदास रहा. किससे पुँछु इसका जवाब। मेरा मन किसे ढुँढ रहा, क्यों ये उदास रहा। -कवित...

मन बावरा उलझ रहा / man bavra ulajh rha

मन बावरा उलझ रहा दुनिया पल-पल बदल रही, सबके मन से खैल रही। मौसम तो बदले सबके मन को भी बदल रही। हर बदलते मन के झाँसे में ये मन बावरा उलझ रहा। ना कुछ समझ रहा ना कुछ सोंच रहा। एक पल कि खुशियाँ पाने को सालों साल गवाँ रहा। हर एक दोखे में हर एक जाल में उलझ रहा। बीते पल याद नहीं याद नहीं वो टिस पहले की। ना याद रहा पहले का गम वो अकेले पल। जो समय था बुरा बीत गया पर फिर उसी तरह के जाल। आज क्यों मन मेरा बावरा उलझ रहा। नहीं सोंच रहा कल कि फिर नहीं गमों की सोंच रहा। फिर वही गलती करके मन बावरा उलझ रहा। बदलते इस मौसम में इन मनों के फेरे में। नहीं में कुछ सोंच रहा नहीं कुछ समझ रहा। मंजिल को तो भुल रहा भविष्य की भी नहीं सोंच रहा। दो पल कि खुशियों मेें जीवन भर का गम ले रहा। क्यों मेरा मन आज ये गलती कर रहा। मन बावरा उलझ रहा क्यों ये नहीं समझ रहा। खींच रही है वो हवाएँ बुला रहे हैं वो पल देख उनकों। रुका आज नहीं जा रहा ये बावरा उलझ गया। निकाले से नहीं निकल रहा ये तो पुरा उलझ गया। संभालने की में कोशिश कर रहा आज फिर फिसल गया। मेरा मन बावरा उलझ गया।। -कवितारानी।

बीते पल / beete pal

बीते पल जो बीते है खुशी के पल हॅसी के पल, यादों के पल अनजाने पल मस्ती के पल। याद आ रहे हैं वो पल इस पल, छोङ गये यादें अनेक किस्से अनेक, छोह गये तन्हाई फिर याद आई रुसवाई, याद आया बीते पलों का हॅसना, क्यों बीते ये मौज-मस्ती के पल, कहीं मन लगता ना अब इतने हॅसी थे वो पल। चैन गया  नींद गयी बस याद रही, घुम रहे चेहरे अनेक बातें अनेक, क्यों टिस सी जग रही क्यों याद ही बस रही, क्यों नहीं रुकते आँसु जब ना होते ये पल, कभी-कभी मिली खुशी गजब आस बनी, भुलना चाहा पर हर पल मेरे पास रही, ये बीते पल तोङ रहे मेरा मन मेरा तन। तोङ रहे मंजिल मेरी डगर. छोङ रहे अकेला फिर यादों में हर दम, हर दम बस यादें हैं क्यों नहीं कोई हम दम। ये जो है बीते पल याद रहेंगे जीवन भर, याद रहेगा जीवन डगर ये खास पल, ये बीते पल आये तो जी लुं इन्हें जीवन भर, भीगे-भीगे फुर्सत में यादों के पल।। -कवितारानी।

फिर भुखा रहा / phir se bhukha rha

  फिर भुखा रहा दिन चढ़ा रात बीती, दुपहर हुई, चिङिया चहकी। सबने खाना खाया पर किसी को रहम ना मुझ पर आया। सबने अपने मन की चलाई खुदगर्जी से दिल लगाई। सबने पेट की आग बुझाई मेरी याद किसी को ना आई। जो बनाता सबके लिए खाना उसे ही भुल गये दुख में देखो। कैसे इन्होने की अपनी भरपाई ऊपर से गुस्सा दिखाए। कैसे ये अपनी गरज दिखाए, मुझको दुख में भुल जाये। सबने अपने मन की चलाई, कैसे अपनी बात बनाई। गलती सारी मेरी बताई. कि क्यों बीमारी तुने लगाई। दवा तो दुर रही, एक रोटी ना इन्होने दिलाई। हाय कैसी गरज निभाई, खुद की भी ना मन में इनके आई। मैं ना रहा तो कौन करेगा काम आगे, कौन करेगा रसोई। इतनी भी इनके समझ ना आई, मन की आग और झुलसाई। दवाई ले भी आया कहीं से तो पेट की शाँति ना पाई। कहीं से तो कोई भुख दे मिटा, हमेशा की तरह क्यों मेरी भुख बढ़ाई। स्नेह ना मिला कभी ना सांत्वना की छाई। हर वक्त दिल में कसक सी क्यों जगाई। क्यों दुखों को बढ़ाया हमेशा क्यों ना ये भुख मिटाई। फिर भुखा रहा स्नेह, सांत्वना से ना हो पा मिलाई। दवा तो क्या मिलती एक टुकङा रोटी ना मिल पाई। हाथ पैर काम करे तब जाके मैनें भुख मिटाई। तब भी तो मेरी ना...

आज फिर भटक रहा / Aaj phir rahi bhatak rha

आज फिर भटक रहा मंजिल की तलाश में, अपनों की चाह में, सुख की प्यास में, दौलत की रास में, आज फिर बनके राही में हूँ भटक रहा, फिर सोंच वही रहा, फिर सपना वही रहा। राह फिर भटक रहा, फिर सपना वही रहा, मंजिल की आस में मैं राहगीर भटक रहा, एक अजीब कशिश जगी, अजब मजा रहा, चार दिन फिर जमकर मेघ बरस रहा। फिर वही सुखा आया आँसु ही छाया रहा, दुनिया के दर्द से क्या, खुद से में गीर रहा, आज फिर राही बनकर पथ को चुन रहा, आज फिर नई राह है नई सोंच चली आज। आज सब नया है फिर भी फिसल रहा, जहाँ से चला था में वहीं पहुँच रहा, आज फिर भटका राही मन डगर से भटक रहा, किसी ने चढाया बढ़ाई से किसी ने डकेला कढ़ाई में। सब ने गढ्ढे खोद दिये, सब आस जता दी, पर आस से कोई रास नहीं, मन तो पगला रहा, मंजिल का पता नहीं क्यों राही चला जा रहा, क्यों राही झुठी राह में पथ-पथ भटक रहा, आज फिर राही भटक रहा।। -कवितारानी। 

मंजिल की तलाश में / Manjil ki talash mein

मंजिल की तलाश में मंजिल की तलाश में आज फिर डगर-डगर। आज फिर द्वार-द्वार ढुँढ रहा मंजिल अपनी। जिन्दगी की राह में कठिनाईयों की राह में। फिर रहा मगर-मगर आज भी मिली नहीं मंजिल। हर जगह ठहर-ठहर पुँछ रहा पता मगर। भटका रहा राहगीर मुझे फिर कैसे मिले मंजिल। हर जगह लुट है हर जगह है धोखा। जो दे रहा राही को मंजिल का टोटा। मिले किसे इस झुठे संसार में मंजिल यहाँ। कलयुग का है काल बङा भटका राही राह का। मंजिल की तलाश छोङ दी किसी ने। मंजिल की राह मोङ दी किसी ने। मंजिल को लुट लिया किसी ने दलाली छेङ। हर कोई जाना चाह रहा इस ऊँची इमारत पर। पैसों के ढेर हो जहाँ आलस का आसमां। धरती को पुछता नहीं  आकाश में हो पैर जहाँ। गरीबों की सोंचता ना जन्तुओं की जहाँ। ऐसी मंजिल है आम यहाँ, फिर भी। मंजिल की तलाश में मंजिल वाला। घुम रहा डगर-डगर, द्वार-द्वार अन्त नहीं। इस राह का कौन, कौनसी है ये मंजिल पता कहाँ।। -कवितारानी।

अकेला हूँ/ Akela hun

  अकेला हूँ आज मैं फिर अकेला हूँ इस डगर पर, आज फिर अकेला हूँ इस सफर मैं, मैं आज फिर अकेला हूँ इस स्वप्न लोक में, हाँ मैं तो अब भी अकेला हूँ समाज में। क्यों मैं अकेला हूँ नहीं जानता में ये, पर पहले भी तो अकेला था फिर आज क्यों, पहले भी तो तन्हाई थी साथ बस मेरे, पहले भी तो अकेले ही देखे थे सपने मैंने। पहले भी तो सब से रसवाई थी, फिर आज कैसे अकेला मैं तो बरसों से अकेला, ढुँढ रहा हमसफर आज भी आज भी तलाश है, आज भी कोई वफादार मिले ईमानदार मिले। प्यार का प्यासा तो पहले भी था, आज भी क्यों प्यास है, पहले भी जिन्दगी कठिन थी आज भी है, इस स्वप्न लोक-मृत्यु लोक में कौन अकेला नहीं है, पर जिन्दगी में तो सबके पास कोई साथी है। फिर मैं क्यो अकेला हूँ, मैं तो आज भी अकेला हूँ, कोई था चाहने वाला जिसने पैदा किया, उसे भी तुने छिन लिया, क्यों मुझे अकेला किया, अब तो कोई मिला दे जो तन्हाई मिटा दे क्योंकि, मैं आज भी अकेला हूँ, इस जीवन पथ पर अकेला हूँ।। -कवितारानी।

अगर सपने सच होते / Agar sapne sach hote

  अगर सपने सच होते अगर सपने सच होते तो कौन भगवान को पुछता, सब सपनों में ही सहते कोई नहीं जगाता। अगर सपने सच होते ते कौन काम करता, कौन मेहनत की रोटी कमाता। कौन पढ़ाई करता सब बीना पढ़े पास होते, कौन किसी से पुछता सब सपने देखते। कोई अपनी नौकरी का, तो कोई अपनी शादी का, कोई अपनी आजादी का, तो कोई अपनी प्रेमिका का, तो कोई  स्वर्ग का। अगर सपने सच होते तो कौन दुनिया में रहता, तब तो सब स्वप्न लोक से ही काम चलाते। ्गर सपने सच होते ते सब निष्कर्म में, आलस से भरे मद के प्याले होते। अगर सपने सच होते तो ये लोक एक आश्चर्य लोक दुष्कर्मों से भरा होता। अगर सपने सच होते तो, ना मैं होता, ना तुम होते, जो होते सब सपने होते। इसलिए सपने कभी सच नहीं होते।। -कवितारानी।

काश / kash

काश काश कोई मेरा भी अपना होता, काश सब भुल जाता कभी याद नही रख पाता। काश मैं कुछ समझ पाता, काश जो मन चाहता वो पा जाता। काश ऐसा हो जाता काश सच हो जाता, हर सपने को में सच कर पाता। काश जो में मांगता वो मुझे मिल जाता, काश सपने ना देखता जो देखता लौकिक होता। काश खुद से सर्माता, सब बता जाता, काश जिसे प्यार करता उसे बोल पाता। इजहार करताचाहे सकारात्मक जवाब ना आता, काश अपनी दुनिया अपनी मर्जी से जी जाता। काश हमेशा मन की कर पाता, मैं जो लिखता, जो कहता उसी के कर जाता। काश मैं कभी झुठ ना बोलता, सत्य पर ही दुनिया जी जाता। काश सबको अपना गहरा दोस्त बना पाता, काश किसी के भी मन को पढ़ पाता। काश मैं इस दुनिया मैं ना आता तो ये सारे गम ना पाता, इस काश को अपना साथी ना बनाता। तो इस संसार को जी जाता... -कवितारानी।

suni part-6 samajik jivan / सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन

  सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन सुनी सुनाई बात थी, कुछ साथ की बिसात थी, मिजाज ही कुछ ऐसा था उसका, मिले जिसे मन हर ले उसका। बातों के फटकारे करती, चिढ़ाये कोई ललकारे करती, अब डरती नहीं पहले सी वो, मुहँ पर कहती जो कहनी थी वो। सुनना किसी का आता नहीं, काम कोई रुक पाता नहीं, सबकी सुनती करती मन की, पर मन में डरती रहती मन ही। ग्याहरवीं में प्रवेश किया, विज्ञान संकाय को ही लिया, अच्छे अंक अच्छा भविष्य सोंचा, ध्यान लगाया तो किसी ने ना टोका। रोज पढ़ती अपनी धुन में, कमरा मिला अपने गुन में, मस्ती भी करती लङती भी थी, पर पढ़ाई के समय पढ़ती ही थी। समाज का अलग नजरिया, पुछे हरदम कहाँ साँवरिया, सुनके सुनी होती बावरी, अपने राग में गाती साँवरी। बोल कई बार कङवे करती, जो चिढ़ाये उसी से लङती, बुराई का घुंघट अब बढ़ रहा, चेहरे पर गुस्सा अब बढ़ रहा। बैठ अकेले खुब रोती, माँ बाप को भी कोसा करती, दुल्हे को नफरत से नापती, चेहरे को छुपाती और भागती। शाँत चेहरा अब उदास सा, हॅसता मुखङा बिन उजास सा, कुछ रोनक खिलने से पहले खोई, किस्मत कैसी सोंच के रोई। संध्या बंध्या बन चौखट देखती, छत पर जाकर क्षितिज देखती, नयनों से सपनें बर...

हाँ बीमार हूँ / han bimar hun

  हाँ बीमार हूँ कलयुग का अन्धकार है, झुठ का प्रकाश है। बेईमानी की हवा चली, दोखों का संसार है। समाज कह रहा है हाँ मैं बीमार हूँ। खुद से ही लाचार हूँ अपनों से बीमार हूँ। मानव मेें विध्यमान हूँ हर जगह से परेशान हूँ। हर वक्त झुठ की खाँसी चली फिर कमजेरी की बुखार है। लाचार का ईमान हूँ खुद ही खुद से बीमार हूँ। मानव ने मुझे बनाया है इसी ने मुझे सङाया है। इसी से आज लाचार हूँ मैं तो बीमार हूँ। हर तरफ गंदगी ही हर तरफ प्रदुषण दिया। मैंने ही तो वनों का नाश किया तभी तो मैं बीमार हूँ। घुसखोर का घुसा मीला चोरी डकेती ने चीरा। अब तो एक कंकाल हूँ हाँ मैं ते बीमार हूँ। पैसों का जो जादू चला लक्ष्मी जी को भी नहीं क्षमा। अरे भगवान तो है कहाँ सब पोसे का जो जाल है। इस अत्याचार में कौन सुखी इस संसार में। मैं तो ेक समाज हूँ मुझसे ही तो मैं बीमार हूँ। हाँ मैं ही तो बीमार हूँ दवा दारु तो चल रहे पर ये भी। कहाँ खल रहे िसे भी मैं बीमार हूँ हाँ मैं इन्सान हूँ। हाँ मैं समाज हूँ, मैं तो बीमार हूँ।। -कवितारानी।

हाँ मैनें प्यार किया / ha mene pyar kiya

हाँ मैनें प्यार किया हाँ मैंने प्यार किया तेरा इंतजार किया। हर पल तुझको याद किया तेरा एतबार किया। हाँ मैंने प्यार किया तुझको अपना मान लिया। जाने कब से ये हुआ मेरा तो चैन गया जब से ये हुआ। जीने की उम्मीद छोङ दी हर पल तेरी याद थी। एक पल देखने को मेरी हर उम्मीद थी। आँखो को तेरा इंतजार था दिल तो बङा बेकरार था। मुझको हर वक्त तेरा इंतजार था जब से ये प्यार था। कहने को ये बेकरार था पर जाने ये क्या हुआ। हर बार मुँह ना खुला और दिल बैठ गया। जब तुम आये सामने मैं तो खुद में ना रहा। अरे मुझे ये क्या हुआ तुझे खोने का डर रहा। पर मैंने तुझे खो दिया भुला पर भुला ना सका। हर बार तु ही याद रहा हाँ मैंने भी प्यार किया है। पता है तुम भी प्यार में हो परये तो संसार है। तुम ना कहोगे मुझे मैं ना कह सका तुझे क्या यही प्यार है। पर अब भी मुझे तेरा इंतजार है हाँ मुझे तो प्यार है। ख्वाब के पुल मैंने बनाये है सपनों का महल सजाया है। पर ये एक सपना है पर यही तो मेरा अपना है। इन सपनों के सहारे ही मैं कह सकता हूँ। हाँ मैंने प्यार किया बस तेरा इंतजार किया। हाँ हर बार बस तुझे याद किया बस तेरा एतबार किया।। -कवितारानी। 

मेरी तन्हाई / meri tanhai

मेरी तन्हाई अक्सर ये बेवक्त आई, कभी भीङ में तो कभी अकेले में आई। कभी आँसु लाई कभी बनकर गम समायी, हाँ ये मेरी तन्हाई ठेरों सवाल लाई।। ये रिश्तों से आई नहीं ये अजनबीयों से आई, ये तो दोस्तों से आई ये तो पहचान से आई। नहीं ये तो मेरे दिल से आई, ये मेरी तन्हाई अनेक उलझने लाई।। ये क्यों आई क्यों मुझको बहकाये, ये तो नई मंजिल दिखाये नई डगर है लाई। अरे ये तो पथ भ्रमित करने आई, मेरी तन्हाई मुझको हर वक्त उकसाये।। अरे ये तो आँखों से दिल में आई, अरे ये तो बातों से भी दिल में आई। नहीं ये तो कानों से दिल में आई, ये मेरी तन्हाई दिल के रोग है लाई।। हजारों दर्द ले के चली आई, दिल में गमों की बारात लेकर आई। कभी रुसवाई कभी राजी बनकर आई, हाँ ये मेरी तन्हाई दिल की गहराई लाई।। हाँ ये मेरी तन्हाई हर पल नई राह लाई, कभी गम-कभी खुशी से चमक लाई ये तन्हाई।। -कवितारानी।

दर्द के साये / dard ke saye

दर्द  के  साये हर वक्त मेरे दिल में आये। कुछ सपने तोङ लाये कुछ दिल तोङ आये। जब भी आये मुझे तङपाये। यही है मेरे दर्द के साये।। कभी बनकर दोस्त मुस्काये, कभी दिल ये समाये गम लाये। कभी आँखों से आये, और कभी खामोशी से निकल आये। ये मेरे है गम के साये, जो हर एकान्त में मुझे तङपाये। कभी रिश्तों से आये अपनों से लाये। तो कभी खुद से घबराये। पर जब भी आये मुझे भिगाये। ये मेरे गम के साये, क्यों मुझे तङपाये। हर साये से मुझे डराये, कभी अँधेरों मे ले जाये। कभी मुझको सताये कभी मुझको तङपाये। मेरे गम के साये हर वक्त मेरे दिल में आये। ये मेरे दर्द के साये। -कवितारानी।

आसरा / Aasra

आसरा आसरा है गम का मन मेरा। आसरा है दर्द का तङप का मन मेरा। आसरा है चाहतों का, सपनों का मन मेरा। आसरा है दिल से चाहने वालों का माँ का मन मेरा। इस आसरे से जुङी है कहानियाँ कई। कई ऊतार जढ़ाव अनुभवों का आसरा है मन मेरा। जिन्दगी गमों से भरी है पर गमों से भरा है आसरा मन मेरा। आसरा है आँसुओं का दुखों का यहां। आसरा है चाहतों का जो मिला कभी मन मेरा। कहते हैं सपने कम देखने चाहिए पर सपनों का है आसरा मेरा। कहते हैं दिल से कम सोंचना चाहिए पर दिल में ही तो है आसरा मेरा। आसरा है पल भर कि खुश नशीबी का मन मेरा। आसरा है ढुँढती खुशियों के संसार का मन मेरा। आसरा है नई आस का मन मेरा। क्या गजब का आसरा है मन मेरा। क्या बावरा है मन मेरा। -कवितारानी।

अँधेरे कोने / Andhere kone

अँधेरे कोने इन अँधेरे कोने से किसे मिलाऊँ। बहती अँधियों को किसे दिखाऊँ। मन को कुछ समझ नहीं। भर आ गया बस यूँ ही। इस भरे मन का बोझ बताऊँ किसे। बंद कमरे में बह जाऊँ सुनाऊँ किसे। रहता नहीं काबु खुद पर ऐसे में। कहना चाहता हूँ सब कुछ कहूँ किसे। सफलता के द्वार खङा ना अंदर ना बाहर। डर का मकान है खुला आसमां छोर बेघर। किस ओर जाना होगा संशय हर पल। देख रहा खिंच ले कोई की बह जाये कल। खुशियों की घङी में बह बह जाऊँ मैं। सफलता के मार्ग पर मुस्कुराऊँ मैं। डर का कोई मुकाम ना हो बस इतना है। कोई मेरा अपना और मन का हो सपना है। अँधेरे कोनो में हाथ कोई आये भी। बहती अँखियों को पोंछ जाये भी। बैठ अकेले संभाले था खुद को बताऊँ ये। इन अँधेरे कोनो से मिलाऊँ किसे। बहती अँखियो को दिखाऊँ किसे ।। -कवितारानी।

भारत की नारी / Bharat ki nari

 भारत की नारी अक्सर किस्से कहानियों में सुनाते सब हैरानी। कभी सिस काटती हाङी कभी मर्दानी झाँसी वाली रानी। कितने किस्से कहानियों की बात कहूँ याद है मुझे वो जुबानी। हकीकत मन से बयां, कैसी है भारत की रानी। आँचल में दुध आँखों में पानी, कौमल है भारत की नारी।। बखान जग में हिम्मत का कोई नहीं शामी। थर-थर कांपे शैतान रुप बने जब काली। हथियार हाथ महान होती वो शक्ति कल्याणी। अपने दम पर सार करे संभाल करे भारत की नारी। आँचल में दुध आँखों में पानी गजब है नारी तेरी कहानी।। दो घर अनन्त हाथ, मुख तुझे ताकते। बिन बोले परोक्ष, प्रत्यक्ष तुझे निहारते। आधार घर की बुनियाद, मजबुत करती तुम। अर्थ, धर्म, समन्वय सब का करती तुम। देख शक्ति अतुलित अचंभा होता होती हैरानी। आँचल मैं दुध आँखों में पानी भारत की तुम नारी।। कोमलता, सजागता, सहन सीमा की सार हो। मधुरता, सुंदरता, रस की खान हो। देव, दानव सब की विजेता हो। तेरे दंभ की सुनी मैंने भी कई कहानी। आँचल में दुध आँखों में पानी भारत की तुम नारी।। -कवितारानी।

डर भी है / darr bhi hai

  डर भी है परिवर्तन की लहर में डर भी है। हवा, पानी, जीवन की बदल में डर भी है। कैसे होंगे दिन अकेले एकान्त के। धोरों वाली मिट्टी में होंगे कैसे खैल वे। कब जाके सुकून मिलेगा मेरे लहजे को। प्यास अधुरी कब मिटेगी, कब जाके शांत होगा चित्त मेरा ये। परिवर्तन की लहर में डर भी है। बदलने को जमीन मन निडर भी है। जाने को जहान तैय्यार हूँ मैं। अपने हिसाब से जीने को तैय्यार हूँ मैं। तैय्यार हूँ कि अब अकेले हाथ मजबुत है। करना है बहुत कुछ उससे तैय्यार हूँ। परिवर्तन की लहर में डर भी है। आगे जाने से पहले म मैं डर भी है। किसी का साथ पाने को डर भी है। किसी का साथ ना मिलने से डर भी है। परिवर्तन की लहर में डर भी है।। -कवितारानी।

बाल मनुहार / bal manuhar

 बाल मनुहार नटखट नादान रंग रहता हर वार। स्कुल जाते पाते रहते हम बाल मनुहार। बात वात हमेशा होती, कुछ ही बस सार। हाथ दात मधुर साथ मेरा बाल मनुहार। कभी मंद-मंद, कभी रन्ध्र-रन्ध्र होती धार। मन उल्लास, तन आलास पर चलती रहती बाल मनुहार। पास रहे मेरे साथ रहे हमेशा सबका प्यार। मन भरु खुलकर जिऊ मिला जो भी बालल मनुहार। कसौटी समय रोकता रहता करता मुझसे लार। कर हुलार अपने अनुसार जीता में बाल मनुहार। कौन कपट मन कहता भरता आह हर बार। बिछुङन की आहट होये जो बाल मनुहार। बाल मनुहार उल्लास हर बार। प्यार हर बार बाल मनुहार।। -कवितारानी।

नया जमाना है / naya jamana hahi

  नया जमाना है  ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ने उठने पढ़ने, ये प्रगति मोढ़ का जमाना है। दिखावे के साथी आते, गाते मन से मन बहकाते। लाते सपने बनते अपने, ये दिखावे का जमाना है। ये आजमाने का जमाना है, स्वार्थ ही सब माना है। सिध्द अपने काम ही, मिलने का ये बहाना है। ये निज का बहाना है, हर मोङ पर गाना है। आगे बढ़ने को दुसरे को गिराने का जमाना है। हित का बहाना है, ये नजदिक ही आना है। प्रेम पथ सब गाते आते, मन को समझाना है। ये लत का माना है, ये निज का जमाना है। ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ते स्वार्थ रोह पे, ये होङ मोङ का जमाना है।। -कवितारानी।

कली हूँ मैं / kali hun main

कली हूँ मैं आज रो दी मैं तेरी फटकार से, रोक ना पाई आँसु तेरी डाट से,  खता हुई तो समझाना था, मेरी गलतियों को देना सहारा था, फिर से खिलकर की में महक उठती, कली थी मैं कि फिर चहक उठती, इतना ना दबाव डाल, ऐ माली मेरे ना दाव डाल, मैं सीधी साधी बढ़ती हूँ, तु भी जानता है मैं बनती बीगङती है, कोई हवा का झोंका हिलाता है, कोई शीत लहर बुलाती है, मैं जाती कहाँ तेरी बगीया से, पानी ना ज्यादा डाल, ना खाद से जला ज्यादा, खाद डाल की सह सकुं, काट- छांक की बढ़ सकुं, सुन्दर उपवन जो मैं खिलुंगी, तेरे आँगन की शान बनुँगी, रुक जा थोङा की आगे बढ़ सकुं, कली हूँ मैं तोङ ना की फुल बनुँगी, कली हूँ मैं कि फिर खिलुँगी। -कवितारानी।

सब शांत है /sab shant hai

  सब शांत है गलियारा था बगीया थी, शांत दोपहर पाठशाला थी। महकती बहकती आली थी, नम आँखे थी कपोल भी। कैसे भावुकता का सागर बहता, देखा कैसे आँगन था रोता। देख रहे नव युवती युवक भी, कह रहे अक्ल विदुषक भी। समझ रहा एकान्त अन्तर्मन,  रोकुं कैसे बहता मन। ना अंत दिखे अन्तर्ध्यान हुआ, बहते नयनों मे सब सार हुआ। कौन समझे खता हुई, माफ करदो मैं पापी ही। दुर तलक उजियारा है, मति भ्रम बस अँधियारा है। नहीं दिखा नम भावी भाग था, भुल हुई विकराल रुप था। बीत गया अब याद है, दिन गया सब शांत है। बीत गया सब शांत है। भूल गई सब शांत है।। -कवितारानी।

नित निरंतर आहट / nit nirantra aahat

 नित निरंतर आहट नित निरंमित भौर ऊठूँ। स्नान, माँग पठन करुँ। पाठन कार्य रोज सवेरे। बोलते करते शाम को ढेरे। शाम आम मन भिगोति। खान पान कर रात होती। निशा नाश किताबें पढ़कर। नित निरंतर उठकर पढ़कर। कटते रह रहे दिन मेरे। अपने मार्ग अपना काटे। हम भये मुर्ख सपने बाटें। मन बहलाये रोज बातें। लोग कहे कर्म के भाटे। कर्म कठोर खुशी अपार। रोज लङते बढ़ते पढ़ते पार। कहे किससे किस्से सार। शाम को बेठते होकर हार। अपने मन की बात कहूँ तो। थका नहीं पर कब तक ही। चलना है मुझको भाता। पर मनका अँधेरा सहा ना जाता। कौन भौर याद ना दिलाती। खा गई बैरी प्यार की बाती। जलता रहता मन दिया सा। कहना नहीं हाल जिया का। नित नियमित दिन ढलते। कितने सपने बनते बिगङते। खुशी किसी की मन चढ़ती। पल भर से ज्यादा आस ना बढ़ती। सांस थमे जब कोई पलटे। दिल के पन्ने नम करते। नित नियमित संघर्ष रत। खुद से लङता रहता रत। शीत गलन मुझको भावे। कठिन निद्रा अब ना आवे। ध्यान भंग अब अंग जलन। खो गई जीने मरने की लगन। मन मस्त जब भीङ गावे। उलझे जग में चैन पाये। पलटी हवा अब मन नहीं। कट जाये जीवन जल्दी अब। आस नहीं अच्छा होने की अब। सब रद्द सब रत कुछ नहीं। ढल...

vidai / विदाई

 विदाई ये वक्त विदा, ये जज्बात विदा। जो जिये साथ थे बच्चे हो रहे विदा,  जिनके साथ था किया काम वो गुरुजी हो रहे विदा। ये विदाई की घङियाँ है, ये भावनाओं का ज्वार है। ये दिन दुख का है, ये पल दुख का है। मेरे मुख मंडल पर निशान है, मेरी आँखों में आँसु है। मेरे मन में पीङा, और स्मृति में बस यादें हैं। मैं भाव व्यक्त करुँ कैसे, मैं अपने दिल को हरुँ कैसे। मैं समझाऊँ मन को ये कैसे, मैं इस पल को चाहूँ कैसे। कैसे में ये आलाप करुँ, जब मन से बस विलाप करुँ। मैं कैसे आप सब को विदा करुँ, मैं कैसे आप को विदा करुँ।। दिल से दर्द बयां करता हूँ, मैं रोती आँखों से ही कहता हूँ। आप सदा रहे दिल में मेरे, आप सदा रहेंगे दिल में मेरे। में मन से आप को विदा करुँ, आपके शुभ मंगल के गान करुँ। मैं मन से आप को विदा करुँ, मैं मन से आपके गुणगान करुँ।। हॅसमुख आप सब, गुणवान आप सब, रहे खुशहाल सदा। महानता के आचरण लिए, मन में गुरुओं का सम्मान लिए, रहे आप आबाद सदा। ज्ञान का सागर समेट, दुखो-कष्टों को मेट, आप करें कुल का नाम सदा। मैं करुँ विदा दिन ये, ना आप करना मन से कभी विदा।। आदरणीय का भाव करुँ मैं, गुरुवर से रहे आप। ह...

मन मेरा माने ना / man mera mane na

  मन मेरा माने ना रुठा नहीं किसी से अब। याद नहीं आती है। अकेले में फिर क्यों आँख भर आती है। कैसे कहुँ हाल कोई जाने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। ख्वाहिशें हो अधुरी तो पुरा करने जाऊँ। मन से रोऊँ और मुस्कुराऊँ। हालात दिल के कोई जाने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। कहता फिरे जग को की कौन अपना है। भरे दिल से मिलते सब सपना है। दिल को भाये वो अपना माने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। लगता है हवाएँ खिलाफ है मेरे। भाग में पल भर की खुशियाँ है मेरे। कोई अपना दिल से खुशियाँ जाने ना। मेरा मन अकेला माने ना।। खुब कहा है कहने वाले एकान्त ने। जी लो ऊपर से, अंदर ना जाना किसी के। तुम बुरे जग ओर बुरा कौन किसी की माने है। मेरा मन अकेला माने ना। हाल अपना माने ना। मेरा अकेला माने ना।। कवितारानी।

हवायें बहने लगी है / havayen bahane lagi hai

हवायें बहने लगी है हवाएँ बहने लगी है। लगता मौसम करवट ले रहा है। अजब सी खमौशी छाने लगी। लगता है बरसात होने वाली है। बादल कम है आसमान पर। मौसम जाने कैसे सता रहा है। हाल ऐ दिल मुश्किल है समझना। अहसास बदलने लगा है। कोई आके हाल पुछ ले बस। बैठे पास मन की सुन ले बस। कहता रहुँ शाम तक अपनी ही। कोई आके समझ ले बस। आज रोना नहीं, पर शीत भी नहीं है। गर्मी का आलम नहीं ना शीत गई है। जाने कैसे इस मौसम ने करवट ली है। हवाएँ बहने लगी है।। -कवितारानी।

रुक जा रहा / ruk ja jaraa

रुक जा रहा रुक जा जरा... साँस ले लुँ मैं, रुक जा जरा, साँस ले लुँ मैं... थक गया हूँ, चलते-चलते, थक गया हूँ, चलते-चलते है। रुक जा जरा, साँस ले लूँ मैं। तु तेज बङा, जा रहा हूँ, गति तेरी, बहुत तेज है, देखुँ कहाँ, की कोई छोर नहीं, मन का पंछी, टिके ठोर नहीं, बन चकोर, उङता फिरुँ, जग में अपने, ठहरुँ कहाँ, रुक जा जरा, साँस ले लुँ मैं, रुक जा जरा, साँस ले लूँ मैं। इस बार तु, मान ले मेरी,  कहता है मन मेरा, सुन ले जरा, दो पल की, रुक जा जरा, साँस ले लूँ मैं। ऐ मनवा तु धैरी, माने नहीं मेरी, सुनता नहीं मेरी, सुनता नहीं कभी, करता नहीं कभी, करता है बस मन की। रुक जा जरा, साँस ले लु मैं, रुक जा जरा, साँस ले लुँ मैं, थक गया हूँ, ठहर जाऊँ मैं, रुक जा जरा, रुक जाना। कभी-कभी मन मैं, प्रश्न हो ये मन मैं, मेरे मन में तु होवे, आये कहीं से हवा, हवा सिहर करें। कह दुँ तुझे, मन दुँ तुझे, मन का मैल हरे, रुक जा जरा, मन मेरे, रुक जा जरा, मन मेरे, कुछ देर देर तो मैं, साँस ले लु मैं, रुक जा जरा, कुछ देर रुक जा, रुक था वक्त के, वक्त के साये में, रुक जा जरा, साँस ले लु मैं, रुक जा जरा, रुक जा जरा।। -कवितारानी।

मन की ठेस / man ki thes

मन की ठेस भीङ-भाङ, ताङ-ताङ, बार-बार, लगातार, बिना सार, हार-हार, मार-मार, मनका सार, हुआ तार-तार, छोर कहीं, नहीं ठोर कहीं, अहसास नहीं, मन में बात नहीं, चल रहा, बार-बार, हर बार, उठ खङा हुआ, यहीं पङा हुआ, इस बार, कभी उस बार, बिना सार, मैं कह रहा, मन की लैस, मन की ठेस, मन की ठेस, मन की ठेस।। -कवितारानी।

अधुरा / Adhura

  अधुरा अधुरा था मैं अधुरा ही रहा। पाकर एक आसमां को धुल बना। ना जमीन से अंकुरित हुआ। ना सार जीवन का बना।। जमीन में दफ्न आधा नम पङा हुआ। खिलने को अभी भी जमीन में पङा हुआ। कब वो बरसात होगी। रहमत खुदा की प्यास होगी। जाने कब बनेगा तराना मेरा। जाने कब प्यार की बात होगी। सुकुन उर आराम होगा। मन का मन से साथ होगा। जो देखुँगा मुस्कान संग ही। जहाँ चाहुँगा मन उमंग ही। अहसास प्यार का हर तंरग में होगा। जब दिल होगा मौज का आसमां होगा। अधुरा था मैं अधुरा रहा। कहा क्या, क्या रह गया। पहले से शुरु हुआ। पहले पे ही खत्म हुआ। अधुरा था मैं, अधुरा ही रहा। खुद को खोजता हूँ मैं कहाँ होगा। अधुरा था, अधुरा ही रहा।। -कवितारानी।

ऐ आसमां झुक जा जरा / e aasman jhuk ja jara

ऐ आसमां झुक जा जरा मेरा मुझमें रहा क्या। जो भीङ में रहूँ अकेला मैं। मेरा मुझमें रहा क्या। जो अँधेरे में घुटता रहूँ मैं।। ऐ आसमां जरा झुक भी जा। नमी से तर हो जाऊँ मैं।। सुखा पङा है उपवन मेरा। बंसत सुनहरी पाऊँ मैं।। मेरी जमीन दरारों भरी। रेत की आँधियाँ ही बन जाऊँ मैं।। ऐ आसमां झुक जा जरा। अनन्त सा खो जाऊँ मैं।। तु भी खुब मजे करता है। दुर खङा मुझे तकता है।। कहना नहीं तुझसे कुछ । चादर मुझपे बन जा जरा।। मेरा मुझमें रहा नहीं। जो भीङ में रहूँ अकेला मैं।। पुरा भी होना पाऊँगा। रह गया अधुरा मैं।। पाकर जो खोया है। मुझे अब बचा नहीं है। ऐ आसमां झुक जरा। बह जाऊँ खुलकर मैं।। अन्तर्मन भी अकेला है। आसमां में कही ढेरा है।। तारों संग यारी है। सबकी अपनी बारी है।। तपन शीत अँधेरा घना। मैं खुद में बचा कहाँ।। फुल बगीया महक रहा। खुशबु खुद को आती कहाँ।। बह रहा हूँ नदियाँ सा। प्यास खुदकी बुझती कहाँ। चमक चाँदनी खुब है। पर चाँद है अँधेरे का यहाँ।। तपन हूँ रवि की मैं। पर ढण्डक मुझमें है कहाँ।। उङ रहा ठोर-ठोर जग में मैं। बेठोर हूँ भाता कुछ कहाँ। जाऊँ जहाँ लौट आता हूँ।। लहर हूँ जलधि नदी कहाँ। ऐ आसमां जरा झुक जा।। बाँ...

ले चल दुर कहीं / le chal dur kahin

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ले चल दुर कहीं ले जा दुर कहीं की अरमानों की ख्वाहिंशे है। सपनों की सेज से दुर कहीं पैमाईश है।। ले जा ख्वाब मेरे आँखो मे आ जाती नमी। खो जाता हूँ मैं, जो तु संग नहीं।। आजमाइश जिंदगी, कह दुँ कमी है तु ही। ना कल तु हुआ, ना आज भुला हूँ कहीं।। दबे अँधेरे कोने रहते हो तुम कहीं। आजमाशें आ जाती रहके यहीं।। ले जा दुर कहीं की अरमानों की ख्वाहिशें है। सपनों की सेज सजी दुर है आजमाइशें भी।। ले चल संग मुझे भाता नहीं जग कहीं। जीता हूँ रोज में जिंदा है तु मुझमें ही।। हाँ वो दिन फिर से आ जाते है मन मैं कभी। ना चाहते हुए भी रोक पाता हुँ मैं नहीं।। चल संग चल मेरे मैं कभी साथ छोङुगाँ नहीं। मेरा मकसद तुझे पाने को है तेरे दिल में बसना ही।। ना चाहूँ तेरी काया को काया में मेरा कुछ नहीं। सपनें हैं अपने हैं जोर है आजमाइशें भी।। चल संग चल मेरे सपनों की दुनिया है हसीन। आ चल संग मेरे अकेला हूँ रुका तुझमें ही।। ले जा दुर मुझे लगता है डर अँधेरे से कहीं। सपनों की सेज है ले चल दुर कहीं।। -कवितारानी।

हवायें खिलाफ / havayen khilaf

हवायें खिलाफ ऊपरी धुन था, था अपने लिहाफ। चलता रहा अकेला ही, हवायें थी खिलाफ। कभी मंद-मंद, कभी शौर-शौर। आती जाती कानों में खिंचती थी डोर। काया कंचन हुई-हुई शीत चुभन भी। चली जब शरद ऋत तो लगती थी टीस।। चलता रहता गलता रहता, रहता फिर बंद-बंद। थोङी तेज कभी-कभी मंद-मंद करती हवाएं तंज। रुकना था कभी सिखा नहीं चाहे रहूँ पुरा या हाॅफ। लगता था दुर्दिन है जैसे हो हवायें खिलाफ। अपने लिहाज अपने हिसाब खिंचता डोर चलता सख अपनी लाज। कि कोई ठेस नहीं, अब कोई पेंच नहीं रहता में अपने लिहाफ। मन में उठता बढ़ता रहता करके खुद से जिहाद। नजर उठाई पता चला हवायें ही थी मेरे खिलाफ। कभी ऋत मेरी स्थाई ना आई। ना एक निरंतर समय की परछाई। जाने कब किस घङी बीत गई एक मिसाज। चलते रहता, बढ़ते रहता थी भले हवायें खिलाफ। सोंचता ना कोसता ना था, दृढ़ किये अपने लिहाफ। चलता रहता, बढ़ता रहता चाहे थी कितनी हवायें खिलाफ। चाहे थी कितनी हवायें खिलाफ।। -कवितारानी।

एक त्योहार और गया / ek aor tyohar gya

एक त्योहार और गया गुजर गया त्योहार एक और। परवान ना चढ़ी पतंग मेरी। तरसता रह गया खुद में ही। साँस ना जुङी साँस से ही। कब से सोंचा था कल बेहतर होगा। आज नहीं हुआ चलो कल तो बेहतर होगा। हर कल में मेरी कल की उम्मीद बिगङी। आज की अधुरी जिन्दगी रह गयी। एक और त्योहार गया रह गयी साँसे अधुरी। आस तो टुटी थी रह गयी प्यास अधुरी। ऐसा तो कल भी था मेरा मन लगता ना था। लगती ना थी आस किसी से किसी से प्यार नहीं था। ना प्यार आज परवान है। जाने क्यों फिर से त्योहार कोरा रहा । गुजर गयी एक दिन की ओर जिन्दगी। गुजर गया त्योहार एक ओर। परवान ना चढुी पतंग मेरी।। -कवितारानी।

रब्बा मेरे लिख दे मेरी जिन्दगी / rabba mere likh de meri zindagi

रब्बा मेरे लिख दे मेरी जिन्दगी वो तेरी साँसे थी, वो थी तेरी गली। मैं तो तेरी राह था, मैं तो था ही तेरी गली। वो तू थी जो पहचानी नहीं, वो तू थी जो मानी नहीं, मेरा ईश्क रह गया, रह गयी मेरी आशिकी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी। ख्वाबो में... नींदो में... मेरी तकदीर की हो लकीर वही। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। हो आते जाते है ख्वाबो में मेरे कैसे रोकुं में। उन खयालो को रोकुं कैसे में। कैसे कह दुँ की बदल ही दी मैनें जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। वो तेरी आस थी की मैं चलता रहा। रुका ना पल इक, मैं बढ़ता रहा। कभी सोंचा ना थी की कोई होगी बेखुदी। की कभी होगी बारिस ओ बोखुदी मेरी जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे तकदीर मेरी। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। वो बातें ना लिखना, मुझे सताये हमेशा। उभर पाऊँ दर्द से कराहुँ सदा। लिखना ना तु, दोखे भरी दोस्ती। लिख देना भले, मुझे कोरे कागज सा ही। ओ रब्बा मेरे, लिखना तो सही। ओ रब्बा मेरे, लिख दे मेरी जिन्दगी।। जब भी बीते लम्हों में खो जाता है मैं। कांपता रुह तक सिहर ज...

कटी पतंग / kati patang

कटी पतंग कभी डील-डील, कभी खिंच-खिंच। कभी उङी-उङी, कभी कटी-कटी पतंग।। तंग पर तंग, कर हर पतंग भंग। चली गई दुर कहीं आखिर कार मेरी पतंग।। हवा हिलोर चढ़ाई थी होकर श्याम रंग। देख दुर अनन्त सार अब जा रही अनन्त मेरी पतंग।। कौन डोर दृढ़ दंश हुआ की हो गई भ्रंश। देखता रह गया कि जा रही मेरी कटी पतंग।। कर धार तार बङा भार चल पङी हवा रंज। उठा ठोर पंतग रोल उंमग हुई फिर से अंग।। कभी इस ओर, कभी उस ओर कर मुझको तंग। कि हवा वेग हुआ तेज चली जा रही दुर कहीं मेरी पंतग।। देख रण छोर ढिली ढोर बङा दी मैंने उङा दी मैंने उमंग। भेरी हुई जयकार हुई कि मैंने उङा दी कटी पतंग।। एक ओर गया दुजी ओर गया कर दिये गढ़ सब भंग। इस ओर दिखे उस ओर दिखे बह रही सब कटी पतंग।। वो श्वेत श्याम योध्दा साम चित्र सी आई भुजंग। कौन जार लेप आये कि कत्ल किया हुई कटी पंतग।। निराश नाश ना होकर हताश फिर उठा की सर पर जंग। इस ओर गई उस ओर कई जाती रही मेरी सब ओर फिर पतंग।। आज चली मनचली हवा संग नव उमंग संक्रांति संग। सिखा गई सिख कई कटती रहती है हर रोज कई कटी पतंग।। -कवितारानी।

भारत माता जननी है / bharat mata janani hai

भारत माता जननी है धधक-धधक जल रही अग्नि अवनि है। गौरवशाली भूमि ये भारत माता जननी है। करनी अपनी इस धरा को हर युग भरनी है। विश्व विधाता ज्ञान दाता भारत माता जननी है। अग्नि ज्वाला ज्योति हर कोने जग उतरनी है। ज्ञान सागर भारत भूमि हँस वाहिनी है। रस अमृत प्रेम, पताका शाँति की स्त्रोत स्विनि है। श्री शिरोधरा अमृतसार सी भारत माता तरंगिणी है। विधु वैभव निशा छाकर बढ़ती रहनी ही रहनी है। गौरवशाली भारत भूमि ज्ञान की जननी है। तमस् वयस् बहत् घटत बढ़ती जो वहनि है। ओज रोष हटत् रहत जो ज्वाला बननी जननी है। गौरवशाली भारत भूमि जल रही अ्ग्नि अवनि है। भारत माता भाग्य विधाता भारत भूमि जननी है।। -कवितारानी।

जागो ऐ देश के युवक / jago e desh ke yuvak

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जागो ऐ देश के युवक इस मिट्टी से उपजे, इसका गुणगान करो। जग भ्रम में ढुब रहा, जागो युवा ललकार करो। ललकार करो कि हिल जाये चट्टानों से इरादे वो। गाते रहते दिल्ली में टुकङे के इरादे लेकर जो। कोई जिन्ना आके फिर भारत का ना मान हरे। जागो ऐ भारत के युवक विनती हम आज करें।। ना केसरिया मटमैला हो ना हरा गायब होने दो। समझो चक्र कि किमत श्वेत का गुणगान करो। अँन्धकार फैला है सब ओर सोशल साइट नाम पर। गुणगान करो ज्ञान का ना किसी का अभिमान करो। जागो ऐ देश के युवक देश का तुम उध्दार करो। जो देखा सपना गाँधी, कलाम ने उसे तुम साकार करो।। सोया है आज तेरा, मन, मस्तिष्क निस्तेज है। बदलती करवटों में क्यों केवल दीवानगी है। दिवास्प्न से उठ जरा अपनी भारत माँ का नाम। बदलते परिवेश में विकास का पथ पान करो। जागो ऐ देश युवक देश का तुम नाम करो। ज्ञान ज्योत जलाकर खुद में देश का उध्दार करो।। वो भारत भाग्य विधाता उद्गार कर रहा। आज को सोंच रहा, आज को गा रहा। इस आज की, आँच से कल का स्वप्न साकार हो। बनती बिगङती बातों से खुद को करे आजाद हम। देश के उध्दार में हो भागीदार हम। जागो ऐ देश के युवा देश का उध्दार करो।। -कवितारानी।

ये भारत देश क्या चाहता है / Ye Bharat desh kya chahta hai

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ये भारत देश क्या चाहता है। युवा दिवस है ये 12 जनवरी का, भारत जन इसे मनाता है। युवाओं का जोश बढ़ाने वाला, युवा दिवस मुझे बहोत भाता है। जन प्रचलित जर में युवा क्या-क्या ना गाता है। पर भारत जन (लोगो) जानों ये भारत क्या चाहता है। ये भारत क्या चाहता है। देख हवा आज की क्या-क्या ना मन में उपजा है। बिन बारिस बह रहा, मन मेरा समझ ना पाता है। ना मिट्टी का रंग बदल पाये, आसमां वे साया है। फिर आज के युवा को, क्यों हरा, पीला भाया है। खङा तिरंगा सिर उठाके, ना मुझमें, तुझमें भेद करें। फिर क्यों गाय, बकरी को जग में हम भेंट करें। मोल करे देशभक्ति का किसको ये आता है। है भारत जन के युवा जानों ये भारत देश क्या चाहता है। ये भारत क्या चाहता है। ना तेरा, ना मेरा, ये देश है सबका जान लो। इस माटी की खुशबु में देशभक्ति को पहचान लो। माता है यो खिलाती है अन्न, फल हम सबको। पीते है निर्मल नीर नहीं भेद करती किसी को। फिर क्यों वन्दे गान करें, जयकार करे हम इसको। ऐ भारत जन जान लो हम जयकार करें इसको। यही इसको भाता है यही इसको भाता है। ऐ भारत ये समझ जाओ ये भारत यही चाहता है।। -कवितारानी।