फिर दुविधा / phir duvidha
फिर दुविधा अरमानों को सहरा सज रहा है फिर से। बात चली है मन की फिर कहीं से। पुछ रही पुरवाई कैसी रुत तुझे चाहिए बता। मन को शाँत करता उससे पहले ही फिर दुविधा।। अंश-कंश बन अभी मण्डंराये है मन मस्तिष्क पर। दंश-वंश बन अभी छाये है गहनतम उर पर। हर रहा हरियाली सुखी जमीन जो पर रास ना आया था। फिर दुविधा की चंचल मन का वही जाया था।। बैरी लू ने आधा अधुरा जला छोङा। विरह अग्नि ने भी अधमरा कर छोङा। थोङी शरारत और राहत की हुई सुविधा। मन की आवाज उलझी संगीत धुन फिर दुविधा।। नव दिन, नव रात्र, नव पहर रही रोज ही। हर दिन, हर शहर, हर दुपहर खोज रही सुकून ही। मस्तानें कुछ भूले भटके पूछ रहे क्या विधा। आज तेरे मन की बोल और मैं हुआ फिर दुविधा।। करता हूँ आज मन की कल ना मन रहा। पल-पल बदलता रुप ये क्या पता कल वो तन ना रहा। आ रहा देख मुझे दिख रही जीवन संग जिसे दुविधा। मैं निस्स्वार्थ तन-मन न्योछावर कहूँ क्या फिर दुविधा।। सब ईश्वर पर छोङ मन को तस्सली दे रहा। किसी को मन की कह मन बहला भी रहा। खो रहा है भावी भविष्य में कि कही तु ना साथ रहा। कहाँ रहूँगा बिन तेरे है यही मेरी दुविधा।। -कवितारानी।