वैभव भरी मंजिल की ओर / vaibhav bhari manjil ki aur
वैभव भरी मंजिल की ओर कहले ही तु चाहे कुछ भी मैं नहीं घबराऊँगा, कितनी ही तु अटकलें लगा दे मैं बढ़ता जाऊँगा। भेज हजारों अपने दुत में उनसे लङ जाऊँगा, रोक ना पायेंगे तेरे दुख के तीर में मैं घायल भी। बढ़ता जाऊँगा मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा, तुने तो हर राह पर कांटे बिछाए। तुने तो रास्ते ही बंद कर दिए, कर दिया अकेला मुझे इस राह पर। जाना कहाँ पता ना रहा मुझे ना हौंसला रहा था साथ, फिर भी आ पहुँचा यहाँ तक अब जाना है वहां तक। जहाँ की रह शाम सुहानी होगी, अनौखी दुनिया वहाँ की दिन होंगे मस्ती भरे। ओर रात होगी खुशी भरी, धन, वैभव, समद्धि सब होंगे सुख होगे सुख के साथ। और साथ हो अपनों का. प्यार होगा सब में इतना, जितना देखा ना किसी ने, मुझे पाना है उस जहाँ। को जहाँ मिले यह सब मुझको, अब ज्यादा दुर नहीं यह सपना, यहाँ सब है मेरा अपना। मैं आगे भी यही घबराऊँगा, मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा।। -कवितारानी।