यादें धुंधला रही है / yaadein dhundhla rhi hai
यादें धुंधला रही है सपने अधुरे रहने का डर सता रहा है। अपने से दुर होने का डर बढ़ा जा रहा है। दुनिया में अस्तित्व ना बनने से मन कुछ भुला रहा है। भूलता लम्हें, सजोएँ लम्हे धुँधला रहे हैं। यादें ताजा थी अब तक, अपने साथ थे अब तक। दुनिया रंग भरी थी अब तक, सपने सुहाने थे अब तक। पर अब यादें दूर जा रही है, अपने दूर जा रहे हैं। दुनियाँ बेरंग नजर आ रही है, सपने धुँधले हो गये हैं। यादें धुँधला रही है। जैसे घना कोहरा बढ़, दृश्य धुँध लाता है। जैसे घना धुँआ चहूँ और बढ़ता जा रहा हो। जैसे बादल जमीं पर आ गये हो। जैसे सबसे बहुत दूर आ गये हो, वैसे ही यादें धुँधला रही है। ये यादें धुँधला रही है। कितने अरसे बीते, कितने साल बिते। हर अरसे बरसे संजोयी जिन्हें, वो आज धुँधला रही है। अदृश्य ना हो जाए डर रहता है, कहीं मिट ना जाए यादें डरते हैं। फिर ना जी पायेंगे वो मित्र, फिर ना पायेंगे वो अपने इसी से डरते है। धुँधलाई यादें डराती है, धुँधलाए सपने डराते है। धुँधलाए जी ना पायेंगे, यादों को फिर दोहरायेंगे। करते रहेंगे याद उन्हें फिर ना धुँधलायेंगे, यादें धुँधलाई है।। -कवितारानी।