कहानी देवा की / kahani deva ki
कहानी देवा की अजब-गजब करता है कारनामें, अजब-गजब उसके किस्से कारनामें। सुनता नहीं किसी की बात, करता वही जो मन को आवे रास। सुनाता हूँ मैं कहानी एक पनवाने की, नहीं है जो किसी का गैर ऐसा दोस्त देवा। बातें रहती उसकी बङी-बङी, जिन्दगी रहती अधिकतर सपनों में पङी। अजब-अनौखे उसके खयाल ऐसा है ये रामदयाल, बात सुनों बचपन की जिसमें केवल पङाई ही उसके अङचन थी। करना दुनिया में ऐश इसीलिए बैंच डाली किताबें शेष, घरवालों ने लगाई फटकार पर कहा पङे इनकों- इनको कोई फर्क मेरे यार। बच्चों संग खैलना हर वक्त मौज-मस्ती से गुजर रहा था कि आ पङी इन पर गाज, माता-पिता ने छोङ दिया साथ। पर चलती रहती दुनिया दारी, मत तो केवल इनकी ही थी मारी। कमाने की उम्र हो चली पर खेलने से मन ही ना भरे, जोश-जोश में गये कमानें, दो दिन की कङी मेहनत। तिसरे दिन घर पर की लङाई ये काम भी इनको रास ना आया, शौक लगा गाये लाने का सपना बुना तबेला बनाने का, एक की दो और दो की चार करेंगे। दुध, दही, घी से अमीर बनेंगे पर सपने कहाँ सच होते उधार कर लाया गायें, इनकी भरपाई छठे दिन गायें रही ताक हाट, क्योंकि अब जरुरत थी मोबाईल लाने की। दो दिन ना चला दुध का व्यापा...