हारा हूँ मैं / hara hun main
हारा हूँ मैं हारा दर्द का मारा मैं लाचारा जाऊँ कहाँ। अपनों का मारा मैं बैचारा होकर बेसहारा जाऊँ कहाँ। दर्द से कराहता मन, बहती आँखे दिखाऊँ कहाँ। वक्त का मारा हालात का मारा जाऊँ कहाँ। खुद से परेशान दुनिया से नाराज जाऊँ कहाँ। गम भरे कई सारे इसे बतलाऊँ कहाँ। बेपर्दा होता तारतार होता मन दिखाऊँ कहाँ। बेइज्जती सहता बेईमान होता समझाऊँ कहाँ। शरण जो रण रही आश्रित तो श्रापित रही सुनाऊँ कहाँ। हारा दुख दर्द का मारा अब बेसहारा जाऊँ कहाँ। किल से चुबते ताने गहराते हॅसी के बाने दिखाऊँ कहाँ। नासमझ, पागल, कुत्ता, जानवर खुद को पाऊँ यहाँ। नौकर, हरामी, नीच खुद आये दिन सुनाऊँ यहाँ। टुकङो पर पलता दुसरों के फोकट खाता जनाऊँ यहाँ। वक्त का मारा गमों का सारा बोझ दिखाऊँ कहाँ। लेता कभी ईश्वर साथ कभी मुन्ना, मुनिया से करता बात। दर्द उनके महसुस करता आँसु उनके पुछता। पर खुद के आँसु दिखलाऊँ कहाँ। हारा दर्द का मारा में लाचारा जाऊँ कहाँ।। -कवितारानी।