सुनी भाग-7 महाविध्यालय/ suni part-7 college life
सुनी भाग-7 महाविध्यालय थी जिद की आगे बढ़ना, बस इसी मुद्दे पर नहीं लङना, किस्मत का कुछ साथ रहा, जीवन महाविध्यालय में आगे बढ़ा। अब साझँ छोङ भौर को पाई, गाँव से निकल वो मुस्कुराई, शहरी जीवन के साथ बढ़ी, मन लगाकर खुब पङी। साथ अब परिवार था, पापा का कुछ खयाल था, संभाल के अपने योवन को, काॅलेज जाती वो पढ़ने को। विज्ञान संकाय से अध्ययनरत्, अपनी मस्ती में रहती मस्त, सहेलियों के साथ घुमना-फिरना, सादा जीवन उच्च विचार रखना। अपने बनाये नियमों पर चलती, किराये के मकान मे रहा करती, गाँव के वो मालिक पढे़ लिखे, बेटी सी रखते घुले-मिले। खर्चे को मिलते सीमित पैसे, कम खर्च में भी मिलते चर्चे, कक्षा में सबसे आगे होती, जवाब देना प्रश्न करना आगे रहती। कभी-कभार सुनेपन में, याद करती बचपन योवन में, फिर याद बाल विवाह की आती, रोकर शाँत होकर पढ़ने लग जाती। खुद बनाना अपना खाना, रोज अकेले काॅलेज जाना, लङकों से भी दोस्ती निभाना, लङकियों में धोंक जमाना। मस्त मगन सी खुब हॅसती, भुल बचपन खुब पढ़ती, शिकायतें ना थी कुछ भी, पास हुई प्रथम वर्ष भी। छुट्टियों में गाँव जाना, लङके वालों के रोज बहाना, सोंचती रहती कब काॅलेज जाऊ...