अहं / aham / Ego
अहं नव सृजन, नव जीवन सी, निकली वो कपोल पुल्कित सी। तरुवर तर करता, जल, थल पोषण करता। सिंचित, सृजित थी वो डाल, हुई मजबुत वृक्ष आधार। पक्षी घोंसले आ बनाते, शाखामृग से जीव उलझते फांदते। छाँव राही को देने लगी, फल-फुल से लदने लगी। जो देखे करने लगा बखान, ये डाली है सबसे महान। अहं भाव से आहत् हूई, या भूल गई की है मुल कहीं। तरुवर को ताक करती, अब अपने आप से लङती। तरुवर अब जर्जर सा, पर पोषित करता रहा शाखा। कुछ दिमक कुछ जग ने खाया, उम्र के साथ वक्त से टकराया। कहता उसे पर मोल नहीं, शाखा ऊपर और दंभ कई। लाचार पेङ अपने को तकता, ना पल्लव ना फल किसे हरता। अपनी मूल से अपना गुजारा, शाखा को अभी भी देता सहारा। महान कौन जग भ्रमित, डाली को गाने लगे कहते उसका हित। जग को फल से था मतलब, छाँव मिलती और सुंगध। एक दिन तना दिखा, अपने मतलब मे दिया हटा। अब तने का महत्व हुआ, शाखा सुखी गिरी पङी। पत्ते-सारे बिखरे-बिखरे, नव जीवन को शाखा तरसे। कब अब बरखा हो, कब उसे जीवन हो। यही अहं का अंत हुआ, डाली हारी पेङ विजयी हूआ।। -कवितारानी।