धोबी का कुता / ghar ka kuta/ besahara
धोबी का कुता रोटी खाई तो क्या सब सहना होगा। घर का कुता घर का ना घाट का होकर रहना होगा। करता क्या कुता बेचारा सब सहता वो लाचारा। सदस्य घर का वो कहलाता नौकर सा उसको मालिक रखवाता। जो कहा वो करना जो ना उसको आता तो गाली गलोच से पेट भराता। तो क्या उसका मन नहीं भर आता वह मन में कहाहता। रोटी खाई तो सब सहना होगा। घर का कुता ना घर का ना घाट का बनकर रहना होगा। लात मिले जो बात ना आये समझ। बिना वजह मजाक उसकी मालिक रिश्तेदार बनाता। काम घर के करता रखवाली घर की करता। फिर भी गमों का साया छाया रहता मन ही मन पुछता। रोटी खाई तो सब सहना होगा। घर का कुता घर का ना घाट का बनकर रहना होगा। सपने घर में रह महल के देखे पर पुरे ना देखने को मिले। जाकर घर से बाहर रह नहीं पाया। घर के कुते ने घर में ही पैर जमाया। बाहर जाकर खाये क्या कुता सोंच वापस घर पर आया। मालिक की मिली वो ही लताङ वही मार। कहने लगा मन ही मन होकर उदास। रोटी खाई तो क्या सब सहना होगा। धोबी का कुता घर का ना घाट का होकर रहना होगा।। -कवितारानी।