हैं अंधेरा घना, कोई दीप जलाओ / Hai andhera ghana koi deep jalao
हैं अंधेरा घना, कोई दीप जलाओ संध्या की बेला आई रात घनी अंधियारी कोई राह दिखे आस जगाओ। जाना है दूर, भीगी है बोहे, अँधेरा है, घना जंगल, कोई आओ दीप जलाओ।। पंगदण्डी संकरी पत्थर के रोले ऊँचे-निचे टीले कोई साफ राह दिखाओ। मंजिल बङी दूर राही हूँ मजबुर, मजबुत हो इरादे कोई ऐसा गीत सुनाओ।। भय-भरा हय हरा अभी भयाक्रांत नहीं ना हो भय ग्रसित उपाय बताओ। लयबध्द चाल रही अब तक चलता रहा दूर तक हारूं ना कोई हिम्मत बढ़ाओ।। मावस की काली रात है अँधेरा बादलो की ओट घना कोई तिनका सहारा बन जाओ। एक नियम जीवन सफल, सफल भावी भाग हो मन के कोनों में कोई दीप जलाओ।। भौर भरी किरणें होगी मधुर तेज पवन होगी रात कटे ऐसे सपने कोई सुनाओ। घङीयाँ गीन-गीन पल बढे, बढ़ती रहे राह भी रुकूँ ना नीरस कही ऐसी कोई कथा सुनाओ।। मन का मारा तन लाचारा लगता बेसहारा खुद से हूँ मैं हारा कैसे खुद को जगाऊँ। काली अँधेरी रात में दिखते नहीं खाब ये कोई आये तो शिकायतों के साख सुनाऊँ।। निर्बल, निस्तेज, नतमस्तक, नाश ना हो कोई आओ निराशा को दूर भगाओ। मिट चुके है निशान राह के मंजिल के पगचिन्ह दिखे कोई आओ हाथ आगे बढ़ाओ।। बुीत चुके है पहर कई रात कई शामें कई कोई...