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मन की आवाज लिखी / man ki aavaj likhi

मन की आवाज लिखी एक आवाज आज मन से उठी है। दबा रहा हूँ जो आज कलम पर आई है। कहने को सपना है पर मन खास अपना है। जग रुसवाई से डरता नहीं पर आन की फिक्र है जो अभी भी। अमानत की तरह है किसी की। आवाज स्याही कर आज जान दे दी मैंने। आवाज एक दीवाने दिल की है जो समाज में सीधा साधा है। दीवाना हर प्यारी नजर का जो पाना चाहे उन्हें हर नजर में। दीवाना हर अनौखे तर का जो अलग तरास है रब की। हर आवाज उसकी बहकाए मुझे उसकी जो खास पास होती एक समय। उसी की नजर नजारे दिखाए हर घङी। ख्वाब उसी के चलते रहते हैं जब भी अकेला होता हूँ। परवानगी, दीवानगी कई बार आई चरम पर। पर मेरा नहीं है सपना दीवाना होने का। उन नजरों में जो आकर्षण था गजब था। पर मन मेरा अजब था देखता था देखता खुब पर पास जाना नामंजुर था। कई बार जाति, धर्म भी लांगने को मन किया। कई बार हर निति-नियम तोङने को मन किया। पर सपना और मम्मी का कहा दिया ना माना। रुक जाता हर आखरी मोङ पर आकर। दबा देता उस आवाज को क्योंकि अभी कुछ ओर था बनना। ना दीवाना बना ना परवाना छोङ दिया वहाँ आना जाना। आवाज फिर सपनों कि आई और हर बार मैंने अपनी गाङी आगे बढ़ाई। खुलकर कभी किया नहीं सच वो जो ल...

मन की आवाज / man ki aavaj

मन की आवाज तब होती चाह ना ओर जीने की, तब पकङ हाथ आशा का दम भर जीगर में। बेहरा होके और अंधा होकर देख मन की, आँखों से और सुन मतबल की बात। कर हौंसलों को मजबुत करता नित काम, एकाग्रचित हो जो करता है लक्ष्य पर वार। दुनियाँ करती उसको सलाम्, दुनियाँ करती उसे सलाम। कहती है तब जमीं ना हटुंगी अब छोङुंगी तेरा साथ। हो चाहे दिन-रात, दलदल हो या दरार। कहता है ये गगन तु ही है मगन। दुँगा पुरा तेरा साथ है चाहे ऋत बंसत, बर्खा, सावन आज। कहती है काया फिर की रहुँगी अब तेरे साथ। ना छोङुंगी तेरा साथ बस दृढ़ तो तेरा आत्मविश्वास। तब भगवान कहे आशीर्वाद है मेरा तेरे साथ। तब में खुद से कहूँ की अब क्या डरने की बात कृपा है। जब सबकी साथ, तब मन कहे धन्य हो दुनियाँ देवी। तेरे रुप है अनेक, तू रखती सबका ख्याल, बस भी लेना संभाल की माया तेरी अपार। -कवितारानी।

मन की | man ki bat

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  मन की... कहीं मन की मन में ना रह जाये । कहीं मन की मन में ना मर जाये । हाँ डरता हूँ,  अब खुलकर कहता हूँ,  थोड़ा चिढ़ा सा रहता हूँ,  मैं विरह सहता हूँ  । कहीं सपनें सपनें ना रह जाये । कहीं अपने मन में ना मर जाये । कहीं अधुरा ही ना रह जाऊँ  । मैं इच्छाओं से डरूँ, कहूँ ना किसी से व्यथा, व्यथा दर्द खुद पी जाऊँ,  हाय ! पीड़ा भारी है  । मन पर लोक भारी है । कहना क्या उम्र जाती है  । मेरे से कितनों की बात निराली है।  ये सोंच के घबराऊँ, कहीं तन का प्यासा ना मर जाऊँ  । हाय में एकान्त ही ना रह जाऊँ  । Kavitarani1  272