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Ye bol mere man ke | ये बोल मेरे मन के

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ये बोल मेरे मन के - विडियो देखे   ये बोल मेरे मन के। घाव गहरे- गहरे पहरे, आकर सारे ठहरे मेरे सहरे, बन निशान या लकीरे आम ये , कह रहे बोझ जो हुए तन के, ये बोल मेरे मन के। भोर पहर ठहर सोंच रहा, या दुपहर में अकेले खोज रहा, शाम पहर खोये नज़ारे नयन के, रात सोये बिन हुए अँधेरे, कह रहे बोल मेरे मन के। कर्कश कोरी बात हुई , बिन सुने ही कह दी सुनी , अनसुने सब बोल बन के , काट रहे चक्कर मेरे तन के , कह रहे बोल मेरे मन के। नयनो का रहा छोर कहीं , बात कहीं नज़रों का छोर कहीं , खोई खोई-सी शक्ल कहती ये , मन के रोग कहती है , कहती ये बोल मेरे मन के। कर्म पथ पर भरी है , दुविधा बहुत सारी है , कहने को ये भाग बुरे कहता है , ये तन धीरे धीरे सब सहता है , कहता है ये बोझ मेरे मन के। सुखी जग मैं में दुखी , आनंद में मेरे बेरुखी , उल्लास अंत तक भये ना , मन मेरा मुस्काये ना , खोज अधूरी हर बार मेरे तन की , क्योंकि ये भोज मेरे मन के। और  सुन रहे हो आप; बोल मेरे मन के।। - kavitarani1