मिली नहीं हीर सी | Mili nhi Heer si
मिली नहीं हीर सी - विडिओ देखे मिली नहीं हीर सी घट-घट घूम, पी आयो पीर ही। मनें पूछे जग; मिली क्यूँ नी हीर जी।। कि; मिली कहीं हीर जी? हीर नी पूछी जद मन पसरायो । आँख्या न आँसू छूपा, शब्दाँ न छूपायो । पसीजो जो हिवड़ो जो, बोल भी नी पायो । यादाँ न खोयो, मनड़ो बोल भी नी पायो । खेव किन्ही कसा, कसी मिली हीर जी । कसी थी वा, खाँ मिली थी वा हीरनी । घट - घट घूम - घूम पीर नी छुपायो । बिती खई मनड़े , मन ही छुपायो । मन की मन ही बतायो । नैना न काजल रमा, मृगनयनी भायी । होंठा न लाली जमा, मुस्काती आयी । हिरणी चाल ले क, लट गालां प लटकाई । मीठा बोल बोल, मन प थी छाई । हिर-हीर बन मन प आती ही आई । हिवङा न भाती ही जन्मा की कहाई । हीर मिली, हीर पीर बन मन प छाई । दन बित्या कोनी की रंग अपना प आई । भूल रास्ता सारा,भूल मने गई । वा हीर पीर दे क, जाण कहा गई । बैठ्यो अकेलो मन घबरायो । याद कर-कर उणी घणो बुलायो । आयी - गई वा जसा पीर बङ गई । अब भूल वा गई ।। हीर भूली, बावलो सो कर गई । पल-पल आँसु भर क, खुद दुजी नाव तर गी । समय रो चकरो घूमतो घूम्यो । आ मिल्यो फेर स उई हिवङो । बंद दरवाजा लिख्या दुखङा डायरी । ...