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मेरी खोज / meri khoj

 मेरी खोज चल रहा है वक्त निरन्तर बन कर्मठ नैतिक ज्ञानी। मानव हूँ मैं चलना है मुझे भी कर्मठ सा बन कर ज्ञानी। सुनी है राहें जीन पर चलने से डर जाता यहाँ। फिर भी ढुँढने को मन का आसरा भटक आता यहाँ।। मनका आसरा ढूँढूँ, ढूँढूँ मन का टापरा यहाँ। सुख-वैभव से भरा, मान, ज्ञान भरा आसरा ढूँढूँ। जहाँ हो ठंडक मन का आराम तन का जहाँ। जहाँ ईमानदारी, समझदारी हो समाज में ऐसी जगह ढूँढूँ आसरा।। फिर चलते भटक गया नया आसरा ढूँढ रहा हूँ। फिर सपने देखने लगा जो पिछले थे उन्हें भुलने लगा हूँ। फिर नयी दुनिया की तलाश में चल दिया हूँ। फिर मन का आसरा ढूँढ रहा हूँ, फिर नया टापरा ढूँढ रहा हूँ।। पल-पल है दुनिया रंग बदलती हम रहते बेरंग अभी जहाँ। हर पल जहाँ नई सोंच होती हम बैठे एक ही सोंच पर जहाँ। ऐसे में कैसे मैल करूँ वक्त कैसे बने वो आसरा। वक्त के साथ चल कैसे बनाए नया आसरा।। पर रुकना सिखा हमने कहाँ, थकना हमने जाना कहाँ। घबराये ऐसा लक्ष्य साधा नहीं, मंजिल अब दूर नहीं। मंजिल जो सोंची है देगी वो सपनों का आसरा। मिलेगा हमें जरूर अपने सपनों का आसरा।। -कवितारानी।

मेरा सफर / mera safar

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  मेरा सफर उठते-बढ़ते, हॅसते-रोते, मिलते-बिछुङते, हम पार आ गये। बदलते जमानें और चेहरों में भी हम खास हो गये। कौन याद रखेगा कि मैं जीया हूँ मर-मर कर। किसे फर्क पङेगा मैंने लिखा है जी-जी कर। सब किस्से यूँ दफ्न हो जायेंगे।। कहानियाँ कई पङी है, फिल्में कई देखी है, सबक बहुत सिखा है। नादानियाँ बहुत की है, परेशानियाँ बहुत देखी है, जीया हुँ मुश्किलों को। कौन ये सब किसी से कहेगा। किसे फर्क पङेगा। एक अनजान सफर शुरु हुआ था। एक जान पहचान बनाकर खत्म होगा। गये हैं कई आकर दुनिया में। मेरा नाम भी यूँ गुँजेगा।। काटी आधी, आधी और काटेंगे, जैसे भी हो जिंदगी काटेंगे। करेंगे जो कर सके वो बेहतरीन, कि अनुवाद में बटेंगे। कोई तो ध्यान देगा। किसी से तो भाग जुङेगा। कोई तो साथ होगा। या ये सफर यूँ ही मिटेगा।। आशायें आई गई, अपेक्षायें यूँ ही रही, बस यूँ रहा सफर मेरा। पन्नों में बंटता रहा विचार, कौन समझा, कौन समझेगा दर्द मेरा। वो सफर हसीन होगा। वो नींद पुरी होगी। जब जिन्दगी रुकी होगी। और अंतिम मेजिल मेरी होगी।। -कवितारानी।