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कैसे | Kaise

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  कैसे  मैं खुद मैं सिमटा औरों की परवाह करूँ कैसे । रहता हूँ बैसुध, सुझ की बात करूँ कैसे । जाने कैसे कट रही जिन्दगी पता नहीं । मैं जिन्दगी जीने की बात करूँ कैसे ।। एक भौर का तारा देखता हूँ, साँझ को निहारता हूँ । मोर का नाच देखता हूँ, पपीहे को सुनता हूँ । मैं अपने दुख का मारा, और का दुख दूर करूँ कैसे । मैं अन्त दुखी के दुख से, रूकूँ कैसे ।। फिर तलाश नये आशियानें की, मैं खण्डहर में रहूँ कैसे । बना रहा अपना घोंसला, होंसले से दूर रहूँ कैसे । सिखा पाठ हिम्मत का, किमत अपनी कहूँ कैसे । मैं खुद ही टुटा हुआ, रूठा जग से रहूँ कैसे ।। एक नीम का पेड़ छाँया देता कड़वा रहूँ जैसे । दुसरे को छाँव देता अंदर से खोखला रहूँ जैसे । आते बैठते लोग गुणगान करते दुख उन्हें सुनाऊँ कैसे । मैं अकेला शांत रहता अन्दर की अशांति कहूँ कैसे ।। Kavitarani1  222