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मैं...कब / Main kab

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Click here to see video मैं... कब मैं भी बड़ा मुर्ख हूँ,  खुद को खो रहा हूँ-  खुद को पाने के लिये,  जी सकता हूँ आजाद और, जी रहा हूँ जमाने की सोंच कर । बुरा लगता है खुद को कुछ,  पर जमाने को बुरा नहीं लगने देता हूँ,  बड़ा मुर्ख हूँ खुद की चिढ़ाई करता हूँ । कह अक्कल को काम लूँगा,  जमाने को छोड़ खुद का नाम लूँगा,  बढ़ाई सुन झुकना बंद कर, सीना तान हक की माँग करूगाँ,  जाने कब अपने मन का ही करूगाँ । सोंचता हूँ दुर हूँ, खुश हूँ,  जाने किस बोझ में दबा रहता हूँ,  इस बोझ को कब आजाद करूगाँ,  मैं कब आजाद होऊगाँ  । Kavitarani1  239

जैसे तुम वैसे मैं / Jaise tum vaise main

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  Click here to see video जैसे तुम वैसे मैं  सच्चा था मैं, सच कहता था । अपनी जुबान पर अड़ा रहता था । पर तुम थे समझदार, धार से करते रहते वार । कहते कुछ - कुछ थे करते । मेरी अच्छाई पर थे लड़ते । करता क्या ! क्या-क्या में सहता । ठोकर खाकर संभला अब - अब तरसा करता । रहता जैसे तुम - वैसे मैं । अड़ता मैं जैसे तुम वैसे मैं । मान जाता हूँ रूक जाता हूँ, सुनता हूँ । चालबाजियों से चाल बचाता हूँ । मन मारता और भाव खाता हूँ । अच्छा बना रहता हूँ पर अब अच्छाई नहीं । दिन आये खुद पर ऐसी कोई नहीं । बस अब ज्यादा ना सुनता । बात पसंद आये बस उतनी करता । हरता मन की पीड़ा - क्रीड़ा करता । अब जैसे मिलते तुम वैसे मैं  । अब जैसे, तुम वैसे मैं  ।  Kavitarani1  175

तुम और मैं, Tum aor main

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You & Me - click here to listen & see तुम और मैं  मैं नासमझ बहुत, तुम होशियार बहुत ।  मैं नादान बहुत, तुम समझदार बहुत ।। तुम रूपवान बहुत, मैं औझा हूँ ।  तुम नव यौवन में बहुत, मैं बौझा हूँ ।। तुम भौर सुहानी, मैं धूप दिन की हूँ, तुम संध्या रानी, मैं चाँदनी रात सा हूँ ।। मैं जलता दीपक, तुम बाती नई हो । मैं फुल कल का, तुम कलि नई हो ।। मैं बहता दरिया, तुम निर्झर हो । मैं सागर अपार, तुम तड़ाग मनोरम हो ।। तुम किरण शरद ऋतु की, मैं धूप ग्रीष्म की हूँ ।  तुम शीतल पवन, मैं लहर मनमोहक हूँ ।। तुम नव कौयल, मैं पत्ता डाल का हूँ । तुम कोयल मधुर, मैं कौवा काल का हूँ ।। मैं अनपढ़ जग, तुम गुणवान जन हो । मैं अनजान मन, तुम सरस मन हो ।। मैं पथिक भ्रमित, तुम गीत मधुर हो । मैं छाँव कम, तुम पावन धम्म हो ।। तुम अन्तर्यामी बहुत, मैं अबोध बहुत हूँ ।  तुम सहज बहुत, मैं उलझता बहुत हूँ ।। तुम सार गर्भित तो, मैं पल्लवन हूँ । तुम टीकाकार तो, मैं मूल कर्म हूँ ।। मैं राही मन का, तुम ज्ञानी जन हो । मैं पथ भटका जो, तुम ठोर मन हो ।। मैं अधुरा एकान्त, तुम पूर्ण पाठ हो । मैं मन का मारा, तुम पू...