कब दिन ढले / kab din dhale
Click here to see video कब दिन ढले पूरब की किरणें उठ खड़ी हुई । शांत, शीतलता लिये बढ़ी हुई । डाल - डाल चहक रही । हवायें मध्यम अब तेज हुई । मन बावरा खोया सा । किस्मत पर अपनी रोया सा । सोच रहा आगे की । कि कब शाम ढले । कब तक रोज - ऐसे जीये । कोई आस नहीं । कोई पास नहीं । एकान्त में कोई साथ नहीं । यौवन की ढलान में । जीवन की भौर याद आई । बैठ छत पर । मन कर रहा सवाल वही । खुब जीये और जी रहे । अब शाम हो और कब दिन ढले ।। Kavitarani1 214