जिसे हम ढुँढ रहे थे / dund rhe the jise
जिसे हम ढुँढ रहे थे देख जिसे हमेशा साँसे बढ़ जाती थी, मंद-मंद मुश्कान होंठो पर चढ़ जाती थी, वो यार मेरी कब जिद् पर चढ़ गयी, वक्त ले रहा था अंगङाई, हर वक्त वो रहने लगी घबराई, प्यार मेरा भी जब परवान था चढ़ने लगा, यार मेरा मुझ पर था मरने लगा, एक दिन जैसे रब की महरबानियाँ हुई, घर के बाहर अचानक उससे मुलाकात हुई, संसनाहट जैसे रगो में भर गई, उसकी बातें मुझमें थी हिम्मत भर गई, कह दिया दिल के हालात उसको, कह दिया धीरे-धीरे रोज सब उसको, जाने क्यों ना वो मुर्झाई थी, मेरे पास और वो आयी थी, लब्ज ना प्यार का मुँह से उसके निकला, हर दम मैंने अपने दिल को मसला, हर कोशिश मैंने जब आजमाई थी, आखिर मेरे हारने कि बारी आयी थी, छोङ दिया उसे कह दिया उसे की दुर मैं हो जाऊँगा, तू ना छोङ हॅसना मैं दुनिया छोङ जाऊँगा, तेरी एक मुस्कान पर ही तो मर मिटे थे, अब उसे छिन दुनिया से हम क्यों रुठे थे, मन किया मनुहार किया, जत्न किया हर प्रयत्न किया, दुनियादारी वो मुझे समझा रही थी, नियम कोयदों को गा रही थी, दिल में एक जगह जो मैंने बना रखी थी खो रहा था, अब मैं उससे दुर दो रहा था, देख जिसे हमेशा साँस बङ जाती थी, मन्द मन...