मन मेरा | man mera
मन मेरा कहने को जग है साथ में, पर मन को कहाँ कोई भाता । सुनने को सब है पास में, पर मन को कहाँ समझ आता । कुछ ही लोग मिलते है जीवन में । जिन पर मन आता ।। बोल मेरे बड़े बेमैल होते, हर कोई इन्हें कहाँ समझ पाता । शब्दों का झोल भरा होता इनमें, हर कोई कहाँ इन्हें तोल पाता । कुछ ही संयोग आ टकराते हैं, जिन्हें मन आसानी से समझ जाता ।। मन मोहक छवि लेकर रस भरी बोली जाते, आँखो में चमक भर प्यारी सुरत दिखाते । हर मोड़ पर मिल जाते है लोग प्यारे से, अपनी अदाओं का जाल बिझाते दिखते । हर को हर मासुम चेहरा कहाँ भाता ।। बड़े अनमोल है ये चुनिंदा कुछ लोग मेरे, जिन्हें समय साथ मैं खोता जाता । कुछ अड़े रहते जिद पर अपनी, कुछ को मैं नहीं समझ पाता । कहता रहता लड़ते झगड़ते ही, न माने ये तो खुद मान जाता ।। आखिर एकान्त वासी बना बैठा हूँ, और मन को कहाँ समझ पाता ।। Kavitarani1 85