कब / Kab
Kab - click here to see video कब सावन बिते सुखे सारे । शीत बिती रिती मेरी । ग्रीष्म को ठण्डक नहीं । त्यौहारों में रंग नहीं । कैसी ये जिन्दगी है । कैसी ये कट रही । कोई रंग घोले आके । कब से बैठा मैं नीरस । खोज रहा कलियाँ मैं । कोई नहीं जहाँ रस खाली सारा । सपने लगते आधे से । साधा रहता खुद मैं । आधा रहता खुद मैं । बीत रही छड़ियाँ सारी । सारा यौवन बीता । सवाल रहे रीते सारे । मैं सुनता रीता सब । कब से नीरस एकान्त अब । सोंच रहा कब होगी । होली रंग भरी मेरी ।। Kavitarani1 159