संदेश

मेरी थी क्या खता लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरी थी क्या खता / meri thi kya khata

चित्र
Click here to see video मेरी थी क्या खता  फिर से सुनाने को कोई नहीं पास । अपनें गम बतानें को आया नहीं कोई रास । फिर तुम्हें ही सुनाता हूँ ऐ जिन्दगी । तुही सुन क्या शिकायत है अपनी बंदगी ।। कहने को फिर खास थी । वो दोस्त जैसी मन की साफ थी । कर दिया काॅल अपनी बताने को । सुन रहा था जब तक था सुनने को । फिर मेरी बारी आयी कहने की । कही खुलकर अपनी ही । बस मान बैठा खास सा उसे । दिल से बता बैठा पास का उसे । मस्ती मजाक ही तो थी । चिढ़ गई और रूठ गई । अब तु ही बता ऐ जिन्दगी । इसमें मेरी क्या खता थी ।। दिलबर मान दिल के हाल सुनाना मुश्किल । अपना जान खिलखिलाना और मुश्किल । लड़ना-झगड़ना आम रहा था और क्या करता । बात ही तो की थी खुलकर और मेरी थी क्या खता ।।   Kavitarani1  249