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मेरे गाँव की गलियाॅ | Mere ganv ki galiyan

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Click here to see video   मेरे गाँव की गलियाॅ दूर निकल गाँव से, बङी-बङी सङकों पर चल। भीड़ भरे बाज़ारों में,  शहर में गाङियों के शौर में चल।  मेरे गाँव के सुकून की याद आती है, मुझे मेरे गाँव की गलियों की याद आती है। । खाने को, कुछ कमाने को, जीवन बेहतर बनाने को। मैं अपने खेत का सुकून छोङ आया, मैं अपनी गाय, अपना गाँव छोड़ आया। अब जब से कमाने लगा हूँ,  पहले से अच्छा जीने लगा हूँ।  तो गाँव की याद आती है,  मुझे मेरी गाँव की गलियों की याद आती है। । मेरे गाँव की गलियाँ छोटी थी, वो धूल सनी, सर्पीली थी। वहाँ घर आपस में सटते थे, वहाँ मन आपस में पटते थे। शहर में सब अनजान है, स्वार्थ तक सब साथ है। बस यही बात सताती है, मुझे मेंरे गाँव की याद आती है। । वहाँ बचपन गलियों में फिरता है,  घर-ऑगन फलता फुलता है। एक दूसरे का सब साथ देते हैं, खेत खलिहानों में सब फिरते हैं।  वहाँ की ताजा हवा मुझे बुलाती है,  मुझे मेंरे गाँव की गलियों की याद आती है। । - कविता रानी। 

पगडंडीयाॅ | Pagdandiya

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Click here to see video   पगडंडीयाॅ     दुर्गम पथ, दरिया-बाधाएं,  पहाड़ी जमीन,  कंटीली राहें। उपवन की सैर में, मंदिर की फेर में, मैं आगे बङी,  पगडंडीयों पर चली। जब रास्ते बंद हो जाते हैं,  पथ भ्रमित कर जाते हैं, सङके जर-जर हो जाती है,  तब पगडंडीयाॅ याद आती है।  मृदुल ये नम मिट्टी से, मखमली नरम घांस से, मनमोहक हरियाली  से, आसान है चलने में। मन में जगह बनाती है,  मंजिल को पहुँचाती है, रास्ते आसान करती है,  पगडंडीयाॅ बहुत काम आती है। । जीवन सफर में कई मोड़ पर रास्ते कठिन हो जाते हैं। उन रास्तों पर चलना तो चुनौती होते ही हैं, मंजिल की कोई गारंटी नही होती। ऐसे समय हमारे काम जो आये और हमारे जीवन को शार्टकट देकर, रास्ते को आसान कर दे वही हमारी पगडंडी है। -कविता रानी।