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कर्म से विमुख / karm se vimukh

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  कुछ लोग बातें तो बहुत बङी -बङी करते है और दुसरों को भङकाते हैं , जबकि अंदर से अपना रास्ता सहज बनाये रखते हैं। अपनी धुन के धुनी ये लोग कई प्रकार से अवगुणों से भरे होते हैं  ये कविता उन्हीं लोगो के व्यक्तित्व को बताती है। कर्म से विमुख।  पथ पर चलने की बङी-बङी बात करते हैं। अपने मार्ग को सुगम ले चलते हैं। अपनी राग में किसी की नहीं सुनते हैं। लगना चाहते हैं कर्मठ अपने आप में ये। पर है कर्म से विमुख अनजान ये।। बङी-बङी बात करते हैं। अपने आप को ही बङा ये कहते हैं। अपने मन की ही ये गढ़ते हैं। पर जब बात आये कर्म पथ की जो। तो कर्म से विमुख ही लगते ये।। - कविता रानी।

कर्म पथ पर | Karm path par

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  अपने कर्म पर ध्यान केन्द्रित कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के अतुलनीय अनुभव को सांझा करती एक सुन्दर कविता। इसमें आपको प्रेरणात्मक शब्दों का संतुलित संग्रह मिलेगा। Click here to see video कर्म पथ पर अग्नि पथ पर बङ-बङ, बाधाओं से लङ-लङ, मैं पथिक सिखता जाता हूँ,  नित कर्म पथ पर बढ़ता जाता हूँ।  हर्ष उल्लास को समेट, दुख-दर्द को सहेज, मैं अक्सर नई सिख पाता हूँ,  नित कर्म पथ पर बढ़ता जाता हूँ।  कुछ रोङे आ जाते हैं,  कुछ लोग राह भटकाते हैं,  मैं उन्हें लिखता जाता हूँ,  नित कर्म पथ पर बढ़ता जाता हूँ।  जो मिलकर बन जाते खास, जो सहयोग करते रहकर पास, मैं उन्हें मन मंदिर में बसाता हूँ,  नित कर्म पथ पर बढ़ता जाता हूँ।  कुछ कपटी भी भीड़ जाते हैं,  कुछ दुष्ट अनायास दुख दे जाते हैं,  मैं उन्हें भूलता जाता हूँ,  नित कर्म पथ पर बढ़ता जाता हूँ। । -कविता रानी।