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काश तुम समझ पाते

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  काश तुम समझ पाते। माना की तुमनें कहा था। पर फिर भी प्यार है माना था। विश्वास जगाया था। हर बात को आगे होके बताया था। अब जब मन तुम पर आ गया। सब को मन बिसरा गया। तब तुम कहती हो हम दोस्त हैं। प्यार नहीं बस आकर्षण था। जो कहा अब ना कहना। और विश्वास है पर ये ना कहना। ये ना बताना, वो ना कहना। यही जब ओरों  को बताती हो। और मुझसे छुपाती हो। कितना दुख देता है। विश्वास कहीं टुटता है। दम कहीं घुटता है। कैसे समझाऊँ क्या-क्या होता है। काश तुम समझ पाते। कैसे विश्वास बनता है। और विश्वास बिगङता है। क्या मन पर आती है। और कैसे जान जाती है। काश तुम समझ पाते।। - कवितारानी।

Jab sab thik ho (जब सब ठीक हो) hindi poetry

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Click here to see video for this poem   जब सब ठीक  हो।  जब मन भरा हो।  सब कुछ हरा हो । घाव भरा हो । और चाव चढ़ा हो । कुछ नया नहीं आता। मन नया नहीं चाहता । बस कट रहीं हैं अच्छी जिंदगी। बस चल रही है बदंगी। कुछ खास नहीं भाता। सब खास ही होता। यही कहता में जाता। और कुछ याद नहीं आता।  जब सब ठीक  हो। जब सब अच्छा हो । जब मन बच्चा हो। जब तन अच्छा हो। कुछ ज्यादा किया नहीं जाता।  कुछ जिया नहीं चाहता।  बस जीया है जाता।  बस चला है जाता। । - कविता रानी। 

शिखर / shikhar

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Shikhar - video yha dekhe   शिखर अपने लक्ष्य को पाने के लिए हर संभंव कोशिश करने के बाद जब हमें अपनी मंजिल मिलती है, तब हमारे  कठिन सफर  बताने के लिए हमारे पास कई सारे अनुभव होते हैं। आपके लिए  एक कविता के रुप में लाये हैं हम ऐसे ही अनुभव जो आपको प्रेरित करेंगे। ऊँची नीची राह थी, बङी कठिन मेरी चाह थी। मेरे तन को मन की आस थी, बस यही बात कुछ खास थी।। मैंने मन ही मन ठानी थी, पत्थरीली है राह जानी थी। बस शिखर की हवा खानी थी, और यहीं से शुरू मेरी कहानी थी।। दुर्गम था पर मनमोहक बङा,  रास्ता था मेरा कठोर बङा। अदृश्य था जैसे हिमालय खङा, और मैं भी शिखर देखने को अङा।। आखिर कब तक तकरार होनी थी, चुनौतियों को चुनना मजबूरी थी। मैंने रास्ते छोङे पगडंडीयाॅ चुनी, और मन में शिखर की ज़िद सुनी।। समय बदला, दृश्य बदला, मैदान खत्म हुए, ऊँचाईयाॅ दिखी। हिमालय की मनमोहक वादियां दिखी, था दूर भले, पर अब शिखर दिखा।। अब नजरों में मेरे लक्ष्य है, करने रास्ते सारे व्यस्त हैं।  अब बस शिखर को पाना है,  जीवन साकार बनाना है।। -कविता रानी।