ना चाहके भी...| na chahke bhi
Touch to see video - NA CHAH ke bhi ना चाहके भी... रात हो अँधेरी या ऊझली ही, दिन थकान भरा या आराम ही । करवटों में रात गुजर जाती, और दिन की धूप जलाती है । देखूँ रोज नये चहरे, मुझ पर होते लोगों के पहरे, व्यस्तता में रहूँ या बैठा यूँ ही, जाने क्यूँ ना चाहके भी कोई कमी सताती है । तेरी याद आती नहीं, पर तू सताती है। ना चाहके भी... तू ही मुझे भाती है । सोचना चाहूँ ना, देखना चाहूँ ना, बुलाना चाहूँ ना, फिर भी तेरी परछाई आती है । ना चाहके भी, मेरी तन्हाइयों में, मेरी खामोशी में, मेरी रूसवाई में, तेरी कमी नजर आती है । मुझमें तेरी कमी नजर आती है । ना चाहके भी, तू ही मुझे भाती है । Kavitarani1 66