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फिर तुम वापस आई | Phir tum vapas aayi

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फिर तुम वापस आई  यूँ जो जी रहा था मैं, कोई अर्थ नहीं था जीने में । सुखे हुए होठो से, पपड़ीयाँ उखाड़ रहा था मैं । यू तो जी रहा था मैं, कोई रस नहीं था जीने में । अपनी धुन में चल रसा था मैं, कोई अर्थ नहीं था जीने में  ।। फिर जैसे रोनक आई, खोई मुस्कान वापस आई । थोड़ी रोनक जगी वापस, कुछ रस आया वापस । कुछ आस लगी जीने की, कुछ प्यास जगी जीने की । जब तुम वापस आई, जब तुम आई ।। महिनें भर का सुखा राहत पा गया, बारीश सी हो गई । चेहरा खिल सा गया, मुस्कान छा गई । जो रूठा सा नीरस हो गया था मैं, रसमय हो गया । कुछ देर ही सही वापस आ गया मैं, खुश हो गया मैं ।। यूँ तो लाइफ कट रही थी, समय रूक नहीं रहा था । अब जब तुम आई जी रहा हूँ जैसे मैं । अब जाना ना यही कहना है,  कैसे भी हो खुश ही रहना है ।। Kavitarani1  161