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सत्कर्म मुश्किल | Satkarm mushkil

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Satkarm mushkil - See video here   सत्कर्म मुश्किल।  हे कर्म पथ मुश्किल, हे धर्म पथ मुश्किल।  जहाँ धरा पर है विपरीत धङा, वहाँ सत्कर्म मुश्किल। । अटी पङी है धरती गहरे गड्डों से, चलना बङा है मुश्किल। सटी पङी है धरती गहरे जख्मों से, बचे रहना बङा मुश्किल। । हो कायाकल्प सत्य का झूठ, रुठे रहना भी मुश्किल।  हो मार कृत्य की पङी, खुंटे पर अङे रहना भी मुश्किल। । सिखे जहाँ सन्मार्ग पर मर मिटना, कुमार्गी होना मुश्किल।  सिखे जहाँ सत्कर्मी रहना, वहाँ कुकर्मी बनना मुश्किल। । हो रगों में भरी ईमानदारी, वहाँ बेईमानी भरना मुश्किल।  स्वतंत्रता की उमंगो  में जन्में, धुर्त की सुनना मुश्किल। । हे दूत ईश्वर के जन्में, धूर्त की सुनना है मुश्किल।  हे पुत जन्में सपुत बनने, मार्ग कपुत का चुनना मुश्किल। । हे संगत चार दिन की, कुमति से डरना कहाँ मुश्किल।  हे बदलता समय अक्सर, सुमति को बनाये रखना मुश्किल। । हो मार्ग राक्षसों से भरा, खुशहाल रहते जीना है मुश्किल।  कलियुग के भार से जग भरा, सतयुग की सोंच रखना है मुश्किल। । जब चुन लिया मार्ग सत्य का, असत्य को चुनना है मुश्कि...

क्या वो तुम हो | kya vo tum ho

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  Kya vo tum ho - click here to see video क्या वो तुम हो। जिसे जीवन का भार सोंपना है। मेरे दिल और दिमाग सोंपना है। मेरी खुशियों का हिस्सा बनना है। जिसे मेरे दुखों का भागी होना है। क्या तुम हो।। मेरे अधुरे लब्जों को पूरे करने वाली। मेरे सुने जीवन को भरने वाली। मेरी आशाओं के दीप जलाने वाली। क्या वो तुम हो।। क्या तुम ही मेरी सुबह की चाय हो। क्या तुम ही मेरे शाम हो। क्या तुम ही मेरी रात हो। क्या तुम ही मेरी रानी हो। क्या वो तुम हो।। जिसे अक्सर सपनों में महसुस किया। अक्सर जिसे पाने का ख्वाब देखा। जिसे चाहा है खुद से ज्यादा। जिसे मांगा है मंजिल से ज्यादा। क्या वो तुम हो।। मेरी ख्वाहिशों का शिखर। मेरी चाहत की कदर। मेरी उम्मीद और घर। क्या वो तुम हो।। -कविता रानी। ( KR)

मैं हारा नहीं | Main hara nahi

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  एक साहसी व्यक्ति अपने सामने आने वाली चुनौतियों से  कभी भी डरता नहीं, वो उनसे सामना करता है, लङता है और कुछ सिखता है।  यहाँ अकेला पथिक अपने पथ पर चल रहा है और राह में आने वाली अपनी मुश्किलों से लङ रहा है। Click here to see video मैं हारा नहीं। था बेसहारा मैं। अकेला मन का मारा मैं। रूका नहीं, थका नहीं, चलता रहा अपनी धुन में। रहा बेसहारा, पर हारा नहीं मैं।। थी दौङ मेरी, दौङता रहा। जाना था दूर, बढ़ता रहा। आये मोङ कई, पर मुङा नहीं। गिरा, उठा, चला रुका नहीं। मिला किनारा, सहारा नहीं। बह गया मैं, पर हारा नहीं।। चुनौतियाँ कई आती रही। जिंदगी जैसे आजमाती रही। मैं बाधाओं से डरा नहीं। जीता रहा हर पल, मरा नहीं। आखिर तक चलता रहा मैं, मैं हारा नहीं।। हो और बाधाएं तो लङ लुंगा। शिखर मिलने तक मैं चल लुंगा। हो साथ कोई या नहीं। मैं रहा अकेला हारा नहीं।। होंसले से बढ़ता आया हूँ। खुद की किस्मत लिखते आया हूँ। खुद की हिम्मत बनते आया हूँ। लङता रहा समय से मै, पर हारा नहीं मैं।। -कविता रानी। (KR)