भौर का आलम / bhor ka alam
Click here to see video भौर का आलम सब भूल - भाल के, अन्तर्मन देखूँ जो । शीतरता, मधुरता, ताजगी, सादगी खोजूँ जो, प्रकृति की गोद में जाके जाऊँ में, देख इसकी सुंदरता कहूँ, इसके सिवा और चाहूँ क्या । ये उगता सूरज, नम धरती, हरे पत्ते, ये पक्षियों की आवाजाही और चहचहाहट, पपिहे की आवाज और मोर का यूँ छतों पर नाचना, और मंद-मंद मुस्कान देती ताजगी भरी हवा, कुछ पल प्रकृति की गोद में बेठूँ जो, सब भूल एक सुकून चाँहू जो, अनायास ही सब मिलता है । यहाँ सब फूलों सा खिलता है । शांत मन, शांत तन, शांत हवा में, सुबह की चाय की सिसकियों में, कुछ खास नहीं बस मन के शब्द उकेरे है । ऐ जिन्दगी मैंने ये भौर के शब्द कहे है ।। Kavitarani1 257