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सत्कर्म मुश्किल | Satkarm mushkil

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Satkarm mushkil - See video here   सत्कर्म मुश्किल।  हे कर्म पथ मुश्किल, हे धर्म पथ मुश्किल।  जहाँ धरा पर है विपरीत धङा, वहाँ सत्कर्म मुश्किल। । अटी पङी है धरती गहरे गड्डों से, चलना बङा है मुश्किल। सटी पङी है धरती गहरे जख्मों से, बचे रहना बङा मुश्किल। । हो कायाकल्प सत्य का झूठ, रुठे रहना भी मुश्किल।  हो मार कृत्य की पङी, खुंटे पर अङे रहना भी मुश्किल। । सिखे जहाँ सन्मार्ग पर मर मिटना, कुमार्गी होना मुश्किल।  सिखे जहाँ सत्कर्मी रहना, वहाँ कुकर्मी बनना मुश्किल। । हो रगों में भरी ईमानदारी, वहाँ बेईमानी भरना मुश्किल।  स्वतंत्रता की उमंगो  में जन्में, धुर्त की सुनना मुश्किल। । हे दूत ईश्वर के जन्में, धूर्त की सुनना है मुश्किल।  हे पुत जन्में सपुत बनने, मार्ग कपुत का चुनना मुश्किल। । हे संगत चार दिन की, कुमति से डरना कहाँ मुश्किल।  हे बदलता समय अक्सर, सुमति को बनाये रखना मुश्किल। । हो मार्ग राक्षसों से भरा, खुशहाल रहते जीना है मुश्किल।  कलियुग के भार से जग भरा, सतयुग की सोंच रखना है मुश्किल। । जब चुन लिया मार्ग सत्य का, असत्य को चुनना है मुश्कि...

रूक गया हूँ मैं / ruk gya hun main

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जब हम अपने मंजिल के सफर में अथक प्रयास करते हुए चलते हैं तो कई बार ऐसे मोङ आते हैं जब हमें रुकना पङता है। यह कविता ऐसे ही मोङ की है जिसमें हमे बताया गया है कि ऐसे समय पथिक कैसा महसुस करता है। रुक गया हूँ मैं रुकने का कभी मन नहीं किया। पर आज रुका हुआ हूँ मैं। मेरी पसंद की राह पर, एक जगह खङा हूँ मैं। रुकना मेरी ख्वाहिश नहीं, ना ये मेरी जिन्दगी का हिस्सा है। बस चलने को रास्ते बंद दिख रहे। यही अभी का किस्सा है। एक ओर पायदान चढ़ गया हूँ। पर लग रहा की कुछ ज्यादा रुक गया हूँ। अपने जीवन के सफर में, लग रहा की यहीं रुक गया हूँ मैं ।। - कविता रानी।