कर्म से विमुख / karm se vimukh

 


कुछ लोग बातें तो बहुत बङी -बङी करते है और दुसरों को भङकाते हैं , जबकि अंदर से अपना रास्ता सहज बनाये रखते हैं। अपनी धुन के धुनी ये लोग कई प्रकार से अवगुणों से भरे होते हैं  ये कविता उन्हीं लोगो के व्यक्तित्व को बताती है।


कर्म से विमुख। 


पथ पर चलने की बङी-बङी बात करते हैं।

अपने मार्ग को सुगम ले चलते हैं।

अपनी राग में किसी की नहीं सुनते हैं।

लगना चाहते हैं कर्मठ अपने आप में ये।

पर है कर्म से विमुख अनजान ये।।


बङी-बङी बात करते हैं।

अपने आप को ही बङा ये कहते हैं।

अपने मन की ही ये गढ़ते हैं।

पर जब बात आये कर्म पथ की जो।

तो कर्म से विमुख ही लगते ये।।


- कविता रानी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अरी तुम भूल गई, Ari tum bhul gyi

मैं...कब / Main kab

जैसे तुम वैसे मैं / Jaise tum vaise main