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अभी सार बाकी है / abhi sar baki hai

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अभी सार बाकी है गीर गया था उठने से पहले, थक ही गया दौङने से पहले। उठ खङा हुआ चलने लगा हूँ, नये रास्ते फिर से खोज रहा हूँ। लगता था की हार ही गया था तब तो मैं, चल ना पाऊँगा एक कदम भी अब तो मैं। एक साहस भर उंमगों को हवा भरी है, सोंचना छोङ कर्म की राह जङी है। कहता है मन अभी असली हार बाकी है, जीतने तक जीवन का सार बाकी है। आती जाती शीत लहर कंपा भले देती मुझे, भरी गर्मी में लू तपा भले देगी मुझे। पर गलने तक मुझे बढ़ते था रहना तब भी, राख हो जाँऊ तब तक चलते रहना है अब भी। रुकना ना मेरा मिजाज रहा था अँधेरे मैं तब, फिर आज कैसे रुक जाऊँ थक ही गया जब मैं। नव ऊर्जा, नव उंमग के बहाने सजाये हैं, आगे बढ़ने को दुखों को भुलाये हैं। हर्ष के पल घमंड ना करते देंगे कभी, चोट के निशान को देख आह भर आये हैं अभी। बस खयाल आज का साथ साकी, साथी है, जीवन बाकि की अभी सार बाकि है। अभी सार बाकि है।। -कवितारानी।