राही | Rahi | Rahgeer


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जीवन सफर में लगातार आगे बढ़ना ही सच्चे मुसाफिर की पहचान है, परन्तु मानव शरीर की अपनी सीमाऐं हैं हम इन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। यहाँ कवियित्रि पथिक को कहना चाहती है कि हे पथिक चलना है दुर तक थोङा रुक जा और अपने अंदर ऊर्जा का संचार कर ले।

 राही


ओ राही रे, थोडा सब्र कर ले ।

ठहर जा कुछ पल तु, कुछ पल थम जा ।

दूर तक जाना तुझे, सास ले ले आ ।

ओ राही बावरे, थोडा ठहर जा ।।


जाना है दूर तक तुझे ।

आ पास मन हलका कर जा ।

मैं हूँ बावरा मन तेरा, तेरी हाँ ले रहा ।

पुछ रहा हूँ, तुझे मेरी बात मान जा ।

जाना है दूर तुझे, साहस कुछ भर जा ।

ओ रे राही, थोडा सब्र कर ले जरा ।


सामना होगा पर्वत, पठार,सागर से ।

लोग मिलेंगे बहुत, थोडा साहस भर जा ।

ओ रे राही, बावरा ना होना ।

पहुँच जायेगा मंजिल को ।

थोड़ा आराम तो कर जा ।।


जाना है दूर तुझे थोड़ा ठहर तो जा ।

ओ राही रे, थोड़ा सब्र कर ले जरा।।


जाना है दूर तक जो, थोडा मेरी सुन ।

बैठ कुछ पल को मेरी सुन जा ।

जल्द बाजी कर ना, आराम से सफर कर जा ।

ओ रे बावरे राही रे, थोड़ा रूक जा ।।


Kavitarani1 

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