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 पर 


 मैं अंधेरे से नहीं डरता,

 पर भय उजाला ना होने का है ।

काँच की कस्ती से नुकसान नहीं मुझे,

पर जोखिम जख्म लगने का है ।

कहने को तो सब ठीक ही है जीवन में मेरे,

पर जो निरंतरता नहीं रहती जीने में,

टिस उसकी है ।।


मैं गिरने से नहीं डरता, 

पर भय गहरे गढ़ढो का है ।

हालातों से चार हाथ होते रहे हैं मेरे ,

पर बदकिस्मत हूँ कहीं; ये डर लगता है ।

जानता हूँ सब है साथ मेरे हर समय,

पर किसी मोड़ पर अकेलेपन के भाव से मन डरता है ।।


मैं हारने से नहीं डरता,

पर जीत पर खुश ना हो पाने से भय लगता है  ।

मेहनतकस हूँ मैं,

 पर आलस घर ना कर जाये इससे डर लगता है  ।

हालातों को दोष नहीं देना चाहता मैं, 

पर जो हाल ना बता पाये उससे मन रूठा रहता है  ।।


Kavitarani1 

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