Betuki batein logo ki / बेतुकी बातें लोगों की


 

बेतूकी बातें लोगो की


क्यों आने पर पुछतें हैं, "मैं आ जाऊँ क्या?"

खा लेने पर पुछते हैं," मैं खा लूँ क्या?"

सुनाने लगते हैं अपनी दुःख भरी दास्तान,

और कहते हैं,"मैं सुनाता कहाँ?"

सबसे दुखी अपने को बताकर,

सब जानकर अनजान बन,

सर्दी में मेरी चादर खिंचकर,

रिसकर मुझे रिझाते हैं।

कुछ तो आदत सा बन मुझसे दूर जाते हैं,

चिढ़ातें हैं मेरी एकान्त जिन्दगी पर।

तंज कस-कस कहते हैं,

भरी सर्दी में पूछते है,"इतनी सर्दी कैसे है?"

आज इतनी सर्दी क्यों है?

हवायें चल रही है,

सर्द हवाऐं चलने से सर्दी पङ रही है।

मन करता है कुछ और कहने को,

कैसे कहूँ कि इससे ज्यादा सर्दी तो तुमने दी।

कर्ज पहले ही था मुझ पर, तुमने मेरी चादर और ले ली।

मुड पहले ही था खराब मेरा,

तुमनें तो मेरे समय की भी हालत खराब की।

फिर भी मन में भार लिए,

और सर्द हवाओं को अपने ऊपर लेकर,

बातों को मन में लिए,

मैं हॅसता हूँ और कहता हूँ।

हाँ आज सर्दी ज्यादा है।

आपके आ जाने पर भी ज्यादा है।

ये सर्दी का मौसम है।।


-कवितारानी।

 


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