मैं आज जीता हूँ कल का पता नहीं / Main aaj ko jeeta hun kal ka pta nhi



मैं आज जीता हूँ कल का पता नहीं


पल भर के लिए रुकता हूँ, हॅसने के लिए।

जो ठोर मिल जाये मुझे समझने के लिए।

मैं कल पर शिकवा नहीं करता रोने के लिए।

साथ लिए चलता हूँ सपने, आज के लिए।

सब कहते हैं कल की सोंच भी लिया करो तुम जरा।

मैं कहता हूँ, मैं जीता हूँ आज को कल का पता नहीं।


ना सुनहरे रास्ते कल के मन भाते हैं।

ना आभा नयी सुबह की जगाती है।

रात के तारे, दिन के फव्वारे सारे।

समझा नहीं पाते आज को हमारे।

कल की सोंच आज बिताया नहीं करता अब।

मैं आज जीता हूँ कल का पता नहीं कुछ।


आखरी कुछ सालों तक, हर महीनें, हर दिनों में मैंने।

कुछ परखा है अपने आप को, समय को, हालातों को।

बहुत कुछ रह जाता है हर समय आज को।

जब-जब मैंने सोचा है जीना है कल की बात को।

समझ गया हूँ जीवन के एक आयाम को।

वक्त वही बहतर है जो देता निरंतर काम को।

छोङा ना कुछ कल पर अब मैंने जो आज हुआ नहीं।

मैं आज जीता हूँ क्योंकि कल का पता नहीं।।


-कवितारानी।

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