एक त्योहार और गया / ek aor tyohar gya



एक त्योहार और गया


गुजर गया त्योहार एक और।

परवान ना चढ़ी पतंग मेरी।

तरसता रह गया खुद में ही।

साँस ना जुङी साँस से ही।

कब से सोंचा था कल बेहतर होगा।

आज नहीं हुआ चलो कल तो बेहतर होगा।

हर कल में मेरी कल की उम्मीद बिगङी।

आज की अधुरी जिन्दगी रह गयी।

एक और त्योहार गया रह गयी साँसे अधुरी।

आस तो टुटी थी रह गयी प्यास अधुरी।

ऐसा तो कल भी था मेरा मन लगता ना था।

लगती ना थी आस किसी से किसी से प्यार नहीं था।

ना प्यार आज परवान है।

जाने क्यों फिर से त्योहार कोरा रहा ।

गुजर गयी एक दिन की ओर जिन्दगी।

गुजर गया त्योहार एक ओर।

परवान ना चढुी पतंग मेरी।।


-कवितारानी।


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