हवायें खिलाफ / havayen khilaf
हवायें खिलाफ
ऊपरी धुन था, था अपने लिहाफ।
चलता रहा अकेला ही, हवायें थी खिलाफ।
कभी मंद-मंद, कभी शौर-शौर।
आती जाती कानों में खिंचती थी डोर।
काया कंचन हुई-हुई शीत चुभन भी।
चली जब शरद ऋत तो लगती थी टीस।।
चलता रहता गलता रहता, रहता फिर बंद-बंद।
थोङी तेज कभी-कभी मंद-मंद करती हवाएं तंज।
रुकना था कभी सिखा नहीं चाहे रहूँ पुरा या हाॅफ।
लगता था दुर्दिन है जैसे हो हवायें खिलाफ।
अपने लिहाज अपने हिसाब खिंचता डोर चलता सख अपनी लाज।
कि कोई ठेस नहीं, अब कोई पेंच नहीं रहता में अपने लिहाफ।
मन में उठता बढ़ता रहता करके खुद से जिहाद।
नजर उठाई पता चला हवायें ही थी मेरे खिलाफ।
कभी ऋत मेरी स्थाई ना आई।
ना एक निरंतर समय की परछाई।
जाने कब किस घङी बीत गई एक मिसाज।
चलते रहता, बढ़ते रहता थी भले हवायें खिलाफ।
सोंचता ना कोसता ना था, दृढ़ किये अपने लिहाफ।
चलता रहता, बढ़ता रहता चाहे थी कितनी हवायें खिलाफ।
चाहे थी कितनी हवायें खिलाफ।।
-कवितारानी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें