कटी पतंग / kati patang



कटी पतंग


कभी डील-डील, कभी खिंच-खिंच।

कभी उङी-उङी, कभी कटी-कटी पतंग।।

तंग पर तंग, कर हर पतंग भंग।

चली गई दुर कहीं आखिर कार मेरी पतंग।।

हवा हिलोर चढ़ाई थी होकर श्याम रंग।

देख दुर अनन्त सार अब जा रही अनन्त मेरी पतंग।।

कौन डोर दृढ़ दंश हुआ की हो गई भ्रंश।

देखता रह गया कि जा रही मेरी कटी पतंग।।

कर धार तार बङा भार चल पङी हवा रंज।

उठा ठोर पंतग रोल उंमग हुई फिर से अंग।।

कभी इस ओर, कभी उस ओर कर मुझको तंग।

कि हवा वेग हुआ तेज चली जा रही दुर कहीं मेरी पंतग।।

देख रण छोर ढिली ढोर बङा दी मैंने उङा दी मैंने उमंग।

भेरी हुई जयकार हुई कि मैंने उङा दी कटी पतंग।।

एक ओर गया दुजी ओर गया कर दिये गढ़ सब भंग।

इस ओर दिखे उस ओर दिखे बह रही सब कटी पतंग।।

वो श्वेत श्याम योध्दा साम चित्र सी आई भुजंग।

कौन जार लेप आये कि कत्ल किया हुई कटी पंतग।।

निराश नाश ना होकर हताश फिर उठा की सर पर जंग।

इस ओर गई उस ओर कई जाती रही मेरी सब ओर फिर पतंग।।

आज चली मनचली हवा संग नव उमंग संक्रांति संग।

सिखा गई सिख कई कटती रहती है हर रोज कई कटी पतंग।।


-कवितारानी।


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