ले चल दुर कहीं / le chal dur kahin



ले चल दुर कहीं


ले जा दुर कहीं की अरमानों की ख्वाहिंशे है।

सपनों की सेज से दुर कहीं पैमाईश है।।

ले जा ख्वाब मेरे आँखो मे आ जाती नमी।

खो जाता हूँ मैं, जो तु संग नहीं।।

आजमाइश जिंदगी, कह दुँ कमी है तु ही।

ना कल तु हुआ, ना आज भुला हूँ कहीं।।

दबे अँधेरे कोने रहते हो तुम कहीं।

आजमाशें आ जाती रहके यहीं।।

ले जा दुर कहीं की अरमानों की ख्वाहिशें है।

सपनों की सेज सजी दुर है आजमाइशें भी।।

ले चल संग मुझे भाता नहीं जग कहीं।

जीता हूँ रोज में जिंदा है तु मुझमें ही।।

हाँ वो दिन फिर से आ जाते है मन मैं कभी।

ना चाहते हुए भी रोक पाता हुँ मैं नहीं।।

चल संग चल मेरे मैं कभी साथ छोङुगाँ नहीं।

मेरा मकसद तुझे पाने को है तेरे दिल में बसना ही।।

ना चाहूँ तेरी काया को काया में मेरा कुछ नहीं।

सपनें हैं अपने हैं जोर है आजमाइशें भी।।

चल संग चल मेरे सपनों की दुनिया है हसीन।

आ चल संग मेरे अकेला हूँ रुका तुझमें ही।।

ले जा दुर मुझे लगता है डर अँधेरे से कहीं।

सपनों की सेज है ले चल दुर कहीं।।


-कवितारानी।

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