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डर भी है / darr bhi hai

  डर भी है परिवर्तन की लहर में डर भी है। हवा, पानी, जीवन की बदल में डर भी है। कैसे होंगे दिन अकेले एकान्त के। धोरों वाली मिट्टी में होंगे कैसे खैल वे। कब जाके सुकून मिलेगा मेरे लहजे को। प्यास अधुरी कब मिटेगी, कब जाके शांत होगा चित्त मेरा ये। परिवर्तन की लहर में डर भी है। बदलने को जमीन मन निडर भी है। जाने को जहान तैय्यार हूँ मैं। अपने हिसाब से जीने को तैय्यार हूँ मैं। तैय्यार हूँ कि अब अकेले हाथ मजबुत है। करना है बहुत कुछ उससे तैय्यार हूँ। परिवर्तन की लहर में डर भी है। आगे जाने से पहले म मैं डर भी है। किसी का साथ पाने को डर भी है। किसी का साथ ना मिलने से डर भी है। परिवर्तन की लहर में डर भी है।। -कवितारानी।

बाल मनुहार / bal manuhar

 बाल मनुहार नटखट नादान रंग रहता हर वार। स्कुल जाते पाते रहते हम बाल मनुहार। बात वात हमेशा होती, कुछ ही बस सार। हाथ दात मधुर साथ मेरा बाल मनुहार। कभी मंद-मंद, कभी रन्ध्र-रन्ध्र होती धार। मन उल्लास, तन आलास पर चलती रहती बाल मनुहार। पास रहे मेरे साथ रहे हमेशा सबका प्यार। मन भरु खुलकर जिऊ मिला जो भी बालल मनुहार। कसौटी समय रोकता रहता करता मुझसे लार। कर हुलार अपने अनुसार जीता में बाल मनुहार। कौन कपट मन कहता भरता आह हर बार। बिछुङन की आहट होये जो बाल मनुहार। बाल मनुहार उल्लास हर बार। प्यार हर बार बाल मनुहार।। -कवितारानी।

नया जमाना है / naya jamana hahi

  नया जमाना है  ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ने उठने पढ़ने, ये प्रगति मोढ़ का जमाना है। दिखावे के साथी आते, गाते मन से मन बहकाते। लाते सपने बनते अपने, ये दिखावे का जमाना है। ये आजमाने का जमाना है, स्वार्थ ही सब माना है। सिध्द अपने काम ही, मिलने का ये बहाना है। ये निज का बहाना है, हर मोङ पर गाना है। आगे बढ़ने को दुसरे को गिराने का जमाना है। हित का बहाना है, ये नजदिक ही आना है। प्रेम पथ सब गाते आते, मन को समझाना है। ये लत का माना है, ये निज का जमाना है। ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ते स्वार्थ रोह पे, ये होङ मोङ का जमाना है।। -कवितारानी।

कली हूँ मैं / kali hun main

कली हूँ मैं आज रो दी मैं तेरी फटकार से, रोक ना पाई आँसु तेरी डाट से,  खता हुई तो समझाना था, मेरी गलतियों को देना सहारा था, फिर से खिलकर की में महक उठती, कली थी मैं कि फिर चहक उठती, इतना ना दबाव डाल, ऐ माली मेरे ना दाव डाल, मैं सीधी साधी बढ़ती हूँ, तु भी जानता है मैं बनती बीगङती है, कोई हवा का झोंका हिलाता है, कोई शीत लहर बुलाती है, मैं जाती कहाँ तेरी बगीया से, पानी ना ज्यादा डाल, ना खाद से जला ज्यादा, खाद डाल की सह सकुं, काट- छांक की बढ़ सकुं, सुन्दर उपवन जो मैं खिलुंगी, तेरे आँगन की शान बनुँगी, रुक जा थोङा की आगे बढ़ सकुं, कली हूँ मैं तोङ ना की फुल बनुँगी, कली हूँ मैं कि फिर खिलुँगी। -कवितारानी।

सब शांत है /sab shant hai

  सब शांत है गलियारा था बगीया थी, शांत दोपहर पाठशाला थी। महकती बहकती आली थी, नम आँखे थी कपोल भी। कैसे भावुकता का सागर बहता, देखा कैसे आँगन था रोता। देख रहे नव युवती युवक भी, कह रहे अक्ल विदुषक भी। समझ रहा एकान्त अन्तर्मन,  रोकुं कैसे बहता मन। ना अंत दिखे अन्तर्ध्यान हुआ, बहते नयनों मे सब सार हुआ। कौन समझे खता हुई, माफ करदो मैं पापी ही। दुर तलक उजियारा है, मति भ्रम बस अँधियारा है। नहीं दिखा नम भावी भाग था, भुल हुई विकराल रुप था। बीत गया अब याद है, दिन गया सब शांत है। बीत गया सब शांत है। भूल गई सब शांत है।। -कवितारानी।

नित निरंतर आहट / nit nirantra aahat

 नित निरंतर आहट नित निरंमित भौर ऊठूँ। स्नान, माँग पठन करुँ। पाठन कार्य रोज सवेरे। बोलते करते शाम को ढेरे। शाम आम मन भिगोति। खान पान कर रात होती। निशा नाश किताबें पढ़कर। नित निरंतर उठकर पढ़कर। कटते रह रहे दिन मेरे। अपने मार्ग अपना काटे। हम भये मुर्ख सपने बाटें। मन बहलाये रोज बातें। लोग कहे कर्म के भाटे। कर्म कठोर खुशी अपार। रोज लङते बढ़ते पढ़ते पार। कहे किससे किस्से सार। शाम को बेठते होकर हार। अपने मन की बात कहूँ तो। थका नहीं पर कब तक ही। चलना है मुझको भाता। पर मनका अँधेरा सहा ना जाता। कौन भौर याद ना दिलाती। खा गई बैरी प्यार की बाती। जलता रहता मन दिया सा। कहना नहीं हाल जिया का। नित नियमित दिन ढलते। कितने सपने बनते बिगङते। खुशी किसी की मन चढ़ती। पल भर से ज्यादा आस ना बढ़ती। सांस थमे जब कोई पलटे। दिल के पन्ने नम करते। नित नियमित संघर्ष रत। खुद से लङता रहता रत। शीत गलन मुझको भावे। कठिन निद्रा अब ना आवे। ध्यान भंग अब अंग जलन। खो गई जीने मरने की लगन। मन मस्त जब भीङ गावे। उलझे जग में चैन पाये। पलटी हवा अब मन नहीं। कट जाये जीवन जल्दी अब। आस नहीं अच्छा होने की अब। सब रद्द सब रत कुछ नहीं। ढल...