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बस थोङे दिन की बात है / bas thode dino ki baat hai

बस थोङे दिन की बात है बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है, चलना है राह पर बहुत अभी मंजिल जरा पास है। बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है, कठिन डगर मगर हौंसलों में उङान है।  आहट हुई थमनें की मंद हुई चाल है, अकेली अपनी राह है अकेली अपनी चाह है। कठिनाई भरी राह है दुख भरा जीवन है, जिम्मेदारियाँ हजार है हौंसलों में अभी जान है। बस थोङे दिनों की बात है हौसला अभी साथ है, साथ है उम्मीदें मेरी साथ मेरा जहान है। सपने है स्वर्णीम मेरे मंजिल उज्ज्यमान है, बस थोङे दिनों की बात है हौंसला अभी साथ है। थोङा दिया साथ हौंसले ने तब कौने मेरे पास है, थोङा दिया साथ डगर ने मंजिल ना मिली तो। जीवन अपना भी बेकार है पर अभी हौंसला मेरे साथ है, बस कुछ दिनों की बात है, हौंसला मेरे साथ है। बस कुछ दिनों की बात है।। -कवितारानी।

वैभव भरी मंजिल की ओर / vaibhav bhari manjil ki aur

वैभव भरी मंजिल की ओर  कहले ही तु चाहे कुछ भी मैं नहीं घबराऊँगा, कितनी ही तु अटकलें लगा दे मैं बढ़ता जाऊँगा। भेज हजारों अपने दुत में उनसे लङ जाऊँगा, रोक ना पायेंगे तेरे दुख के तीर में मैं घायल भी। बढ़ता जाऊँगा मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा, तुने तो हर राह पर कांटे बिछाए। तुने तो रास्ते ही बंद कर दिए, कर दिया अकेला मुझे इस राह पर। जाना कहाँ पता ना रहा मुझे ना हौंसला रहा था साथ, फिर भी आ पहुँचा यहाँ तक अब जाना है वहां तक। जहाँ की रह शाम सुहानी होगी, अनौखी दुनिया वहाँ की दिन होंगे मस्ती भरे। ओर रात होगी खुशी भरी, धन, वैभव, समद्धि सब होंगे सुख होगे सुख के साथ। और साथ हो अपनों का. प्यार होगा सब में इतना, जितना देखा ना किसी ने, मुझे पाना है उस जहाँ। को जहाँ मिले यह सब मुझको, अब ज्यादा दुर नहीं यह सपना, यहाँ सब है मेरा अपना। मैं आगे भी यही घबराऊँगा, मैं वैभव भरी मंजिल जरुर पाऊँगा।। -कवितारानी।

कहानी देवा की / kahani deva ki (part-1)

कहानी देवा की अजब-गजब करता है कारनामें, अजब-गजब उसके किस्से कारनामें। सुनता नहीं किसी की बात, करता वही जो मन को आवे रास। सुनाता हूँ मैं कहानी एक पनवाने की, नहीं है जो किसी का गैर ऐसा दोस्त देवा। बातें रहती उसकी बङी-बङी, जिन्दगी रहती अधिकतर सपनों में पङी। अजब-अनौखे उसके खयाल ऐसा है ये रामदयाल, बात सुनों बचपन की जिसमें केवल पङाई ही उसके अङचन थी। करना दुनिया में ऐश इसीलिए बैंच डाली किताबें शेष, घरवालों ने लगाई फटकार पर कहा पङे इनकों- इनको कोई फर्क मेरे यार। बच्चों संग खैलना हर वक्त मौज-मस्ती से गुजर रहा था कि आ पङी इन पर गाज, माता-पिता ने छोङ दिया साथ। पर चलती रहती दुनिया दारी, मत तो केवल इनकी ही थी मारी। कमाने की उम्र हो चली पर खेलने से मन ही ना भरे, जोश-जोश में गये कमानें, दो दिन की कङी मेहनत। तिसरे दिन घर पर की लङाई ये काम भी इनको रास ना आया, शौक लगा गाये लाने का सपना बुना तबेला बनाने का, एक की दो और दो की चार करेंगे। दुध, दही, घी से अमीर बनेंगे पर सपने कहाँ सच होते उधार कर लाया गायें, इनकी भरपाई छठे दिन गायें रही ताक हाट, क्योंकि अब जरुरत थी मोबाईल लाने की। दो दिन ना चला दुध का व्यापा...

क्यों / kyo

क्यों मैं तो सीधा जा रहा था पाने को मंजिल। मैं तो अकेला पा रहा पाने में मंजिल। फिर क्यों मुझे इस झमेले में डाला। हाय तुने मुझे फिर मार डाला। क्यों तुनें दिखाये सपने मुझे हसीन रातों के। क्यों गले लगाने को ललचाया। मैंने तो नहीं की कभी पाने की भी कोशिश। तुझे फिर क्यों तुने मुझे फंसाया। काली गहरी आँखों में धकेल दिया मुझे। दिखाकर प्यारी मुस्कान से घायल कर दिया मुझे। हाय अब क्यों अकेला छोङ दिया मुझे। अब क्यों करुँ किसी पर भरोसा जब विश्वास ही ना रहा किसी पर।। -कवितारानी।

खोई- खोई राह / Raah hai khoi Khoi

खोई- खोई राह चलते-चलते फिर रुक गया हूँ। जाना चाहता हूँ कहीं पर जाऊँ कहाँ। हर जगह जला रही है चिंता। हर मार्ग पर है दो राहें। उलझन में है जिंदगी इसे सुलझाँऊ कहाँ। कोई दाँये बताता कोई बताता बायें। जाने को है एक मंजिल को पर दुसरा जाता कहाँ। राह में है अङचने कई। कई बेङियाँ है जकङी हुई। सब कदम रखुँ सोंचकर पर सोचुँ कब कहाँ। अब तो मंजिल पास आ रही। पर में देख नहीं पा रहा। चलते-चलते फिर रुक गया हूँ। क्योंकि जाना चाहता हूं कहीं पर जाऊँ कहाँ। सोंच रहा हुुँ अब तो अजब है तेरे खैल। तेरे खैल ना समझा कोई, बता मुझको मेरी। राह है जो खोई-खोई।। -कवितारानी।

भविष्य का राही / bhavishya ka rahi

 भविष्य का राही मन में कोई डर है भविष्य की डगर है, डगमगाये ना ये पल-पल इसी का डर है। आ रहे हर वक्त झोंके लग रही है ठोकर, पल-पल बहक रहा मन न स्थिर रहा। समय ना ठहर रहा हर पल निकल रहा, निकले पल कि यादों मे आज मन बहक रहा। भविष्य का अभाव है पथ भी भ्रमित रहा, चल रहा नाविक बन दिशा का भी ज्ञान नहीं। नहीं रहा कोई हौंसला ना साहस की बात है, पथ विचलित मन विचलित तन का ना आस रहा। ना आस रहा भु लोक का कोई, आकाश का पता कहाँ, फिर भी छुने की उम्मीद में मंजिल को ढुँढ रहा। रहा ना कोई साथ यहाँ ना कोई बतला रहा, जाना है कहाँ मन खुद से ही पुँछ रहा। अनजाना रास्ता है अनजानी मंजिल, जाना कहाँ पता नहीं फिर चला जा रहा। ईश्वर का साथ था पर मृत्यु लोक का राही था, वक्त था कलयुगी मानव थे सब दुखी। दुखी दुख मे जो कर्म किया वही उसे डरा रहा, आज बनके राही मैं मानव जगमगा रहा। क्या पता पहुँचेगा या नहीं बस अपनी धुन में जा रहा, एक राही अकेला जा रहा।। -कवितारानी।

यादों के पल / yadon ke pal

यादों के पल  याद आये वो पल जब में बच्चा था, मन का थोङा सच्चा था। याद आये वो दिन जब में कच्चा था, पर पङने में सबसे अच्छा था। याद आयी वो यादें जब दिन भर मस्ती की, हर वक्त एक नई कहानी थी हर वक्त मजा था। हर समय आजादी थी स्कूल की यादें थी, दिल कि बातें थी भविष्य की सोगातें थी। याद आये वो पल जब दोस्तों का साथ रहा, हर वक्त अपना मजा रहा कभी लङाई थी। तो कभी बस अपनी पढ़ाई थी, कभी घुमनें जाते कभी पार्टियाँ मनाते। हर दिन कुछ नया था आज क्यों ये ना रहा, बिछङे है फिर आज याद क्यों उनको करें। मन क्यों उन्हीं यादों में अब खोया रहे, अब भी करुँ मजा चाहे हो जाये कोई सजा। पर वक्त कहाँ ठहरता दोस्तों का मैला कहाँ लगता, कहाँ मिलती वो सौगातें दोस्तों के साथ है। दुनिया की सौगातें अब तो बस दुनिया बसाओ, नौकरी पर जाओ भविष्य के प्लान बनाओ। फिर भी याद आती अकेले में कभी भुली बिसरी यादें, तो मन को समझाओ और सो जाओ।। -कवितारानी।

क्यों मेरा मन उदास रहा / kyo mera man Udas rha

 क्यों मेरा मन उदास रहा बुँद-बुँद बरस रही, दुर-दुर तक फैल रही। सावन में फिर ये अठखेलियाँ है कर रही। कभी झुम रहा है मन कभी रहा है मन। क्यों अब बैचेन है आँखों में ना नींद है। हँसने को चाहता है पर हॅस नहीं रहा। रोने को कहता है पर रो भी नहीं रहा। खुद से ही परेशान है क्योंकि अभी भी नादान है। गलतियों से डर रहा पर मरनें से ना डर रहा। आज फिर मन बैचेन है अकेला है क्यों फिर आज। मंजिल को पाने की चाह में तन को टटोल रहा। बुँद-बुँद करके फिर बरस रहा। सब तरफ एक रोनक है मौसम में भी महक है। सब का मन उत्साहित है फिर में क्यों हताश हूँ। दुर-दुर तक महक फैली आज फिर घटा गहरी। बिरली तङक जोर से रही, बादल भी गरज रहे। पानी की हर लहर नई, नया है ये परवान। बुँद-बुँद में है सबकी प्यार फिर मेरा मन क्यों उदास। क्यों मन मेरा घबरा रहा, क्यों घर बैठा उदास रहा। क्यों हर वक्त सोंच रहा, क्या ये सोंच रहा। कुछ समझ क्यों नहीं आ रहा किसे ये ढुँढ रहा। इस मनमोहक सौन्दर्य भरे वातावरण में इस खुशहाल, मौसम में भी मेरा मन क्यों उदास रहा। क्यों मेरा मन उदास रहा. किससे पुँछु इसका जवाब। मेरा मन किसे ढुँढ रहा, क्यों ये उदास रहा। -कवित...

मन बावरा उलझ रहा / man bavra ulajh rha

मन बावरा उलझ रहा दुनिया पल-पल बदल रही, सबके मन से खैल रही। मौसम तो बदले सबके मन को भी बदल रही। हर बदलते मन के झाँसे में ये मन बावरा उलझ रहा। ना कुछ समझ रहा ना कुछ सोंच रहा। एक पल कि खुशियाँ पाने को सालों साल गवाँ रहा। हर एक दोखे में हर एक जाल में उलझ रहा। बीते पल याद नहीं याद नहीं वो टिस पहले की। ना याद रहा पहले का गम वो अकेले पल। जो समय था बुरा बीत गया पर फिर उसी तरह के जाल। आज क्यों मन मेरा बावरा उलझ रहा। नहीं सोंच रहा कल कि फिर नहीं गमों की सोंच रहा। फिर वही गलती करके मन बावरा उलझ रहा। बदलते इस मौसम में इन मनों के फेरे में। नहीं में कुछ सोंच रहा नहीं कुछ समझ रहा। मंजिल को तो भुल रहा भविष्य की भी नहीं सोंच रहा। दो पल कि खुशियों मेें जीवन भर का गम ले रहा। क्यों मेरा मन आज ये गलती कर रहा। मन बावरा उलझ रहा क्यों ये नहीं समझ रहा। खींच रही है वो हवाएँ बुला रहे हैं वो पल देख उनकों। रुका आज नहीं जा रहा ये बावरा उलझ गया। निकाले से नहीं निकल रहा ये तो पुरा उलझ गया। संभालने की में कोशिश कर रहा आज फिर फिसल गया। मेरा मन बावरा उलझ गया।। -कवितारानी।

बीते पल / beete pal

बीते पल जो बीते है खुशी के पल हॅसी के पल, यादों के पल अनजाने पल मस्ती के पल। याद आ रहे हैं वो पल इस पल, छोङ गये यादें अनेक किस्से अनेक, छोह गये तन्हाई फिर याद आई रुसवाई, याद आया बीते पलों का हॅसना, क्यों बीते ये मौज-मस्ती के पल, कहीं मन लगता ना अब इतने हॅसी थे वो पल। चैन गया  नींद गयी बस याद रही, घुम रहे चेहरे अनेक बातें अनेक, क्यों टिस सी जग रही क्यों याद ही बस रही, क्यों नहीं रुकते आँसु जब ना होते ये पल, कभी-कभी मिली खुशी गजब आस बनी, भुलना चाहा पर हर पल मेरे पास रही, ये बीते पल तोङ रहे मेरा मन मेरा तन। तोङ रहे मंजिल मेरी डगर. छोङ रहे अकेला फिर यादों में हर दम, हर दम बस यादें हैं क्यों नहीं कोई हम दम। ये जो है बीते पल याद रहेंगे जीवन भर, याद रहेगा जीवन डगर ये खास पल, ये बीते पल आये तो जी लुं इन्हें जीवन भर, भीगे-भीगे फुर्सत में यादों के पल।। -कवितारानी।

फिर भुखा रहा / phir se bhukha rha

  फिर भुखा रहा दिन चढ़ा रात बीती, दुपहर हुई, चिङिया चहकी। सबने खाना खाया पर किसी को रहम ना मुझ पर आया। सबने अपने मन की चलाई खुदगर्जी से दिल लगाई। सबने पेट की आग बुझाई मेरी याद किसी को ना आई। जो बनाता सबके लिए खाना उसे ही भुल गये दुख में देखो। कैसे इन्होने की अपनी भरपाई ऊपर से गुस्सा दिखाए। कैसे ये अपनी गरज दिखाए, मुझको दुख में भुल जाये। सबने अपने मन की चलाई, कैसे अपनी बात बनाई। गलती सारी मेरी बताई. कि क्यों बीमारी तुने लगाई। दवा तो दुर रही, एक रोटी ना इन्होने दिलाई। हाय कैसी गरज निभाई, खुद की भी ना मन में इनके आई। मैं ना रहा तो कौन करेगा काम आगे, कौन करेगा रसोई। इतनी भी इनके समझ ना आई, मन की आग और झुलसाई। दवाई ले भी आया कहीं से तो पेट की शाँति ना पाई। कहीं से तो कोई भुख दे मिटा, हमेशा की तरह क्यों मेरी भुख बढ़ाई। स्नेह ना मिला कभी ना सांत्वना की छाई। हर वक्त दिल में कसक सी क्यों जगाई। क्यों दुखों को बढ़ाया हमेशा क्यों ना ये भुख मिटाई। फिर भुखा रहा स्नेह, सांत्वना से ना हो पा मिलाई। दवा तो क्या मिलती एक टुकङा रोटी ना मिल पाई। हाथ पैर काम करे तब जाके मैनें भुख मिटाई। तब भी तो मेरी ना...

आज फिर भटक रहा / Aaj phir rahi bhatak rha

आज फिर भटक रहा मंजिल की तलाश में, अपनों की चाह में, सुख की प्यास में, दौलत की रास में, आज फिर बनके राही में हूँ भटक रहा, फिर सोंच वही रहा, फिर सपना वही रहा। राह फिर भटक रहा, फिर सपना वही रहा, मंजिल की आस में मैं राहगीर भटक रहा, एक अजीब कशिश जगी, अजब मजा रहा, चार दिन फिर जमकर मेघ बरस रहा। फिर वही सुखा आया आँसु ही छाया रहा, दुनिया के दर्द से क्या, खुद से में गीर रहा, आज फिर राही बनकर पथ को चुन रहा, आज फिर नई राह है नई सोंच चली आज। आज सब नया है फिर भी फिसल रहा, जहाँ से चला था में वहीं पहुँच रहा, आज फिर भटका राही मन डगर से भटक रहा, किसी ने चढाया बढ़ाई से किसी ने डकेला कढ़ाई में। सब ने गढ्ढे खोद दिये, सब आस जता दी, पर आस से कोई रास नहीं, मन तो पगला रहा, मंजिल का पता नहीं क्यों राही चला जा रहा, क्यों राही झुठी राह में पथ-पथ भटक रहा, आज फिर राही भटक रहा।। -कवितारानी। 

मंजिल की तलाश में / Manjil ki talash mein

मंजिल की तलाश में मंजिल की तलाश में आज फिर डगर-डगर। आज फिर द्वार-द्वार ढुँढ रहा मंजिल अपनी। जिन्दगी की राह में कठिनाईयों की राह में। फिर रहा मगर-मगर आज भी मिली नहीं मंजिल। हर जगह ठहर-ठहर पुँछ रहा पता मगर। भटका रहा राहगीर मुझे फिर कैसे मिले मंजिल। हर जगह लुट है हर जगह है धोखा। जो दे रहा राही को मंजिल का टोटा। मिले किसे इस झुठे संसार में मंजिल यहाँ। कलयुग का है काल बङा भटका राही राह का। मंजिल की तलाश छोङ दी किसी ने। मंजिल की राह मोङ दी किसी ने। मंजिल को लुट लिया किसी ने दलाली छेङ। हर कोई जाना चाह रहा इस ऊँची इमारत पर। पैसों के ढेर हो जहाँ आलस का आसमां। धरती को पुछता नहीं  आकाश में हो पैर जहाँ। गरीबों की सोंचता ना जन्तुओं की जहाँ। ऐसी मंजिल है आम यहाँ, फिर भी। मंजिल की तलाश में मंजिल वाला। घुम रहा डगर-डगर, द्वार-द्वार अन्त नहीं। इस राह का कौन, कौनसी है ये मंजिल पता कहाँ।। -कवितारानी।

अकेला हूँ/ Akela hun

  अकेला हूँ आज मैं फिर अकेला हूँ इस डगर पर, आज फिर अकेला हूँ इस सफर मैं, मैं आज फिर अकेला हूँ इस स्वप्न लोक में, हाँ मैं तो अब भी अकेला हूँ समाज में। क्यों मैं अकेला हूँ नहीं जानता में ये, पर पहले भी तो अकेला था फिर आज क्यों, पहले भी तो तन्हाई थी साथ बस मेरे, पहले भी तो अकेले ही देखे थे सपने मैंने। पहले भी तो सब से रसवाई थी, फिर आज कैसे अकेला मैं तो बरसों से अकेला, ढुँढ रहा हमसफर आज भी आज भी तलाश है, आज भी कोई वफादार मिले ईमानदार मिले। प्यार का प्यासा तो पहले भी था, आज भी क्यों प्यास है, पहले भी जिन्दगी कठिन थी आज भी है, इस स्वप्न लोक-मृत्यु लोक में कौन अकेला नहीं है, पर जिन्दगी में तो सबके पास कोई साथी है। फिर मैं क्यो अकेला हूँ, मैं तो आज भी अकेला हूँ, कोई था चाहने वाला जिसने पैदा किया, उसे भी तुने छिन लिया, क्यों मुझे अकेला किया, अब तो कोई मिला दे जो तन्हाई मिटा दे क्योंकि, मैं आज भी अकेला हूँ, इस जीवन पथ पर अकेला हूँ।। -कवितारानी।

अगर सपने सच होते / Agar sapne sach hote

  अगर सपने सच होते अगर सपने सच होते तो कौन भगवान को पुछता, सब सपनों में ही सहते कोई नहीं जगाता। अगर सपने सच होते ते कौन काम करता, कौन मेहनत की रोटी कमाता। कौन पढ़ाई करता सब बीना पढ़े पास होते, कौन किसी से पुछता सब सपने देखते। कोई अपनी नौकरी का, तो कोई अपनी शादी का, कोई अपनी आजादी का, तो कोई अपनी प्रेमिका का, तो कोई  स्वर्ग का। अगर सपने सच होते तो कौन दुनिया में रहता, तब तो सब स्वप्न लोक से ही काम चलाते। ्गर सपने सच होते ते सब निष्कर्म में, आलस से भरे मद के प्याले होते। अगर सपने सच होते तो ये लोक एक आश्चर्य लोक दुष्कर्मों से भरा होता। अगर सपने सच होते तो, ना मैं होता, ना तुम होते, जो होते सब सपने होते। इसलिए सपने कभी सच नहीं होते।। -कवितारानी।

काश / kash

काश काश कोई मेरा भी अपना होता, काश सब भुल जाता कभी याद नही रख पाता। काश मैं कुछ समझ पाता, काश जो मन चाहता वो पा जाता। काश ऐसा हो जाता काश सच हो जाता, हर सपने को में सच कर पाता। काश जो में मांगता वो मुझे मिल जाता, काश सपने ना देखता जो देखता लौकिक होता। काश खुद से सर्माता, सब बता जाता, काश जिसे प्यार करता उसे बोल पाता। इजहार करताचाहे सकारात्मक जवाब ना आता, काश अपनी दुनिया अपनी मर्जी से जी जाता। काश हमेशा मन की कर पाता, मैं जो लिखता, जो कहता उसी के कर जाता। काश मैं कभी झुठ ना बोलता, सत्य पर ही दुनिया जी जाता। काश सबको अपना गहरा दोस्त बना पाता, काश किसी के भी मन को पढ़ पाता। काश मैं इस दुनिया मैं ना आता तो ये सारे गम ना पाता, इस काश को अपना साथी ना बनाता। तो इस संसार को जी जाता... -कवितारानी।

suni part-6 samajik jivan / सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन

  सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन सुनी सुनाई बात थी, कुछ साथ की बिसात थी, मिजाज ही कुछ ऐसा था उसका, मिले जिसे मन हर ले उसका। बातों के फटकारे करती, चिढ़ाये कोई ललकारे करती, अब डरती नहीं पहले सी वो, मुहँ पर कहती जो कहनी थी वो। सुनना किसी का आता नहीं, काम कोई रुक पाता नहीं, सबकी सुनती करती मन की, पर मन में डरती रहती मन ही। ग्याहरवीं में प्रवेश किया, विज्ञान संकाय को ही लिया, अच्छे अंक अच्छा भविष्य सोंचा, ध्यान लगाया तो किसी ने ना टोका। रोज पढ़ती अपनी धुन में, कमरा मिला अपने गुन में, मस्ती भी करती लङती भी थी, पर पढ़ाई के समय पढ़ती ही थी। समाज का अलग नजरिया, पुछे हरदम कहाँ साँवरिया, सुनके सुनी होती बावरी, अपने राग में गाती साँवरी। बोल कई बार कङवे करती, जो चिढ़ाये उसी से लङती, बुराई का घुंघट अब बढ़ रहा, चेहरे पर गुस्सा अब बढ़ रहा। बैठ अकेले खुब रोती, माँ बाप को भी कोसा करती, दुल्हे को नफरत से नापती, चेहरे को छुपाती और भागती। शाँत चेहरा अब उदास सा, हॅसता मुखङा बिन उजास सा, कुछ रोनक खिलने से पहले खोई, किस्मत कैसी सोंच के रोई। संध्या बंध्या बन चौखट देखती, छत पर जाकर क्षितिज देखती, नयनों से सपनें बर...

हाँ बीमार हूँ / han bimar hun

  हाँ बीमार हूँ कलयुग का अन्धकार है, झुठ का प्रकाश है। बेईमानी की हवा चली, दोखों का संसार है। समाज कह रहा है हाँ मैं बीमार हूँ। खुद से ही लाचार हूँ अपनों से बीमार हूँ। मानव मेें विध्यमान हूँ हर जगह से परेशान हूँ। हर वक्त झुठ की खाँसी चली फिर कमजेरी की बुखार है। लाचार का ईमान हूँ खुद ही खुद से बीमार हूँ। मानव ने मुझे बनाया है इसी ने मुझे सङाया है। इसी से आज लाचार हूँ मैं तो बीमार हूँ। हर तरफ गंदगी ही हर तरफ प्रदुषण दिया। मैंने ही तो वनों का नाश किया तभी तो मैं बीमार हूँ। घुसखोर का घुसा मीला चोरी डकेती ने चीरा। अब तो एक कंकाल हूँ हाँ मैं ते बीमार हूँ। पैसों का जो जादू चला लक्ष्मी जी को भी नहीं क्षमा। अरे भगवान तो है कहाँ सब पोसे का जो जाल है। इस अत्याचार में कौन सुखी इस संसार में। मैं तो ेक समाज हूँ मुझसे ही तो मैं बीमार हूँ। हाँ मैं ही तो बीमार हूँ दवा दारु तो चल रहे पर ये भी। कहाँ खल रहे िसे भी मैं बीमार हूँ हाँ मैं इन्सान हूँ। हाँ मैं समाज हूँ, मैं तो बीमार हूँ।। -कवितारानी।

हाँ मैनें प्यार किया / ha mene pyar kiya

हाँ मैनें प्यार किया हाँ मैंने प्यार किया तेरा इंतजार किया। हर पल तुझको याद किया तेरा एतबार किया। हाँ मैंने प्यार किया तुझको अपना मान लिया। जाने कब से ये हुआ मेरा तो चैन गया जब से ये हुआ। जीने की उम्मीद छोङ दी हर पल तेरी याद थी। एक पल देखने को मेरी हर उम्मीद थी। आँखो को तेरा इंतजार था दिल तो बङा बेकरार था। मुझको हर वक्त तेरा इंतजार था जब से ये प्यार था। कहने को ये बेकरार था पर जाने ये क्या हुआ। हर बार मुँह ना खुला और दिल बैठ गया। जब तुम आये सामने मैं तो खुद में ना रहा। अरे मुझे ये क्या हुआ तुझे खोने का डर रहा। पर मैंने तुझे खो दिया भुला पर भुला ना सका। हर बार तु ही याद रहा हाँ मैंने भी प्यार किया है। पता है तुम भी प्यार में हो परये तो संसार है। तुम ना कहोगे मुझे मैं ना कह सका तुझे क्या यही प्यार है। पर अब भी मुझे तेरा इंतजार है हाँ मुझे तो प्यार है। ख्वाब के पुल मैंने बनाये है सपनों का महल सजाया है। पर ये एक सपना है पर यही तो मेरा अपना है। इन सपनों के सहारे ही मैं कह सकता हूँ। हाँ मैंने प्यार किया बस तेरा इंतजार किया। हाँ हर बार बस तुझे याद किया बस तेरा एतबार किया।। -कवितारानी। 

मेरी तन्हाई / meri tanhai

मेरी तन्हाई अक्सर ये बेवक्त आई, कभी भीङ में तो कभी अकेले में आई। कभी आँसु लाई कभी बनकर गम समायी, हाँ ये मेरी तन्हाई ठेरों सवाल लाई।। ये रिश्तों से आई नहीं ये अजनबीयों से आई, ये तो दोस्तों से आई ये तो पहचान से आई। नहीं ये तो मेरे दिल से आई, ये मेरी तन्हाई अनेक उलझने लाई।। ये क्यों आई क्यों मुझको बहकाये, ये तो नई मंजिल दिखाये नई डगर है लाई। अरे ये तो पथ भ्रमित करने आई, मेरी तन्हाई मुझको हर वक्त उकसाये।। अरे ये तो आँखों से दिल में आई, अरे ये तो बातों से भी दिल में आई। नहीं ये तो कानों से दिल में आई, ये मेरी तन्हाई दिल के रोग है लाई।। हजारों दर्द ले के चली आई, दिल में गमों की बारात लेकर आई। कभी रुसवाई कभी राजी बनकर आई, हाँ ये मेरी तन्हाई दिल की गहराई लाई।। हाँ ये मेरी तन्हाई हर पल नई राह लाई, कभी गम-कभी खुशी से चमक लाई ये तन्हाई।। -कवितारानी।

दर्द के साये / dard ke saye

दर्द  के  साये हर वक्त मेरे दिल में आये। कुछ सपने तोङ लाये कुछ दिल तोङ आये। जब भी आये मुझे तङपाये। यही है मेरे दर्द के साये।। कभी बनकर दोस्त मुस्काये, कभी दिल ये समाये गम लाये। कभी आँखों से आये, और कभी खामोशी से निकल आये। ये मेरे है गम के साये, जो हर एकान्त में मुझे तङपाये। कभी रिश्तों से आये अपनों से लाये। तो कभी खुद से घबराये। पर जब भी आये मुझे भिगाये। ये मेरे गम के साये, क्यों मुझे तङपाये। हर साये से मुझे डराये, कभी अँधेरों मे ले जाये। कभी मुझको सताये कभी मुझको तङपाये। मेरे गम के साये हर वक्त मेरे दिल में आये। ये मेरे दर्द के साये। -कवितारानी।

आसरा / Aasra

आसरा आसरा है गम का मन मेरा। आसरा है दर्द का तङप का मन मेरा। आसरा है चाहतों का, सपनों का मन मेरा। आसरा है दिल से चाहने वालों का माँ का मन मेरा। इस आसरे से जुङी है कहानियाँ कई। कई ऊतार जढ़ाव अनुभवों का आसरा है मन मेरा। जिन्दगी गमों से भरी है पर गमों से भरा है आसरा मन मेरा। आसरा है आँसुओं का दुखों का यहां। आसरा है चाहतों का जो मिला कभी मन मेरा। कहते हैं सपने कम देखने चाहिए पर सपनों का है आसरा मेरा। कहते हैं दिल से कम सोंचना चाहिए पर दिल में ही तो है आसरा मेरा। आसरा है पल भर कि खुश नशीबी का मन मेरा। आसरा है ढुँढती खुशियों के संसार का मन मेरा। आसरा है नई आस का मन मेरा। क्या गजब का आसरा है मन मेरा। क्या बावरा है मन मेरा। -कवितारानी।

अँधेरे कोने / Andhere kone

अँधेरे कोने इन अँधेरे कोने से किसे मिलाऊँ। बहती अँधियों को किसे दिखाऊँ। मन को कुछ समझ नहीं। भर आ गया बस यूँ ही। इस भरे मन का बोझ बताऊँ किसे। बंद कमरे में बह जाऊँ सुनाऊँ किसे। रहता नहीं काबु खुद पर ऐसे में। कहना चाहता हूँ सब कुछ कहूँ किसे। सफलता के द्वार खङा ना अंदर ना बाहर। डर का मकान है खुला आसमां छोर बेघर। किस ओर जाना होगा संशय हर पल। देख रहा खिंच ले कोई की बह जाये कल। खुशियों की घङी में बह बह जाऊँ मैं। सफलता के मार्ग पर मुस्कुराऊँ मैं। डर का कोई मुकाम ना हो बस इतना है। कोई मेरा अपना और मन का हो सपना है। अँधेरे कोनो में हाथ कोई आये भी। बहती अँखियों को पोंछ जाये भी। बैठ अकेले संभाले था खुद को बताऊँ ये। इन अँधेरे कोनो से मिलाऊँ किसे। बहती अँखियो को दिखाऊँ किसे ।। -कवितारानी।

भारत की नारी / Bharat ki nari

 भारत की नारी अक्सर किस्से कहानियों में सुनाते सब हैरानी। कभी सिस काटती हाङी कभी मर्दानी झाँसी वाली रानी। कितने किस्से कहानियों की बात कहूँ याद है मुझे वो जुबानी। हकीकत मन से बयां, कैसी है भारत की रानी। आँचल में दुध आँखों में पानी, कौमल है भारत की नारी।। बखान जग में हिम्मत का कोई नहीं शामी। थर-थर कांपे शैतान रुप बने जब काली। हथियार हाथ महान होती वो शक्ति कल्याणी। अपने दम पर सार करे संभाल करे भारत की नारी। आँचल में दुध आँखों में पानी गजब है नारी तेरी कहानी।। दो घर अनन्त हाथ, मुख तुझे ताकते। बिन बोले परोक्ष, प्रत्यक्ष तुझे निहारते। आधार घर की बुनियाद, मजबुत करती तुम। अर्थ, धर्म, समन्वय सब का करती तुम। देख शक्ति अतुलित अचंभा होता होती हैरानी। आँचल मैं दुध आँखों में पानी भारत की तुम नारी।। कोमलता, सजागता, सहन सीमा की सार हो। मधुरता, सुंदरता, रस की खान हो। देव, दानव सब की विजेता हो। तेरे दंभ की सुनी मैंने भी कई कहानी। आँचल में दुध आँखों में पानी भारत की तुम नारी।। -कवितारानी।

डर भी है / darr bhi hai

  डर भी है परिवर्तन की लहर में डर भी है। हवा, पानी, जीवन की बदल में डर भी है। कैसे होंगे दिन अकेले एकान्त के। धोरों वाली मिट्टी में होंगे कैसे खैल वे। कब जाके सुकून मिलेगा मेरे लहजे को। प्यास अधुरी कब मिटेगी, कब जाके शांत होगा चित्त मेरा ये। परिवर्तन की लहर में डर भी है। बदलने को जमीन मन निडर भी है। जाने को जहान तैय्यार हूँ मैं। अपने हिसाब से जीने को तैय्यार हूँ मैं। तैय्यार हूँ कि अब अकेले हाथ मजबुत है। करना है बहुत कुछ उससे तैय्यार हूँ। परिवर्तन की लहर में डर भी है। आगे जाने से पहले म मैं डर भी है। किसी का साथ पाने को डर भी है। किसी का साथ ना मिलने से डर भी है। परिवर्तन की लहर में डर भी है।। -कवितारानी।

बाल मनुहार / bal manuhar

 बाल मनुहार नटखट नादान रंग रहता हर वार। स्कुल जाते पाते रहते हम बाल मनुहार। बात वात हमेशा होती, कुछ ही बस सार। हाथ दात मधुर साथ मेरा बाल मनुहार। कभी मंद-मंद, कभी रन्ध्र-रन्ध्र होती धार। मन उल्लास, तन आलास पर चलती रहती बाल मनुहार। पास रहे मेरे साथ रहे हमेशा सबका प्यार। मन भरु खुलकर जिऊ मिला जो भी बालल मनुहार। कसौटी समय रोकता रहता करता मुझसे लार। कर हुलार अपने अनुसार जीता में बाल मनुहार। कौन कपट मन कहता भरता आह हर बार। बिछुङन की आहट होये जो बाल मनुहार। बाल मनुहार उल्लास हर बार। प्यार हर बार बाल मनुहार।। -कवितारानी।

नया जमाना है / naya jamana hahi

  नया जमाना है  ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ने उठने पढ़ने, ये प्रगति मोढ़ का जमाना है। दिखावे के साथी आते, गाते मन से मन बहकाते। लाते सपने बनते अपने, ये दिखावे का जमाना है। ये आजमाने का जमाना है, स्वार्थ ही सब माना है। सिध्द अपने काम ही, मिलने का ये बहाना है। ये निज का बहाना है, हर मोङ पर गाना है। आगे बढ़ने को दुसरे को गिराने का जमाना है। हित का बहाना है, ये नजदिक ही आना है। प्रेम पथ सब गाते आते, मन को समझाना है। ये लत का माना है, ये निज का जमाना है। ये होङ का जमाना है, ये दौङ का जमाना है। आगे बढ़ते स्वार्थ रोह पे, ये होङ मोङ का जमाना है।। -कवितारानी।

कली हूँ मैं / kali hun main

कली हूँ मैं आज रो दी मैं तेरी फटकार से, रोक ना पाई आँसु तेरी डाट से,  खता हुई तो समझाना था, मेरी गलतियों को देना सहारा था, फिर से खिलकर की में महक उठती, कली थी मैं कि फिर चहक उठती, इतना ना दबाव डाल, ऐ माली मेरे ना दाव डाल, मैं सीधी साधी बढ़ती हूँ, तु भी जानता है मैं बनती बीगङती है, कोई हवा का झोंका हिलाता है, कोई शीत लहर बुलाती है, मैं जाती कहाँ तेरी बगीया से, पानी ना ज्यादा डाल, ना खाद से जला ज्यादा, खाद डाल की सह सकुं, काट- छांक की बढ़ सकुं, सुन्दर उपवन जो मैं खिलुंगी, तेरे आँगन की शान बनुँगी, रुक जा थोङा की आगे बढ़ सकुं, कली हूँ मैं तोङ ना की फुल बनुँगी, कली हूँ मैं कि फिर खिलुँगी। -कवितारानी।

सब शांत है /sab shant hai

  सब शांत है गलियारा था बगीया थी, शांत दोपहर पाठशाला थी। महकती बहकती आली थी, नम आँखे थी कपोल भी। कैसे भावुकता का सागर बहता, देखा कैसे आँगन था रोता। देख रहे नव युवती युवक भी, कह रहे अक्ल विदुषक भी। समझ रहा एकान्त अन्तर्मन,  रोकुं कैसे बहता मन। ना अंत दिखे अन्तर्ध्यान हुआ, बहते नयनों मे सब सार हुआ। कौन समझे खता हुई, माफ करदो मैं पापी ही। दुर तलक उजियारा है, मति भ्रम बस अँधियारा है। नहीं दिखा नम भावी भाग था, भुल हुई विकराल रुप था। बीत गया अब याद है, दिन गया सब शांत है। बीत गया सब शांत है। भूल गई सब शांत है।। -कवितारानी।

नित निरंतर आहट / nit nirantra aahat

 नित निरंतर आहट नित निरंमित भौर ऊठूँ। स्नान, माँग पठन करुँ। पाठन कार्य रोज सवेरे। बोलते करते शाम को ढेरे। शाम आम मन भिगोति। खान पान कर रात होती। निशा नाश किताबें पढ़कर। नित निरंतर उठकर पढ़कर। कटते रह रहे दिन मेरे। अपने मार्ग अपना काटे। हम भये मुर्ख सपने बाटें। मन बहलाये रोज बातें। लोग कहे कर्म के भाटे। कर्म कठोर खुशी अपार। रोज लङते बढ़ते पढ़ते पार। कहे किससे किस्से सार। शाम को बेठते होकर हार। अपने मन की बात कहूँ तो। थका नहीं पर कब तक ही। चलना है मुझको भाता। पर मनका अँधेरा सहा ना जाता। कौन भौर याद ना दिलाती। खा गई बैरी प्यार की बाती। जलता रहता मन दिया सा। कहना नहीं हाल जिया का। नित नियमित दिन ढलते। कितने सपने बनते बिगङते। खुशी किसी की मन चढ़ती। पल भर से ज्यादा आस ना बढ़ती। सांस थमे जब कोई पलटे। दिल के पन्ने नम करते। नित नियमित संघर्ष रत। खुद से लङता रहता रत। शीत गलन मुझको भावे। कठिन निद्रा अब ना आवे। ध्यान भंग अब अंग जलन। खो गई जीने मरने की लगन। मन मस्त जब भीङ गावे। उलझे जग में चैन पाये। पलटी हवा अब मन नहीं। कट जाये जीवन जल्दी अब। आस नहीं अच्छा होने की अब। सब रद्द सब रत कुछ नहीं। ढल...