सब शांत है /sab shant hai



सब शांत है


गलियारा था बगीया थी,

शांत दोपहर पाठशाला थी।

महकती बहकती आली थी,

नम आँखे थी कपोल भी।

कैसे भावुकता का सागर बहता,

देखा कैसे आँगन था रोता।

देख रहे नव युवती युवक भी,

कह रहे अक्ल विदुषक भी।

समझ रहा एकान्त अन्तर्मन, 

रोकुं कैसे बहता मन।

ना अंत दिखे अन्तर्ध्यान हुआ,

बहते नयनों मे सब सार हुआ।

कौन समझे खता हुई,

माफ करदो मैं पापी ही।

दुर तलक उजियारा है,

मति भ्रम बस अँधियारा है।

नहीं दिखा नम भावी भाग था,

भुल हुई विकराल रुप था।

बीत गया अब याद है,

दिन गया सब शांत है।

बीत गया सब शांत है।

भूल गई सब शांत है।।


-कवितारानी।

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