नित निरंतर आहट / nit nirantra aahat



 नित निरंतर आहट


नित नियमित भौर ऊठूँ।

स्नान, माँग पठन करुँ।

पाठन कार्य रोज सवेरे।

बोलते करते शाम को ढेरे।

शाम आम मन भिगोति।

खान पान कर रात होती।

निशा नाश किताबें पढ़कर।

नित निरंतर उठकर पढ़कर।

कटते रह रहे दिन मेरे।

अपने मार्ग अपना काटे।

हम भये मुर्ख सपने बाटें।

मन बहलाये रोज बातें।

लोग कहे कर्म के भाटे।

कर्म कठोर खुशी अपार।

रोज लङते बढ़ते पढ़ते पार।

कहे किससे किस्से सार।

शाम को बेठते होकर हार।

अपने मन की बात कहूँ तो।

थका नहीं पर कब तक ही।

चलना है मुझको भाता।

पर मनका अँधेरा सहा ना जाता।

कौन भौर याद ना दिलाती।

खा गई बैरी प्यार की बाती।

जलता रहता मन दिया सा।

कहना नहीं हाल जिया का।

नित नियमित दिन ढलते।

कितने सपने बनते बिगङते।

खुशी किसी की मन चढ़ती।

पल भर से ज्यादा आस ना बढ़ती।

सांस थमे जब कोई पलटे।

दिल के पन्ने नम करते।

नित नियमित संघर्ष रत।

खुद से लङता रहता रत।

शीत गलन मुझको भावे।

कठिन निद्रा अब ना आवे।

ध्यान भंग अब अंग जलन।

खो गई जीने मरने की लगन।

मन मस्त जब भीङ गावे।

उलझे जग में चैन पाये।

पलटी हवा अब मन नहीं।

कट जाये जीवन जल्दी अब।

आस नहीं अच्छा होने की अब।

सब रद्द सब रत कुछ नहीं।

ढल गया सुरज शाम हुई।

रात अँधेरा कल की आहट।

नित निरंतर यही चाहत।।


-कवितारानी।

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