अहसास होता है कई बार / ahsas hota hai kai bar

 अहसास होता है कई बार


अहसास होता है कई बार,

कि कितनी तपन है सब ओर।

कितनी ठण्डी हवाएँ भी टकराई है,

वक्त का पहीया ऐसा दौङेगा,

अहसास होता है कई बार।


पता ही नहीं होता बैठे बिठाये साल खो दिया,

कितने खाली लम्हें बैठे यूँ ही सब खो दिया।

जैसे रहा ही नहीं कुछ मेरे पास,

अहसास होता है कई बार।

जाने कब से पत्थर दिल बन बैठा हूँ।

सोंचता नहीं किसी के बारे में अब।

परवाह नहीं होती खुद की ना दुनिया की।

जब से चलने लगा हुँ गिरकर इस बार।

अहसास होता है कई बार।

अहसास होता है कई बार।

कि खो दिया मैंने बचपन अपना।

वो महफिलें वो यारियाँ भी खो दी मैंने।

खो दी मैंने दुसरों की परवाह वाली आदतें।

खो दी एक कोमल ह्रदय की यादें।

बचपन की सारी सौगातें।

वो टिस, वो जख्म, वो अहसास खोजने का अपना,

वो किसी के साथ जीनें, मिलने का अहसास।

अहसास होता है कई बार।।

मिट्टी का बना था महक उठता था हर त्योहार, वार,

करता नहीं एतबार इस बार, रहा क्या आज वार,

निकल जाते है दिन, महिने, साल हर बार।


-कवितारानी।


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