अकेला हूँ/ Akela hun



अकेला हूँ


आज मैं फिर अकेला हूँ इस डगर पर,

आज फिर अकेला हूँ इस सफर मैं,

मैं आज फिर अकेला हूँ इस स्वप्न लोक में,

हाँ मैं तो अब भी अकेला हूँ समाज में।

क्यों मैं अकेला हूँ नहीं जानता में ये,

पर पहले भी तो अकेला था फिर आज क्यों,

पहले भी तो तन्हाई थी साथ बस मेरे,

पहले भी तो अकेले ही देखे थे सपने मैंने।

पहले भी तो सब से रसवाई थी,

फिर आज कैसे अकेला मैं तो बरसों से अकेला,

ढुँढ रहा हमसफर आज भी आज भी तलाश है,

आज भी कोई वफादार मिले ईमानदार मिले।

प्यार का प्यासा तो पहले भी था, आज भी क्यों प्यास है,

पहले भी जिन्दगी कठिन थी आज भी है,

इस स्वप्न लोक-मृत्यु लोक में कौन अकेला नहीं है,

पर जिन्दगी में तो सबके पास कोई साथी है।

फिर मैं क्यो अकेला हूँ, मैं तो आज भी अकेला हूँ,

कोई था चाहने वाला जिसने पैदा किया,

उसे भी तुने छिन लिया, क्यों मुझे अकेला किया,

अब तो कोई मिला दे जो तन्हाई मिटा दे क्योंकि,

मैं आज भी अकेला हूँ, इस जीवन पथ पर अकेला हूँ।।


-कवितारानी।

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