हाँ बीमार हूँ / han bimar hun
हाँ बीमार हूँ
कलयुग का अन्धकार है, झुठ का प्रकाश है।
बेईमानी की हवा चली, दोखों का संसार है।
समाज कह रहा है हाँ मैं बीमार हूँ।
खुद से ही लाचार हूँ अपनों से बीमार हूँ।
मानव मेें विध्यमान हूँ हर जगह से परेशान हूँ।
हर वक्त झुठ की खाँसी चली फिर कमजेरी की बुखार है।
लाचार का ईमान हूँ खुद ही खुद से बीमार हूँ।
मानव ने मुझे बनाया है इसी ने मुझे सङाया है।
इसी से आज लाचार हूँ मैं तो बीमार हूँ।
हर तरफ गंदगी ही हर तरफ प्रदुषण दिया।
मैंने ही तो वनों का नाश किया तभी तो मैं बीमार हूँ।
घुसखोर का घुसा मीला चोरी डकेती ने चीरा।
अब तो एक कंकाल हूँ हाँ मैं ते बीमार हूँ।
पैसों का जो जादू चला लक्ष्मी जी को भी नहीं क्षमा।
अरे भगवान तो है कहाँ सब पोसे का जो जाल है।
इस अत्याचार में कौन सुखी इस संसार में।
मैं तो ेक समाज हूँ मुझसे ही तो मैं बीमार हूँ।
हाँ मैं ही तो बीमार हूँ दवा दारु तो चल रहे पर ये भी।
कहाँ खल रहे िसे भी मैं बीमार हूँ हाँ मैं इन्सान हूँ।
हाँ मैं समाज हूँ, मैं तो बीमार हूँ।।
-कवितारानी।
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