suni part-6 samajik jivan / सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन
सुनी भाग-6 सामाजिक जीवन
सुनी सुनाई बात थी,
कुछ साथ की बिसात थी,
मिजाज ही कुछ ऐसा था उसका,
मिले जिसे मन हर ले उसका।
बातों के फटकारे करती,
चिढ़ाये कोई ललकारे करती,
अब डरती नहीं पहले सी वो,
मुहँ पर कहती जो कहनी थी वो।
सुनना किसी का आता नहीं,
काम कोई रुक पाता नहीं,
सबकी सुनती करती मन की,
पर मन में डरती रहती मन ही।
ग्याहरवीं में प्रवेश किया,
विज्ञान संकाय को ही लिया,
अच्छे अंक अच्छा भविष्य सोंचा,
ध्यान लगाया तो किसी ने ना टोका।
रोज पढ़ती अपनी धुन में,
कमरा मिला अपने गुन में,
मस्ती भी करती लङती भी थी,
पर पढ़ाई के समय पढ़ती ही थी।
समाज का अलग नजरिया,
पुछे हरदम कहाँ साँवरिया,
सुनके सुनी होती बावरी,
अपने राग में गाती साँवरी।
बोल कई बार कङवे करती,
जो चिढ़ाये उसी से लङती,
बुराई का घुंघट अब बढ़ रहा,
चेहरे पर गुस्सा अब बढ़ रहा।
बैठ अकेले खुब रोती,
माँ बाप को भी कोसा करती,
दुल्हे को नफरत से नापती,
चेहरे को छुपाती और भागती।
शाँत चेहरा अब उदास सा,
हॅसता मुखङा बिन उजास सा,
कुछ रोनक खिलने से पहले खोई,
किस्मत कैसी सोंच के रोई।
संध्या बंध्या बन चौखट देखती,
छत पर जाकर क्षितिज देखती,
नयनों से सपनें बरसा करते,
अकेले में अपनें आह भरते।
एक समारोह में जाना हुआ,
वर का भी वहीं आना हुआ,
ध्यान नहीं देकर खुश थी,
सुनी वन की कि उसने रुख की।
हिली ना पल भर को वो,
सहमी रही कुछ देर को,
फिर सहेली ने भी छेङा,
दे धक्का मुँह फेरा टेङा।
साफ लब्ज में चेतावनी दी,
कोई कहे ना आईंदा बात साफ थी,
तेज तेवर से सब डरे,
पर लोग ही है अकेले में कहे।
बात चलती गाँव चौबारे,
सुनी ने दिये ललकारे,
ये ना अब वहाँ जायेगी,
बहुत पढ़ ली भाव खायेगी।
अनपढ़ वर राह से भटका,
पढ़ाई छोङ नवीं में अटका,
अब गुटखा पान मसाला सारा,
दारु, दोस्त और रहना आवारा।
सुन अफवाहें लङके वाले आये,
वधु हमारी हम लेके जाये,
खुलकर सुनी गालियाँ देती है,
गाँव चौबारे बातें होती है।
बुला वहीं बापु ने फटकारा,
रोती हुई वहीं उसने कह डाला,
नहीं है कोई वर मेरा,
नहीं जाऊ मेरा घर यही यहीं मेरा ढेरा।
भागती हुई कहती गई,
डरती हुई रोती रही,
बेसहारा सी कुछ पल ही थी,
बहिन सहारा बन साथ थी।
कहा सम्धी और बापु को,
बात हूई थी अभी पढ़ रही पढ़ने दो,
बच्ची है मान जायेगी,
मौज से विदा होके ही जायेगी।
ऐसे वैसे किस्से कह के,
चले गये आह भरके,
बाहरवीं के बाद तो ले जायेंगे,
आगे भले हम पढ़ायेगें।
कुछ दिन बिते वैसे वैसे,
सब समझ गये कैसे रिश्ते,
कोई ्अब ना ज्यादा कहता,
पिछे से खबर देता रहता।
मन की मार मन में फिर,
मस्त मगन धुन में फिर,
पढ़ाई में उसने जी लगाया,
कई बार उत्सव में गाना गाया।
थी किशोरी बाल मन वो,
पर औरतें गिनती शादीशुदा ज्यों,
मन भर आता नर वो अङती,
फिर माँ बहिन सखियाँ साथ करती।
त्योहार पर इकठ्ठे होकर,
समाज रीत में पास बैठकर,
अब अक्सर सुनी की बात होती,
बिगङ गई या भेजने की खास होती।
सब का जवाब सुनते सुनाते,
ग्याहरवीं में औसत अंकर पाकर,
अब आगे भी था पढ़ना,
और समाज से भी था लङना।
शादी को अब साल हुआ,
बिना रित उत्सव के सुनी के बवाल हुआ,
अफवाहें और सवाल लोंगो के चुभते,
फिर आकर लङके वाले फिर कहते।
अब भेजो वधु को हम पढ़ा लेंगे,
आप कहो जैसे-वैसे रख लेंगे,
बहुत विराम हो गया है अब,
लेकर जायेंगे बहु को हम।
पिता मन को मार बैठे,
माँ समझाये भाई मनाये बैठे,
बहिनें भी अब राग बदलती,
कहती भेजो इसे ऐसे ना रीत होती।
फिर से सुनी सिर चढ़ कर,
गुस्से में आई लङ कर,
रोती जाती कहती रहती,
नहीं जाना, नहीं जाना कहती रहती।
देख करुण दशा बहिन बोली,
भोली सुरत अभी कैसे झेलेगी रोली,
बाहरवीं भी है करनी अभी,
कहाँ भागी जा रही अभी पुरी जिन्दगी पङी।
सुनी के विरोध और जिद के आगे,
पिता ने मनाया कहा कुछ और मांगे,
अभी बाहरवीं होने दो,
कुछ और दिन रहने दो।
माँ ने करुण दशा देखी,
संबंध की गहराई की बात रखी,
बहिनों ने समझाया और भङकाया भी,
पर सबने फिर उन्हें मनाया ही।
कुछ मन मारा कुछ हारा सा,
वर और वर का परिवार माना था,
पर कह गया अबके लेके जायेंगे,
हम पास हो या फेल लेके जायेंगे।
एक-एक पल किल सा लगता,
हर दिन बातों से मन डरता था,
कहना बस विरोध सुर ही,
नहीं जाना रहना दुर ही।
समझाती माँ, बहिनें डाटती बताती,
लोगों के बहिष्कार और नीति बताती,
सबसे सब घरवालों को सुनना पङता,
तेरे लिये कोई और ही चुनना पङता।
हर बात में हाजिर जवाब,
झट से देती रही जवाब,
चलने नहीं दी अपने विपक्ष की,
अङी रही वो अपने अक्ष ही।
हिम्मत करनी पङती रहती,
खुद से भी अक्सर लङती रहती,
कहती अपनी सखी सहेली से ही,
फिर भुल सब हॅसती रहती।
कुछ दिन बाद फिर सब शाँत सा,
कोई ना पुछे कैसा ससुराल था,
पढ़ाई की अब बात थी,
रोज-रोज बस पढ़ाई की याद थी।
अपने मन में ठान रखी,
खुब पढ़ के सबका मान रखुँ,
उस उल्लु से छुटकारा है पाना,
यही होगा मेरा बहाना।
ईश्वर भक्ति और साहस,
लगी रही बाँध साहस,
किसी कि ज्यादा सुनती ना,
हरदम अब वो पढ़ती हाँ।
घर, मोहल्ला, गाँव हैरान सा,
देखता मेहनत लगन को मानता,
कहने लगे अब फिर उसके बोल,
ये ना जायेगी उस ढोर।
चेहरे पर चमक और बढ़ी,
गौर वर्ण और शिक्षित परी,
ध्यान अब योवन लिये नारी पर,
उसके विचार लगने लगे थे भारी से।
बाहरवीं की परीक्षा खत्म हुई,
मेहनत से अच्छी उम्मीद भी हुई,
अब विध्यालय से टुटता सा नाता,
कुछ अच्छा हो मन यही चाहता।
कठिनाई बसी मन में थी,
वो मेहनती और हिम्मती थी,
कौन घर, गाँव, समाज से लङता,
और ईश्वर था साथ उसमें थी जङता।
मर जाना पर घर ना छोङना,
ठान लिया अभी रास्ता नहीं मोङना,
कुछ बनके ही अब मानुंगी,
इन लोगों की कभी नहीं मानुंगी।
उच्च विचारो को जन्म देती,
वो अभिलाषाओं को पंख देती,
लगी रही थी अपने काम में,
परीक्षा तक लिया मन थाम ये।
फिर करवट ली मौसम ने,
आ धमके वर वाले घर में,
अब कुछ भी हो लेके जायेंगे,
हम यहाँ से अब खाली नहीं जायेंगे।
सब आये और समझाया,
पर सुनी के समझ ना आया,
खुलकर अब विरोध था,
पिता के मन में भी रोश था।
रोई घबराई मन जाने की बात की,
पर कभी ससुराल ना जाने की बात थी,
पिता डरे, माँ सहमी, भाई-बहिनों ने माना,
कुछ और दिन दो समझायेंगे, फिर आना।
मुँह फुलाकर जाना पङा,
कुछ कङवे बोल अब सुनना पङा,
पर लाङली के मन की की,
अबके सुनी की सुनी थी।
रोज-रोज लेके बहाना,
सबने मिलकर बुना ताना बाना,
हर पहर आकर बेठते,
समझाते बतलाते और ऐंठते।
कोसते रुसते समय गंवाया,
परीक्षा का भी परीणाम आया,
अच्छे अंक से पास हुई,
फिर कुछ पल में खुशी हुई।
एक बहिन ने डांडस बंधाया,
सहेलियों ने भी उपाय सुझाया,
कैसे भी अब वो जी लेगी ही,
घर वालों को भी कुछ डर सा आया।
साफ लब्ज में कह रही,
मुझे पसंद वो वर नहीं,
पढ़ना है और नौकरी लगना है,
चाहे यहाँ रहना या ना रहना है।
पिता का लाङ भी जागा हुआ,
माँ का मन कुछ डरा हूआ,
मान रहे थे सुने मन से,
सोंच रहे थे बचे कैसे लोंगो से।
अब हर जुबान पर बात थी,
सुनी अब कुछ बिसात सी,
ताने भी सुनने पङते थे,
डर के जवाब देने पङते थे।
पर कुछ साल अब बीत चुके,
आदत सी मन में सील चुके,
रख लेंगे जीवन भर क्यों डरते हो,
हमारी बेटी पर नजर क्यों रखते हो।
कङवे बोल से सब सहमें से,
कहते नहीं पर वहमें से,
कुछ समाज में भी बात बङी,
लङकियों की सोंच भी अब पुछनी पङी।
वो बदलाव की कहानी से,
जीवन के संघर्ष में जी रही,
फिर से सपने नौकरी के,
रोज भगवान से प्रार्थना कर रही।
अब कोई ससुराल से ना आया,
अकङ में वो अकङे हैं समझ आया,
हर जगह ढिंढोरा करते,
बदनाम करके अपनी मान कहते।
कोई नया रिश्ता ना आता,
पर चेहरा उसका सबको भाता,
अब यही जिन्दगी सी मानी,
सबने बोंहे उस पर थी तानी।
धीरे-धीरे दिन गुजरे,
महिनें भी अब बीत गये,
जैसे तैसे बातें होती,
पर उस बात पर कुछ ना कहती।
अपने मिजाज की धनी वो,
खुलकर हॅसती मस्त रहती वो,
गुस्सा भी अब बढ़ गया,
जो भीङा समझो मन गया।
एक ही लक्ष्य अब ठान के,
पढ़ना ही है सब छोङ के,
पिता ने भी ढांढस बंधाया,
पैसे देकर साथ निभाया।
चलने लगी जीवन धारा फिर,
खुशियाँ थी और सपने फिर,
फिर से अपने मन की मौजी,
दबी हसरतें पर ्अब भी खौजी।।
-कवितारानी।
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