मेरा विरह | mera virah



मेरी विरह


शांत हवा तुफान बन गयी,

लहरें अब विकराल बन गयी,

जो दीप जलाये थे ज्योति को,

वो ज्वालायें बन गयी ।

में विक्रान्त रूप लिये बैठा ,

बिन मिले ही विरह जी बैठा,

मेरा एकान्त परेशान है,

मेरा दिल हैरान है ।

किसे कहूँ- कहाँ जाऊँ, 

विरह गीत लिखूँ और गाऊँ,

अपने मन को समझाऊँ, 

मैं कैसे अपना हाल बताऊँ ।

वो मन मोहकता जलाती है, 

मधुर बातें तड़पाती है, 

मेरा अकेला मन रूसता है,

सब देख मन खिजता है ।

मैं कैसे एकान्तवासी बन जाऊँ, 

भरा इच्छाओं से कैसे अधुरा गाऊँ, 

मैं कैसे स्व विरह जी पाऊँ, 

मैं कैसे सब बताऊँ  ।।


Kavitarani1 

271

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं...कब / Main kab

काश ! तुम होती साथ / Kash ! Tum hoti sath

वही गर्मी है | Vahi garmi hai