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My Aim

 My Aim A desired Heart in me, Thinking always for dreams. A love desire hurts me. Wishing always for mean. My aim on the way. Stoping to distrack, My love has lost. Searching to be cream. I wish to be happy, Wishing to shine. My aim on the way. Way of all suffer. My aim on the ray. Hoping to be gain. I have begun life, With leaving you on way. My aim on the way, My life suffocated, On your gay, My aim on way. -kavitarani1

जब मंजिल दुर हो / jab manjil dur ho

 जब मंजिल दुर हो जब मंजिल दुर हो तो रास्ते धुंधले नजर आते हैं। जब तैय्यारियाँ अधुरी हो तो काम अधुरा नजर आता है। जब अपने साथ ना हो तो भीङ में भी अकेले नजर आते हैं। जब अपने दगा दे तो जहान अधुरा नजर आता है। पाने को मंजिल निकल जाते है हौंसले में दम है, पर बिना अपनों के हौंसले कहाँ जुटा पाते है। निकल पङते हैं राह पर अकेले भी अगर मन में कोई शंका ना हो, पर बिना अपनों के मंजिल पाने में मजा कहां आता है। फिर पाने को शिखर सपना मन अपना उतावला है। तोङ बंधंन छोङ अपने पाने को सपने दिल बेकरार है। छोङ दे साथ चाहे जहाँ सारा फिर भी आगे बढ़ते जाना है। नीले आसमान में फिर से लहराना है। उङ जाना है उस जहान में जहाँ शिखरी लोग रहते हैं। मिल जाना है उस भीङ में जहाँ पराये परिंदे रहते हैं। दिखाना है इस जहाँ को कि अब भी है मुझ में क्रांति। पाना है उस जहान को जहाँ ना हो कोई भ्रांति। देखेगा ये जहान ओर गुणगान करेगा मेरा, ऐसा सुनहरा सपना है मन ये मेरा। चाहे मुश्किले बङे बङ जाए ये रास्ते चलते जाना है मुझे, अब रुकना नहीं किसी के वास्ते। -कवितारानी।

मंजिल की तलाश में / Manjil ki talash mein

चित्र
मंजिल की तलाश में मंजिल की तलाश में आज फिर डगर-डगर। आज फिर द्वार-द्वार ढुँढ रहा मंजिल अपनी। जिन्दगी की राह में कठिनाईयों की राह में। फिर रहा मगर-मगर आज भी मिली नहीं मंजिल। हर जगह ठहर-ठहर पुँछ रहा पता मगर। भटका रहा राहगीर मुझे फिर कैसे मिले मंजिल। हर जगह लुट है हर जगह है धोखा। जो दे रहा राही को मंजिल का टोटा। मिले किसे इस झुठे संसार में मंजिल यहाँ। कलयुग का है काल बङा भटका राही राह का। मंजिल की तलाश छोङ दी किसी ने। मंजिल की राह मोङ दी किसी ने। मंजिल को लुट लिया किसी ने दलाली छेङ। हर कोई जाना चाह रहा इस ऊँची इमारत पर। पैसों के ढेर हो जहाँ आलस का आसमां। धरती को पुछता नहीं  आकाश में हो पैर जहाँ। गरीबों की सोंचता ना जन्तुओं की जहाँ। ऐसी मंजिल है आम यहाँ, फिर भी। मंजिल की तलाश में मंजिल वाला। घुम रहा डगर-डगर, द्वार-द्वार अन्त नहीं। इस राह का कौन, कौनसी है ये मंजिल पता कहाँ।। -कवितारानी।