पुरवाईयों सी खुशियाँ आ मिली/ purvaiyon si khushi aa mili



पुरवाईयों सी खुशियाँ आ मिली


 थी धुप अधखिली, चल रही मध्धम, मध्धम।

साफ आसमां, पत्ते थे औझल-औझल।।

महकती बगीया सी चल रही समीर वहाँ।

आ मिली खुशियाँ पुरवाईयों सी जहाँ।।

वहाँ मैं था अकेला भीङ भरी थी लाॅरी संग।

अहसास था चलने का पर स्थिर था मन।।

बह रही आकर आनन-फानन कण-कण।

पी रहा था मधूर सोम वाहन-वाहन मन-मन।।

अधर-गदर रोम-रोम था मचल रहा अन्दर।

पाताल तन में जो रहता था अक्सर पतझङ।।

बसंत थी आई लेकर टोली बनाकर हमझोली यों।

खिल ही उठा मन पाई खुशियाँ पुरवाई जो।।

जर्जर था जजांल वहाँ जो गंतव्य था जाने को चुना।

ध्वंशावशेषो पर चित्र भी था लिया बुना।।

रिक्त कालांशो में मन फिर जैसे कोई हवा चली।

अनुभूतियों में पाया पुरवाईयों सी खुशी आ मिली।।

कुछ तो खास अहसास हर घङी पा जाता हुँ।

जब आवश्यकता हो उतनी देर महक जाता हुँ।।

शुक्र करता रब का जो थी खुशी की घङी ली दी।

अवकाश काल में मधुर पुरवाईयों से मुलाकात ला दी।।

हर लम्हें में कुछ नहीं एक बात सामान्य थी मिली।

खोये हुए अहसासों में मस्त मगन पुरवाईयाँ मिली।।

निकले हुए लम्हों की, बातों की चली एक लङी।

मेरे सुने लम्हों में पुरवाईयों सी खुशी मिली।।


-कवितारानी।


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