पन्ने भरते गये / panne bharte gye



 पन्ने भरते गये


ना कल कोई समझा, ना आज कोई समझता है।

भावनाओं के ज्वार को, रवि अकेला तपता है।

अंतर-अंतर का, लिखा भाग का जीता रहता है।

मेरा एकांत डायरी में, मेरे मन का बोझ लिखा करता है।


जानता है बावरा है ये सब यूँ ही है।

पर कहे किसे, समझे कैसे ये दर्द ही कुछ ऐसा है।

दर्द का पारखी ढुँढते-ढुँढते बोखला अब गये।

लिखते-लिखते कितनी डायरियों के पन्ने भरते गये।


सार कोई समझे, की शब्द कोई समझेगा।

आकांक्षाओं के बादलों पर मन कब तक विचरेगा।

आशाओं के धरातल पर तन-धन का बोल बाला है।

आज भी जग में सब सुनाना और अपना ही बस गाना है।


राग कोई चुना नहीं ना राह बदल पाया है।

एकान्त में बैठे रवि ने बस अपना दुखङा सुनाया है।

लिखते-लिखते समय साथ साल गुजर गये।

कई डायरियों में मन को भरते पन्ने भरते गये।


पङा नहीं लिखा जो बस पलट कर देखा जब।

लग रहा जीया नहीं जब लिखा होगा ये सब।

कितना अधुरा कितना एकान्त रहा मेरा कल।

आज देख भरे पन्नों को भर आया मन।


मन के बोझ कई है चाह कई।

हर दिन नये सपने इसके हैं इसकी चाह नई।

अपनी ही चाह को पाने के लिये समय से लङते गये।

कहाँ कहे गम क्या, तो लिखा, और पन्नें भरते गये।


क्या था कल और क्या बिता ये पङते हैं।

देख डायरी के जख्म और जग समझ सकते, क्यों पन्नें भरते हैं।।


-कवितारानी।

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