एकान्त है तेरा / Akant hai tera



एकान्त है तेरा


देख रहा हूँ पलक के छोर से।

पलट गया है कितना कुछ।।

एक साफ मन दुषित है।

दुजा नजरिया प्रदुषित है।।

कोई भीङ मन लुभाती थी।

अब अहसास भी अकेला है।।

दुर दरिया बहता था।

आज मन मे लगा मैला है।।

आते जाते लोग मिल रहे हैं।

कोई अपना राग आलाप रहा।।

सब ओर रोशनी कुछ छुपता ना रहा।

साँस के हर आस में प्यास बुझती नहीं।

मिल जाती है नदियाँ पर प्यास बुझती नहीं।।

हर आँख में दोखा है।

अपना कोई है नहीं।।

हर एक को खुरेद कर देखुँ।

तो एकान्त ही में मैं रहुँ।।

कोई नहीं जग में सिखा अब रहा।

सबको में अब कहता एकान्त है तेरा।।

एकान्त है तेरा।।


-कवितारानी।


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