प्रिय परिणय प्रेम गाथा / Priya parinay prem gatha

प्रिय परिणय प्रेम गाथा


दो जिस्म रुसवा थे, बेवफाई जो कि प्रियतमा ने।

अग्नि सा जलता जिया लिये चल रहा प्रियतम धुप में।

वो भीङ का समारोह याद है मुझे खुद में खोया अकेला था वो।

बातें थी तरह-तरह की, मुस्कान चुभ भी रही थी बेवफा की तो।

करता क्या लाचार सामने जाने बचता रहा हर पल वहाँ।

सिस्कियाँ मौसी की गोद में हुई और आँसुओं की धार बंधा में वहाँ।

देखा ना एक नजर उठाकर प्रेमी ह्रदय ने अकङ दंभ में वो रही।

अथाह सागर भरा प्रियतम का दबा जैसे खुद ही था रहा।

कोसता रहता मन ही मन कि क्यों किया यार से प्यार वहाँ।

वो निर्मोही स्वछंद मस्त मन हर अदा से जला रहा।

उसका था सहारा सात से मेरे सात महिनों की दुनिया ही रहा।

लुटा वो या नहीं पर मुझमें था बाकि ना कुछ रहा।

कोशिशों के सफर में मस्त मगन नाचना प्रिय ने शुरु किया।

वो पास थी दो कदम क्षण भर कि नजर ने योवन ताक लिया।

निर्मोही, निर्दोष, निष्कलंक, पुर्ण दंभ सा नाच उल्लास भरा।

टीस भरा मन प्रियतम साथ दल मस्त मगन दिखता रहा।

हर लय, ताल पर कोशिशें हर्ष दिखलाता था रहा।

जाहीर ना थी मन की कुछ जग सारा भ्रमित रहा।

नजर संरक्षक दिख रही पर में भुला बिछङा अनजान रहा।

को काल कलेष विक्षिप्त भेष भव्य अचानक रह गया।

पास ही खङा कान्त कान्ता को जकङ लिया।

जग गया भुल गया कौन कहाँ किस घङी था वहाँ।

बाँह भर आलिंगन कर बस सवाल करता रहा।।


-कवितारानी। 

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