साथी छुटा हुआ / sathi chhuta hua



साथी छुटा हुआ


छुटा हुआ बहुत कुछ समझता हूँ।

पा ना सका तुझे मानता हूँ।

पर ऐसा तो ना की तो ही लिखा हो भाग में मेरे।

कि पा ना सका तुझे और करता रहुँ मलाल खुद में।

वो वक्त की रफ्तार तेज थी बङी।

साथ में चल सका नहीं।

अब समझता हूँ बित गया है वो।

मेरा था नहीं पाने की कोशिशे की बङी।

अब मेरा मन मुझमें धङकता है।

किसी की आहटें जगाती नहीं अब।

सामनें मेरे कोई चेहरा नहीं।

नजरें फिर से खोजती है अपना कोई।

अब आँसुओं के लिए समय कहाँ।

साल नया व्यस्त मैं खुद में रहा।

किसी से कोई मतलब नहीं।

नजर भी नई नजरीया भी कोई नही।

सब वक्त का फैर है।

बढ़ जाते है।

भुल जाते है।

चल आगे बढ़ चलते हैं।

ओर कौन साथ तेरा।

एक एकान्त ही तो है साथी तेरा।।


-कविताrani1।

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