आज फिर भटक रहा / Aaj phir rahi bhatak rha



आज फिर भटक रहा


मंजिल की तलाश में, अपनों की चाह में,

सुख की प्यास में, दौलत की रास में,

आज फिर बनके राही में हूँ भटक रहा,

फिर सोंच वही रहा, फिर सपना वही रहा।

राह फिर भटक रहा, फिर सपना वही रहा,

मंजिल की आस में मैं राहगीर भटक रहा,

एक अजीब कशिश जगी, अजब मजा रहा,

चार दिन फिर जमकर मेघ बरस रहा।

फिर वही सुखा आया आँसु ही छाया रहा,

दुनिया के दर्द से क्या, खुद से में गीर रहा,

आज फिर राही बनकर पथ को चुन रहा,

आज फिर नई राह है नई सोंच चली आज।

आज सब नया है फिर भी फिसल रहा,

जहाँ से चला था में वहीं पहुँच रहा,

आज फिर भटका राही मन डगर से भटक रहा,

किसी ने चढाया बढ़ाई से किसी ने डकेला कढ़ाई में।

सब ने गढ्ढे खोद दिये, सब आस जता दी,

पर आस से कोई रास नहीं, मन तो पगला रहा,

मंजिल का पता नहीं क्यों राही चला जा रहा,

क्यों राही झुठी राह में पथ-पथ भटक रहा,

आज फिर राही भटक रहा।।


-कवितारानी। 

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