मन बावरा उलझ रहा / man bavra ulajh rha

मन बावरा उलझ रहा


दुनिया पल-पल बदल रही, सबके मन से खैल रही।

मौसम तो बदले सबके मन को भी बदल रही।

हर बदलते मन के झाँसे में ये मन बावरा उलझ रहा।

ना कुछ समझ रहा ना कुछ सोंच रहा।

एक पल कि खुशियाँ पाने को सालों साल गवाँ रहा।

हर एक दोखे में हर एक जाल में उलझ रहा।

बीते पल याद नहीं याद नहीं वो टिस पहले की।

ना याद रहा पहले का गम वो अकेले पल।

जो समय था बुरा बीत गया पर फिर उसी तरह के जाल।

आज क्यों मन मेरा बावरा उलझ रहा।

नहीं सोंच रहा कल कि फिर नहीं गमों की सोंच रहा।

फिर वही गलती करके मन बावरा उलझ रहा।

बदलते इस मौसम में इन मनों के फेरे में।

नहीं में कुछ सोंच रहा नहीं कुछ समझ रहा।

मंजिल को तो भुल रहा भविष्य की भी नहीं सोंच रहा।

दो पल कि खुशियों मेें जीवन भर का गम ले रहा।

क्यों मेरा मन आज ये गलती कर रहा।

मन बावरा उलझ रहा क्यों ये नहीं समझ रहा।

खींच रही है वो हवाएँ बुला रहे हैं वो पल देख उनकों।

रुका आज नहीं जा रहा ये बावरा उलझ गया।

निकाले से नहीं निकल रहा ये तो पुरा उलझ गया।

संभालने की में कोशिश कर रहा आज फिर फिसल गया।
मेरा मन बावरा उलझ गया।।


-कवितारानी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अरी तुम भूल गई, Ari tum bhul gyi

मैं...कब / Main kab

वैचारिक मतभेद / vecharik matabhed