फिर भुखा रहा / phir se bhukha rha

 फिर भुखा रहा


दिन चढ़ा रात बीती, दुपहर हुई, चिङिया चहकी।

सबने खाना खाया पर किसी को रहम ना मुझ पर आया।

सबने अपने मन की चलाई खुदगर्जी से दिल लगाई।

सबने पेट की आग बुझाई मेरी याद किसी को ना आई।

जो बनाता सबके लिए खाना उसे ही भुल गये दुख में देखो।

कैसे इन्होने की अपनी भरपाई ऊपर से गुस्सा दिखाए।

कैसे ये अपनी गरज दिखाए, मुझको दुख में भुल जाये।

सबने अपने मन की चलाई, कैसे अपनी बात बनाई।

गलती सारी मेरी बताई. कि क्यों बीमारी तुने लगाई।

दवा तो दुर रही, एक रोटी ना इन्होने दिलाई।

हाय कैसी गरज निभाई, खुद की भी ना मन में इनके आई।

मैं ना रहा तो कौन करेगा काम आगे, कौन करेगा रसोई।

इतनी भी इनके समझ ना आई, मन की आग और झुलसाई।

दवाई ले भी आया कहीं से तो पेट की शाँति ना पाई।

कहीं से तो कोई भुख दे मिटा, हमेशा की तरह क्यों मेरी भुख बढ़ाई।

स्नेह ना मिला कभी ना सांत्वना की छाई।

हर वक्त दिल में कसक सी क्यों जगाई।

क्यों दुखों को बढ़ाया हमेशा क्यों ना ये भुख मिटाई।

फिर भुखा रहा स्नेह, सांत्वना से ना हो पा मिलाई।

दवा तो क्या मिलती एक टुकङा रोटी ना मिल पाई।

हाथ पैर काम करे तब जाके मैनें भुख मिटाई।

तब भी तो मेरी ना सोंच खुब राक्षसों ने ही दबाई।

कैसे सोंचते हो तुम कैसे रहते हो कुछ समझ अब तक ना आई।

कैसे समझु पर क्यों समझु, क्योंकि तुम को तो कुछ समझ ना आई।

हो मेरे अपने तो फिर क्यो दिये गम इतने,

चाह कर भी ना खङा हो सकुं ना कर सकुं मदद तुम्हारी,

क्यों मन में ऐसी आग लगाई।।


-कवितारानी।

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